शादी उनकी, कैलकुलेटर हमारा!!
कार्ड से शगुन तक-जब खुशियों के उत्सव में रिश्तों से ज्यादा चलने लगा हैसियत और औपचारिकता का गणित
डॉ रीटा अरोड़ा
“अरे सुनो, वर्मा जी के बेटे की शादी का कार्ड आया है!”
पत्नी ने उत्साह से भारी-भरकम डिब्बा मेज़ पर रखते हुए कहा।
पति ने डिब्बा उठाकर देखा- मखमली पैकिंग, सुनहरी छपाई और अंदर करीने से सजे ड्राई फ्रूट्स।
“कार्ड है या दिवाली का गिफ्ट है?”
पत्नी ने तुरंत पूछा, “पहले यह देखो- सपरिवार लिखा है या सिर्फ हम दोनों का नाम?”
दोनों ने कार्ड उलट-पलटकर देखा।
“सपरिवार तो कहीं नहीं लिखा।”
“तो बच्चों को ले जाएँ या नहीं?”
अभी यह पहेली सुलझी भी नहीं थी कि पत्नी की नज़र वेन्यू पर गई-“अरे! फाइव स्टार होटल है।”
पति ने गहरी साँस ली-“अब क्या हुआ?”
“₹1100 का शगुन अच्छा लगेगा?”
पति ने कार्ड, ड्राई फ्रूट्स और फिर अपनी पत्नी को देखा-
“शादी उनकी है या परीक्षा हमारी?”
सचमुच, आज शादी का निमंत्रण घर में आते ही केवल खुशी नहीं लाता, अपने साथ पूरा सामाजिक अकगणित भी लेकर आता है।
सबसे पहले प्रश्न उठता है-“कार्ड आया या नहीं?”
“हमें तो आया है।”
“अच्छा! गुप्ता जी को आया?”
“नहीं!”
बस, चेहरे पर हल्की-सी गर्व की चमक आ जाती है। मानो निमंत्रण-पत्र नहीं, सामाजिक महत्त्व का प्रमाण-पत्र मिला हो। और जिसे कार्ड नहीं आया, उसके मन में दूसरा गणित शुरू-
“हमने तो उनकी बेटी की शादी में पूरा परिवार लेकर गए थे!”
“हमारे यहाँ वे दो-दो कार्यक्रमों में आए थे!”
यानी शादी अभी हुई भी नहीं और रिश्तों की पुरानी बैलेंस शीट खुल गई।
कार्ड आ जाए तो अगली परेशानी-जाएँ कितने लोग? कार्ड पर “सपरिवार” नहीं लिखा तो बच्चों को ले जाना उचित होगा या नहीं? और यदि पूरा परिवार पहुँच गया तो कहीं मेज़बान यह न सोचे-“बुलाया दो को था, आ गए पाँच!”
मेज़बान की अपनी चिंता भी कम नहीं। आज रोका, सगाई, मेहंदी, हल्दी, संगीत, कॉकटेल, शादी और रिसेप्शन- विवाह एक समारोह नहीं, पूरा उत्सव-सप्ताह बन चुका है।
अब मेज़बान सोचता है-किसे मेहंदी में बुलाएँ, किसे संगीत में, किसे केवल शादी में? एक को संगीत में बुलाया और दूसरे को नहीं, तो कहीं उसे पता न चल जाए!
उधर मेहमान कैलेंडर देखकर परेशान- “आखिर जाएँ किस-किस में?”
हर कार्यक्रम में जाना रिश्तेदारी की माँग है, लेकिन हर कार्यक्रम के लिए समय, ट्रैफिक और अलग पहनावा भी चाहिए। हल्दी में पीला, मेहंदी में हरा, संगीत में कुछ ग्लैमरस और शादी में पारंपरिक!
कभी-कभी लगता है, दूल्हा-दुल्हन से ज्यादा परीक्षा मेहमान की अलमारी की हो रही है।
फिर आता है इस पूरी व्यवस्था का सबसे कठिन अध्याय- शगुन कितना डालें?
पहले शायद शगुन अपनी श्रद्धा, रिश्ते और सामर्थ्य से दिया जाता था। आज उसकी गणना का फार्मूला कठिन हो गया है-
रिश्ता कितना करीबी + कार्ड कितना महँगा + साथ आया बॉक्स + वेन्यू कितना आलीशान + हम कितने लोग जा रहे हैं = शगुन कितना होना चाहिए?
और कई बार यह गणित रिश्तों की समझ से भी बाहर निकल जाता है।
अपने सगे भतीजे की शादी में ₹1100 सहजता से दे दिए। कुछ दिन बाद किसी परिचित के बेटे की शादी फाइव स्टार होटल में है। मेज़बान बड़ा आदमी है, कार्ड शानदार है, साथ में महँगा बॉक्स भी आया है।
“₹2100 कर दें?”
“अरे! इतनी बड़ी शादी में ₹2100 अच्छा लगेगा?”
“तो ₹5100?”
और ₹5100 लिफाफे में चले जाते हैं।
मन पूछता रह जाता है-भतीजे से रिश्ता छोटा था या परिचित की हैसियत बड़ी?
बात ₹1100 या ₹5100 की नहीं है। हर व्यक्ति अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार कितना भी दे सकता है। सवाल तब पैदा होता है जब हम अपनी हैसियत से नहीं, सामने वाले की हैसियत देखकर शगुन तय करने लगते हैं।
जिसके पास पहले ही बहुत है, उसके सामने हमें अपनी सामाजिक छवि बचानी है; और जो अपना है, उसके सामने कुछ साबित करने की आवश्यकता ही नहीं!
आखिर हमारे लिए अधिक जरूरी क्या हो गया-रिश्ता या समाज में अपनी छवि?
मेज़बान की तरफ भी हिसाब कभी-कभी कम दिलचस्प नहीं होता।
“उनके यहाँ से कितने लोग आए?”
“पाँच।”
“शगुन?”
“₹1100।”
और मन ही मन प्लेटों का गुणा-भाग शुरू!
यानी मेहमान लिफाफे का हिसाब लगा रहा है और मेज़बान प्लेटों का।
जिस शगुन का अर्थ शुभकामना था और जिस भोजन का अर्थ प्रेम से अतिथि-सत्कार, दोनों कब लेन-देन की मानसिक बही में दर्ज होने लगे, पता ही नहीं चला।
और शादी के दिन?
मेहमान सज-धजकर पहुँचा। गेट पर नाम दर्ज हुआ, शगुन का लिफाफा सही जगह पहुँचा-मानो Entry Ticket जमा हो गया।
अंदर जाकर पूछा, “दूल्हा-दुल्हन कहाँ हैं?”
“बस, आने वाले हैं।”
एक घंटा बीता। फिर दूसरा। अगले दिन ऑफिस है, बच्चे थक गए हैं। आखिर फैसला हुआ—”चलो खाना खा लेते हैं।” खाना खाया, परिचितों से नमस्ते की और घर लौट आए।
अगले दिन कोई पूछता है-
“दुल्हन कैसी लगी?”
“हमारे आने तक तो आई नहीं थी!”
“फिर आशीर्वाद?”
“लिफाफा दे आए थे न!”
यहीं हँसी के पीछे एक कड़वा सच छिपा है।
कई बार मेहमान को ठीक से याद भी नहीं रहता कि परिचित के बेटे की शादी है या बेटी की।
कार्ड आया था, महँगा बॉक्स आया था, इसलिए जाना जरूरी था-
“नहीं गए तो क्या सोचेंगे? इतना कार्ड-बॉक्स देकर गए और ये आए तक नहीं!”
उधर मेज़बान भी सोच रहा है- इतने लोगों को बुलाया, कौन आया और कौन नहीं?
और इस “वे क्या सोचेंगे?” तथा “हम क्या सोचेंगे?” के बीच कहीं विवाह की सहज खुशी पीछे छूट जाती है।
शादियाँ सुंदर हों, भव्य हों, खूब उत्सव हो- इसमें कुछ गलत नहीं। खुशियाँ मनाने पर कोई पहरा क्यों हो? लेकिन कभी-कभी रुककर इतना पूछना जरूरी है-
क्या हम खुशी का उत्सव मना रहे हैं या हैसियत का प्रदर्शन?
कार्ड भारी हो गया, बॉक्स महँगा हो गया, फंक्शन बढ़ गए, कपड़े डिज़ाइनर हो गए, वेन्यू आलीशान हो गया और बजट कई गुना बढ़ गया।
पर क्या अपनापन भी उतना ही बढ़ा?
पहले कार्ड का मतलब था – “हमारी खुशी में शामिल होइए।”
आज कई बार उसका अर्थ हो गया है – “हमने बुलाया है, अब आना आपकी जिम्मेदारी है।”
पहले शगुन में राशि से ज्यादा भावना देखी जाती थी। आज कई बार लिफाफा खोलने से पहले ही मन हिसाब लगाने लगता है।
पहले मेहमान आते थे तो मेज़बान खुश होता था – “अपने आए हैं।”
आज कहीं-कहीं मन में यह भी चल रहा होता है – “कितने लोग आए… और कितना देकर गए?”
और मेहमान भी कम परेशान नहीं।
कार्ड मिला तो जाना है?
नहीं गए तो क्या सोचेंगे?
गए तो शगुन कितना दें?
दूल्हा-दुल्हन मिले या नहीं – कम से कम उपस्थिति तो दर्ज हो गई!
बस, यहीं शादी का उत्सव धीरे-धीरे रिश्तों की खुशी से सामाजिक औपचारिकता में बदलने लगता है।
शायद हमें शादी को फिर थोड़ा सरल बनाने की जरूरत है।
ऐसी शादी, जहाँ कार्ड का वजन नहीं, बुलावे का अपनापन महसूस हो।
जहाँ मेहमान की गिनती प्लेटों से नहीं, रिश्तों से हो।
जहाँ शगुन जेब की क्षमता से आए, सामने वाले की हैसियत देखकर नहीं।
और जहाँ दूल्हा-दुल्हन के पास इतना समय जरूर हो कि वे उन लोगों की आँखों में देख सकें, जो सचमुच उन्हें आशीर्वाद देने आए हैं।
क्योंकि अंततः शादी की सबसे सुंदर याद यह नहीं होती कि डेकोरेशन कितने लाख का था, बॉक्स कितना महँगा था या किसने कितना शगुन दिया।
सबसे सुंदर याद वह होती है जब वर्षों बाद कोई मुस्कुराकर कहे – “तुम्हारी शादी में हम सचमुच खुश हुए थे।”
शायद यही वह एक हिसाब है, जिसे किसी डायरी, लिफाफे या कैलकुलेटर में दर्ज करने की जरूरत नहीं पड़ती।
~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर,करनाल
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