घर-परिवार
भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक सोच: बदलाव, चुनौतियाँ और वास्तविकता
डॉ. रीटा अरोड़ा
क्या भारतीय समाज वास्तव में बदल रहा है?
क्या बेटियों को मिल रही शिक्षा, महिलाओं की बढ़ती आर्थिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जीवन में
उनकी बढ़ती भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि पितृसत्तात्मक सोच कमजोर पड़ रही है? या फिर यह बदलाव केवल दिखाई देने वाला परिवर्तन है, जबकि मानसिकता के स्तर पर अभी भी बहुत कुछ वैसा ही बना हुआ है?
ये प्रश्न आज इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारतीय समाज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल रही हैं। एक ओर महिलाएँ विज्ञान, राजनीति, प्रशासन, सेना, खेल और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ हासिल कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर लैंगिक भेदभाव, घरेलू हिंसा, असमान अवसर और रूढ़िगत सामाजिक अपेक्षाएँ अब भी अनेक महिलाओं के जीवन को प्रभावित करती हैं।
दरअसल, पितृसत्तात्मक सोच केवल पुरुषों के प्रभुत्व का प्रश्न नहीं है। यह एक ऐसी सामाजिक मानसिकता है जो स्त्री और पुरुष की भूमिकाओं, अधिकारों और जिम्मेदारियों को अलग-अलग मानकों से परिभाषित करती है। यह तय करती है कि परिवार में निर्णय कौन लेगा, किसकी प्राथमिकताएँ अधिक महत्वपूर्ण मानी जाएँगी और समाज में किसकी आवाज़ को अधिक महत्व मिलेगा।
पिछले कुछ दशकों में इस सोच में परिवर्तन के स्पष्ट संकेत दिखाई दिए हैं। शिक्षा ने महिलाओं को आत्मविश्वास दिया है। आर्थिक आत्मनिर्भरता ने उन्हें निर्णय लेने की शक्ति प्रदान की है। कानूनी अधिकारों ने उन्हें सुरक्षा और समानता का आधार दिया है। डिजिटल माध्यमों ने उनकी आवाज़ को व्यापक मंच उपलब्ध कराया है।
आज अनेक परिवारों में बेटियों की शिक्षा को उतना ही महत्व दिया जा रहा है जितना बेटों की शिक्षा को। माता-पिता अपनी बेटियों को डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, खिलाड़ी और उद्यमी बनने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। यह परिवर्तन केवल सामाजिक व्यवहार में नहीं, बल्कि सोच के स्तर पर भी दिखाई देता है।
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भी इस बदलाव को गति दी है। अब महिलाएँ अपने अनुभव साझा कर सकती हैं, अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठा सकती हैं और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रख सकती हैं। इससे लैंगिक समानता पर संवाद बढ़ा है और समाज के कई पुराने दृष्टिकोणों को चुनौती मिली है।
लेकिन क्या यही पूरी तस्वीर है?
यदि हम थोड़ा गहराई से देखें तो पाएँगे कि बदलाव के बावजूद कई स्तरों पर पितृसत्तात्मक सोच अब भी मौजूद है। बस उसका स्वरूप पहले की तुलना में अधिक सूक्ष्म हो गया है।
आज भी अनेक कामकाजी महिलाएँ दोहरी जिम्मेदारियाँ निभा रही हैं। वे कार्यालय में पेशेवर दायित्वों का निर्वहन करती हैं और घर लौटकर घरेलू कार्यों की जिम्मेदारी भी संभालती हैं।
आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने के बावजूद घरेलू श्रम का बड़ा हिस्सा अब भी महिलाओं के हिस्से में आता है।
यह स्थिति एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—क्या हमने महिलाओं को अवसर तो दिए हैं, लेकिन जिम्मेदारियों का समान बँटवारा अभी भी स्वीकार नहीं किया?
विवाह और पारिवारिक जीवन में भी कई पारंपरिक अपेक्षाएँ आज तक बनी हुई हैं। आधुनिकता के दावों के बावजूद अक्सर यह अपेक्षा की जाती है कि विवाह के बाद महिला स्वयं को नए परिवेश के अनुसार ढाले। पुरुषों से ऐसी अपेक्षाएँ अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं।
इसी प्रकार, कई परिवारों में बेटियों की शिक्षा को स्वीकार कर लिया गया है, लेकिन उनके स्वतंत्र निर्णयों को सहजता से स्वीकार नहीं किया जाता। करियर, विवाह, जीवनशैली या व्यक्तिगत विकल्पों को लेकर आज भी अनेक महिलाओं को संघर्ष करना पड़ता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पितृसत्तात्मक सोच केवल पुरुषों तक सीमित नहीं रहती। कई बार महिलाएँ भी अनजाने में उन्हीं सामाजिक मान्यताओं को आगे बढ़ाती हैं, जिनसे वे स्वयं प्रभावित होती हैं। बेटे और बेटी के लिए अलग-अलग नियम बनाना, लड़कों और लड़कियों के व्यवहार को अलग मानकों से आँकना या महिलाओं की स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाना इसी मानसिक संरचना का हिस्सा है।
यही कारण है कि इस विषय को केवल स्त्री और पुरुष के संघर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह मूलतः सामाजिक मानसिकता के परिवर्तन का प्रश्न है।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह परिवर्तन भी समान गति से नहीं हो रहा। महानगरों और शहरी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी और स्वतंत्रता अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है, जबकि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में कई सामाजिक बंधन अब भी मजबूत बने हुए हैं। हालांकि वहाँ भी शिक्षा, स्वयं सहायता समूहों और जागरूकता अभियानों के माध्यम से सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।
वास्तविक परिवर्तन केवल कानूनों से नहीं आता। कानून दिशा दे सकते हैं, लेकिन मानसिकता नहीं बदल सकते। इसके लिए परिवार, विद्यालय और समाज को मिलकर काम करना होगा। बच्चों को बचपन से ही समानता, सम्मान और साझेदारी के मूल्य सिखाने होंगे। लड़कों को यह समझाना होगा कि संवेदनशीलता कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय गुण है। वहीं लड़कियों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके सपनों और आकांक्षाओं का मूल्य किसी से कम नहीं है।
समानता का अर्थ प्रतिस्पर्धा नहीं है। इसका अर्थ है—हर व्यक्ति को उसकी क्षमता और इच्छा के अनुसार आगे बढ़ने का अवसर मिलना। स्त्री और पुरुष समाज के दो विरोधी पक्ष नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयोगी हैं।
भारतीय समाज निश्चित रूप से बदल रहा है। यह परिवर्तन दिखाई भी देता है और महसूस भी होता है। लेकिन यह भी सच है कि यह यात्रा अभी अधूरी है। हम ऐसे दौर में हैं जहाँ पुरानी मान्यताएँ पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं और नई सोच अभी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाई है।
इसलिए आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि पितृसत्ता समाप्त हुई या नहीं।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हम अपने घरों, अपने व्यवहार और अपने निर्णयों में समानता को स्थान दे पा रहे हैं?
क्योंकि समाज का परिवर्तन केवल नीतियों और कानूनों से नहीं होता। उसकी शुरुआत हमारे विचारों, हमारे व्यवहार और हमारे घरों से होती है।
और जब सोच बदलती है, तभी समाज वास्तव में बदलता है।
