महिला स्वतंत्रता और पितृसत्ता : राहुल गांधी के पुणे भाषण के आईने में एक सामाजिक विमर्श
– ओमप्रकाश तिवारी
हाल ही में पुणे के ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का महिलाओं की आजादी पर दिया गया बयान देश में एक नई सामाजिक बहस को जन्म दे चुका है। प्रबुद्ध लोग इसकी सराहना कर रहे हैं तो कई लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। ऐसे में इसे विस्तार से समझना जरूरी है। यह जानना भी जरूरी है कि राहुल गांधी की आलोचना करने वाले किस दिमागी स्तर के लोग हैं। राहुल गांधी ने मंच से साफ शब्दों में कहा कि महिलाएं किसी की संपत्ति नहीं हैं, वे सिर्फ खुद की हैं।” देश की लगभग 70 करोड़ महिला आबादी की स्वतंत्र पहचान की वकालत करते हुए उन्होंने प्राचीन ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ के कुछ श्लोकों का हवाला दिया, जिसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पितृसत्ता और महिला अधिकारों का संकट किसी एक धर्म विशेष तक सीमित है या यह एक वैश्विक और सर्वव्यापी समस्या है? कुछ लोग इसे एक धर्म से जोड़कर कुतर्क पर उतर आए हैं।
70 करोड़ महिलाएं : एक साझा पहचान और संकट
राहुल गांधी ने अपने संबोधन में जब 70 करोड़ महिलाओं की बात की, तो उनका दृष्टिकोण पूरी तरह राष्ट्रीय, समावेशी और निष्पक्ष था। साथ ही संविधान सम्मत भी था और है। भारत की कुल महिला आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाला यह आंकड़ा किसी जाति, मजहब या वर्ग की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है। चाहे वह हिंदू समाज की महिलाएं हों, मुस्लिम, ईसाई, सिख या किसी अन्य समुदाय की इसमें सभी शामिल हैं।
समाजशास्त्रियों का मानना है कि घर की चहारदीवारी के भीतर और बाहर अवसरों की असमानता का सामना लगभग हर वर्ग की महिलाओं को करना पड़ता है। सुरक्षा के नाम पर उन्हें शिक्षा और रोजगार से दूर रखना या देर रात बाहर न निकलने देने जैसी पाबंदियां भारत के हर कोने में समान रूप से विद्यमान हैं और दिखाई देती हैं।
बहुसंख्यक समाज और मनुस्मृति का संदर्भ
चूंकि भारत में हिंदू समाज बहुसंख्यक है, इसलिए भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक ताने-बाने, पारिवारिक संरचना और रस्मों-रिवाजों पर प्राचीन ग्रंथों व ऐतिहासिक दस्तावेजों का प्रभाव सबसे गहरा और व्यापक रहा है। ऐसे में किसी भी सामाजिक सुधार या विमर्श के दौरान मनुस्मृति जैसी किताबों का संदर्भ आना बेहद स्वाभाविक है।
राहुल गांधी ने इस ग्रंथ के उन उद्धरणों को स्क्रीन पर दिखाया जो महिलाओं को जीवन के हर पड़ाव (बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में बेटे) पर पुरुषों के अधीन रहने की बात करते हैं। हालांकि, उनका उद्देश्य किसी धर्म विशेष की आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि उस “रूढ़िवादी विचारधारा” पर प्रहार करना था जो सदियों से महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का जरिया बनी हुई है।
– पितृसत्ता : किसी धर्म विशेष की बपौती नहीं, बल्कि वैश्विक समस्या
यह एक अकाट्य सत्य है कि पितृसत्ता (Patriarchy) केवल हिंदू या सनातन धर्म की समस्या नहीं है। यह एक ऐसी सर्वव्यापी सामाजिक व्यवस्था है जिसने दुनिया के लगभग हर धर्म, संस्कृति और कालखंड को प्रभावित किया है। मसलन इस्लामिक समाज को ले सकते हैं। कई रूढ़िवादी व्याख्याओं के तहत महिलाओं के व्यक्तिगत फैसलों, पहनावे और यात्रा करने की स्वतंत्रता पर पुरुषों की अनुमति अनिवार्य की गई है। हाल ही में एक फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया है। एक छात्रा स्कूल में बुर्का पहनकर आना चाहती थी। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि स्कूल की अपनी यूनिफार्म है। उसका ही पालन करना होगा। यह सभी है। समानता के लिहाज से यह जरूरी भी है। स्कूल में बुर्का पहनकर जाने का क्या औचित्य? मगर यदि छात्रा ने ऐसा सोचा तो उसके दिमाग में यह बात या विचार कहां से आया? समाज और संस्कृति ने ही ऐसा करने के लिए उत्प्रेरित किया होगा?
ईसाई और पश्चिमी इतिहास भी महिलाओं को लेकर बेहतर नहीं रहा है। हालांकि वह अब काफी बदला है और बदल भी रहा है। फिर भी मध्यकालीन यूरोपीय और ईसाई समाजों में महिलाओं को लंबे समय तक संपत्ति रखने, वोट देने या स्वतंत्र रूप से व्यापार करने का अधिकार नहीं था।
जाहिर है कि समाज चाहे कोई भी हो, महिलाओं को नियंत्रित करने के लिए हिंसा, मानसिक दबाव, अपमान और समय की पाबंदियों (कर्फ्यू टाइमिंग्स) का इस्तेमाल हर संस्कृति में देखा जा सकता है। इसका किसी एक मत, धर्म जाति से नहीं है। एक तरह से यह एक सामूहिक चेतना है। राहुल गांधी ने इसी की बात की और इसी पर प्रहार किया। इसे ही सुधारने की जरूरत है।
संविधान बनाम सामाजिक चेतना
आज का आधुनिक भारत डॉ. बीआर अंबेडकर द्वारा रचित भारतीय संविधान से संचालित होता है, जो हर नागरिक को लिंग के आधार पर बिना किसी भेदभाव के पूर्ण समानता और स्वतंत्रता की गारंटी देता है। कानूनन आज की महिला पूरी तरह स्वतंत्र है, लेकिन समाज की ‘सामूहिक चेतना’ और सदियों पुरानी सोच को बदलना अभी भी एक बड़ी चुनौती है। पुणे के मंच से युवाओं, विशेषकर ‘जेन-जी’ (Gen Z) की लड़कियों से “पिंजरा तोड़ने” (Break the cage) का जो आह्वान किया गया, वह दरअसल किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उस पुरुष-प्रधान सोच के खिलाफ एक साझा जंग है जो हर धर्म की महिला को एक स्वतंत्र व्यक्ति के बजाय सिर्फ ‘बेटी, पत्नी या मां’ के पारंपरिक रिश्तों की सीमाओं में बांधकर देखना चाहती है।
