जयपाल की युद्ध विरोधी तीन कविताएं

युद्ध के विरुद्ध युद्ध – 23

कविता हमेशा युद्ध के खिलाफ़ खड़ी रही है, भले ही तानाशाह युद्ध को राष्ट्रवादी गौरव बताकर उसका महिमामंडन करते रहे हों। लेकिन उसकी कीमत आम आदमी ने ही चुकाई है (महमूद दरवेश)। बहरहाल जो युद्ध चल रहे हैं उनके नकारात्मक प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ रहे हैं । किसी भी युद्ध में जहां बच्चे और महिलाओं समेत नरसंहार होते हैं, वहीं इस विध्वंस से अंतरराष्ट्रीय सामाजिक जीवन भी तहस-नहस होता है।

प्रतिबिंब मीडिया साहित्यकारों की इस चिंता से भली-भांति वाकिफ़ है। ‘युद्ध के विरुद्ध युद्ध’ शीर्षक के तहत हम आपका युद्ध विरोधी साहित्य प्रकाशित करेंगे। आप अपनी कविताएं, कहानियों समेत रचनाएं हमें भेजिए, उन्हें प्रतिबिंब मीडिया पर ससम्मान प्रकाशित किया जाएगा। आज प्रस्तुत है जयपाल की युद्ध विरोधी तीन कविताएं । संपादक

 

जयपाल की युद्ध विरोधी तीन कविताएं

 

1

किस पार

 

बार्डर के उस पार

अगर तुम कुछ भी सार्थक नहीं देख पाते

तो इस पार भी क्या देख पाओगे दोस्त!

देख सको तो देखो

जब नहीं था बार्डर

तब कहाँ था

इस पार या उस पार

और कहाँ थे तुम

किस पार!

2

कवि की आवाज

 

किसी कवि के कहने से

कभी कोई युद्ध नहीं रुका

लेकिन कविताएँ लिखी जाती रहीं हमेशा

कविताएँ लिखती रहीं जीवन

युद्ध लिखता रहा मौत

 

कविताएँ लिखती रहीं प्रकाश

युद्ध लिखता रहा अंधकार

कविताओं का लिखा जाना

मौत और अंधकार के खिलाफ खड़ा होना है

 

3

नक़ाब

 

वह गा रहा था युद्ध की महिमा

सुना रहा था शूरवीरता का इतिहास

मना रहा था जीत का जश्न

लगा रहा था देश भक्ति के नारे

फहरा रहा था राष्ट्रवाद का परचम

डरा रहा था विश्व गुरु के दावे से

कह रहा था युद्ध के बिना जीना है मुश्किल

बहुत मुश्किल है महान बनना युद्ध के बिना

 

युद्ध आया

उसका नक़ाब उतार कर

अपने साथ ले गया