जसवीर त्यागी की कारागार व अन्य कविताएं
कारागार
कोई सामान घर में रखकर भूल जाता हूँ
खोजने पर भी जब नहीं मिलता
परेशान होकर पत्नी से पूछता हूँ-
वह अपनी जादुई निगाह से
सामान को प्रकट कर देती है
मेरे चेहरे की खुशी
धूप-सी चमकती है
पढ़ते-पढ़ते कोई प्रसंग याद आता है
उससे जुड़ी कोई पुस्तक
या रचनाकार को याद करता हूँ
बार-बार के याद करने पर भी
स्मृति हाथ से छूटी हुई बाल्टी की तरह
कुँए में गिरती है
बिटिया तब झट से
उस पुस्तक या लेखक को
सामने लाकर खड़ा कर देती है
मैं बुझे हुए चिराग-सा
रोशनी से जगमगा उठता हूँ
सोचता हूँ
स्त्रियाँ न होतीं
तो यह दुनिया
किसी कारागार से कतई कम नहीं होती।
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संवेदना
मेरी कविताएँ पढ़कर
उसने कहा-
बहुत मार्मिक और संवेदना से लबरेज़
उसकी टिपण्णी की छाया में बैठकर
मैं कुछ देर तक सुस्ताता रहा
और सोचता रहा
मार्मिकता और संवेदना की पहचान
वही कर सकता है
जिसमें ये गुण निहित होते हैं
वैसे ही
जैसे दृश्य को
वही सराह सकता है
जिसके पास दृष्टि है।
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स्त्रियाँ
स्टॉफ रूम में
बगल की कुर्सी पर विराजमान सहकर्मी सखी ने
पतिदेव से मोबाइल पर बात करते हुए कहा-
खीर और बाकी नाश्ता बनाकर रख आयी हूँ
मम्मी-पापा और बच्चों को खिलाकर
आप खुद भी खाकर कॉलेज चले जाइएगा
उसकी बातें सुनकर
मैंने संवेदना की स्याही में नहाया वाक्य
उसके सम्मुख रखते हुए पूछा-
खीर आप भी तो खाकर आयी होंगी?
सखी मेरे कथन की कटोरी में झाँककर बोली-
जसवीर जी
हम स्त्रियों का पेट तो
परिवार के सदस्यों को खाता हुआ देखकर ही भर जाता है
यह कहकर वह कुर्सी से उठी
और बोली-
चलती हूँ मेरी क्लास का समय हो गया
बच्चे राह देख रहे होंगे
मैंने शिक्षिका सखी को
क्लास की ओर जाते हुए देखा
और मैं बगल की खाली कुर्सी को निहारता हुआ
अपनी माँ और पत्नी के बारे में देर तक सोचता रहा।
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