यह सबसे बुरा समय था, यह सबसे अच्छा समय भी था!

यह सबसे बुरा समय था, यह सबसे अच्छा समय भी था!

सृजन भट्टाचार्य

भारत ने इतिहास बनते देखा। बारह सालों में पहली बार, नरेंद्र मोदी सरकार को जनता के सामने इस हद तक झुकना पड़ा कि उनके एक करीबी सहयोगी को इस्तीफ़ा देना पड़ा है। नीट पेपर लीक, सीबीएसई ओएसएम मूल्यांकन में गड़बड़ी और देश के युवाओं पर सीजेआई की अपमानजनक टिप्पणियों के बाद, मौजूदा सरकार के प्रति जेन-ज़ी (नई पीढ़ी) के दबे हुए गुस्से और निराशा का सामाजिक विस्फोट हुआ। इसने हाल के समय में भारत के सबसे बड़े और अनोखे जन-आंदोलन को जन्म दिया और आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया।
जैसा कि आज की पीढ़ी, जेन-ज़ी कहती है, यह मामला बहुत बड़ा था। बहुत ही गंभीर।
*


हम सभी जानते हैं कि आगे घटनाक्रम ने क्या रुख लिया। नीट पेपर लीक कोई छोटा-मोटा घोटाला नहीं था। इससे 22 लाख से ज़्यादा परीक्षार्थी प्रभावित हुए और 20 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई। जिस दिन पेपर लीक हुआ, यानी 12 मई 2026 को, एसएफआई देश का पहला छात्र संगठन था, जो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े और प्रभावित छात्रों को न्याय दिलाने की मांग को लेकर सड़कों पर उतरा। सूत्रों के अनुसार, पिछले 10 सालों में देश में यह 151वां पेपर लीक था। केंद्रीय परीक्षाओं के मामले में, एसएफआई की चिंता सिर्फ़ मंत्री के इस्तीफ़े तक सीमित नहीं थीं ; हमने एनटीए को खत्म करने और आख़िरकार नई शिक्षा नीति 2020 को वापस लेने की भी मांग की, क्योंकि सारी समस्याओं की जड़ वहीं है।

हमेशा की तरह, मुख्यधारा की मीडिया ने शुरुआत में नीट उम्मीदवारों की परेशानी को कोई मुद्दा नहीं माना और ज़्यादा से ज़्यादा समय तक लोगों को इस मुद्दे से अनजान बनाए रखने की कोशिश की। लेकिन सीजेआई की उस टिप्पणी के बाद कि देश के युवा ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ की तरह बेकार हैं, युवाओं का गुस्सा जल्द ही डिजिटल दुनिया में उभरने लगा। कुछ ही दिनों में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के सोशल मीडिया अकाउंट्स पर लाखों फ़ॉलोअर्स जुड़ गए, जो एक शांत पड़े ज्वालामुखी के जागने का शुरुआती संकेत था। मौजूदा सरकार के प्रति जेन-ज़ी (नई पीढ़ी) की नाराज़गी दिखने लगी थी ; और 6 जून तक, सीजेपी ने जंतर-मंतर, नई दिल्ली में सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन करने के लिए काफ़ी जन-समर्थन जुटा लिया था।
एसएफआई इस आंदोलन में शुरू से ही शामिल रही है। एक ऐसे संगठन के रूप में, जो पहले से ही सभी राज्यों में इन्हीं मुद्दों पर जनमत तैयार कर रहा था, एसएफआई ने तय किया कि स्वतंत्र पहल करने के साथ-साथ ‘कॉकरोच आंदोलन’ की बड़ी सभाओं में शामिल होना और वहां आने वाले लोगों तक अपना राजनीतिक संदेश पहुंचाना भी बहुत ज़रूरी है। सीजेपी नेतृत्व के तौर-तरीकों को लेकर तमाम आशंकाओं के बावजूद, हमने इस आंदोलन का हिस्सा बनने का फ़ैसला किया। हम अच्छी तरह जानते थे कि हमारी भूमिका आंदोलन के प्रवक्ताओं द्वारा उठाए गए उन आम मुद्दों का समर्थन करना है, जो सरकार की पारदर्शी परीक्षाएँ आयोजित करने में विफलता से जुड़े हैं। इसके साथ ही, जन-आंदोलन के ज़रिए शिक्षा क्षेत्र में और भी ढाँचागत सुधारों की स्वतंत्र रूप से माँग करना है, ताकि इसे ज़्यादा समतापूर्ण और लोकतांत्रिक बनाया जा सके।

जब वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक इस आंदोलन से जुड़े और पेपर लीक के मामले में केंद्र सरकार से जवाबदेही की मांग करते हुए उन्होंने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू की, तो जंतर-मंतर इस आंदोलन का मुख्य केंद्र बन गया। आइसा के कार्यकर्ता भी इस भूख हड़ताल में शामिल हुए। एसएफआई ने सीजेपी टीम के रुख के मुताबिक यह तय किया कि जब सीजेपी भूख हड़ताल शुरू करेगी, तब वे भी उसमें शामिल होंगे ; और फिलहाल, वे मिलकर ज़्यादा से ज़्यादा छात्रों को इस आंदोलन से जोड़ने का काम करेंगे। सीपीआई (एम) और अन्य वामपंथी पार्टियों ने हर तरह से अपना समर्थन दिया। जंतर-मंतर पर चल रहे धरने में गैर-भाजपा सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के नेताओं के साथ-साथ धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी भी मौजूद थे।

जल्द ही जंतर-मंतर एक ऐसी जगह बन गई, जहाँ देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग — बिना किसी जाति, पंथ या धर्म के भेदभाव के — आने और साथ रहने लगे। लोगों की भीड़ वहाँ दिन-रात एक-दूसरे से बातचीत करती थी, और देखते ही देखते यह जगह नफ़रत और ‘दूसरों को अलग-थलग करने’ की उस राजनीति के ख़िलाफ़ एक जीवंत आवाज़ बन गई, जिसे आरएसएस-भाजपा बढ़ावा देती है। यह इस आंदोलन का एक अहम पहलू है, क्योंकि इसने दिखाया कि कैसे सभी नागरिकों से जुड़ा कोई मुद्दा लोगों को एक साथ ला सकता है, भले ही ‘गोदी मीडिया’ और भाजपा की बदनाम आईटी सेल लगातार ज़हरीला प्रोपेगैंडा फैलाते रहे हों। जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन किसी उत्सव जैसा लगता था, जहाँ हर तबके और क्षेत्र के हज़ारों लोग रोज़ाना इकट्ठा होते थे। एसएफआई के स्टॉल, ‘क्रांति कॉर्नर’, ने जंतर-मंतर की रौनक बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई।
*

इस आंदोलन में एक बड़ा बदलाव तब आया, जब सोनम वांगचुक को उनकी भूख हड़ताल के 21वें दिन दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर धरना स्थल से ज़बरदस्ती उठा लिया। पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। अब तक मुख्य रूप से छात्रों और युवाओं का यह आंदोलन एक बड़े जन-आंदोलन का रूप लेने लगा था। सिविल सोसाइटी ने आवाज़ उठानी शुरू की और दिल्ली पुलिस के इस अलोकतांत्रिक कदम के ख़िलाफ़ ज़बरदस्त विरोध शुरू हो गया। ध्यान रहे कि दिल्ली पुलिस सीधे भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन आती है। एसएफआई के अखिल भारतीय अध्यक्ष आदर्श एम. साजी और संयुक्त सचिव आइशी घोष, सीजेपी के प्रमुख अभिजीत दिपके के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। जंतर-मंतर पर लोगों की भारी भीड़ जुटने लगी और प्रदर्शनकारियों ने 20 जुलाई को संसद तक शांतिपूर्ण मार्च निकालने का आह्वान किया।

20 जुलाई का दिन इस आंदोलन के लिए एक अहम मोड़ साबित हुआ। एक रात पहले से ही हज़ारों लोग नई दिल्ली में जुटने लगे थे। उनकी मांग साफ़ थी : शिक्षा व्यवस्था में हुई गड़बड़ियों के लिए सरकार जवाबदेही तय करे और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें। सरकार के पास प्रदर्शनकारियों से बातचीत करके इस मुद्दे को सुलझाने का विकल्प था, लेकिन इसके बजाय उसने बेतहाशा हिंसा का रास्ता चुना। जंतर-मंतर को जलियांवाला बाग़ जैसा बना दिया गया ; प्रदर्शन वाली जगह के चारों ओर बैरिकेड्स लगा दिए गए। मासूम छात्रों से निपटने के लिए नई दिल्ली में पुलिस, आरएएफ और दूसरे बलों की भारी टुकड़ियाँ बुलाई गईं, यहाँ तक कि दूसरे राज्यों से भी बल मंगाए गए। ऐसा लग रहा था जैसे सरकार ने अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ गृह-युद्ध छेड़ दिया हो। एक तरफ़ प्रदर्शनकारी जनता थी, तो दूसरी तरफ़ पूरा सरकारी तंत्र, जो जनता पर बेरहमी से कार्रवाई करने के लिए तैयार बैठा था।

बैरिकेड्स टूट गए। पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद, हज़ारों छात्र संसद की ओर जाने वाली सड़कों पर पहुँच गए। किसी का भी मकसद संसद पर कब्ज़ा करना नहीं था। वे बस इतना चाहते थे कि सरकार उनकी शिकायतों पर ध्यान दे। प्रधानमंत्री संसद से चले गए। कुछ देर बाद पुलिस ने अंधाधुंध लाठीचार्ज शुरू कर दिया। प्रदर्शनकारियों को चुप कराने के लिए आँसू गैस, काँटेदार डंडे, इलेक्ट्रिक शॉक और पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया। घंटों तक देश की राजधानी का मुख्य इलाका पुलिस की अकल्पनीय बर्बरता का गवाह बना। बेगुनाह प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट और बदसलूकी की गई और उन्हें हिरासत में लिया गया। पुलिस बल के बीच छिपे आरएसएस के गुंडों ने भीड़ पर हमला किया। दुनिया ने हैरानी के साथ देखा कि कोई सरकार अपने ही लोगों के साथ कितनी बेरहमी से पेश आ सकती है। हज़ारों लोग प्रभावित हुए और सैकड़ों लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। 40 से ज़्यादा एसएफआई कार्यकर्ताओं को प्राथमिक इलाज के लिए अस्पताल ले जाना पड़ा।

यहीं पर आम लोगों ने अपनी मज़बूत इच्छाशक्ति दिखाई। हर उस मोड़ पर, जब सरकार को लगा कि वह जोर-जबरदस्ती से आंदोलन को खत्म कर देगी, प्रदर्शनकारी और ज़्यादा जोश के साथ वापस आए। शाम तक, भीड़ फिर से एकजुट हुई और जंतर-मंतर पर जमा हो गई। तब तक दिल्ली पुलिस ने वहाँ सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। उसी मलबे से आंदोलन का पुनर्जन्म हुआ। कॉकरोचों (प्रदर्शनकारियों) ने ज़ोर से ऐलान किया कि यहाँ से एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे, या तो प्रधान इस्तीफ़ा दें, या फिर यह विद्रोह और बड़ा हो जाएगा। यहाँ कोई बीच का रास्ता नहीं था। मासूम नागरिकों पर पुलिस के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ पूरा भारत गुस्से से उबल रहा था। चोटों, ज़ख्मों और पट्टियों के बावजूद, छात्रों ने राष्ट्रीय ध्वज और देशभक्ति के नारों को फिर से अपनाया और 20 जुलाई की रात तक उन्हें अलोकतांत्रिक मोदी सरकार की ओर मोड़ दिया।

भाजपा की परेशानी तब और बढ़ गई, जब देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं ने ज़बरदस्त विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। खासकर कोलकाता, पटना और मुंबई में ‘कॉकरोच आंदोलन’ के समर्थन में भारी भीड़ सड़कों पर उतर आई। केरल से असम और हिमाचल से तेलंगाना तक, 23 राज्यों में एसएफआई के नेतृत्व में पुलिस की बर्बरता के खिलाफ़ बड़े विरोध-प्रदर्शन हुए। राज्यों में बर्बरता जारी रही, लेकिन जेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों का जोश कभी कम होता नहीं दिखा। विरोध जताने के उनके अनोखे, नए और मज़ेदार तरीकों से यह साफ़ पता चलता था कि सरकारी दमन के डर पर बदलाव लाने का साहस और पक्का इरादा हावी हो गया था। फासीवादी मोदी सरकार के खिलाफ़ गुस्सा — जो धर्मेंद्र प्रधान के तुरंत इस्तीफ़े की मांग में बदल गया — देश के हर हिस्से में साफ़ तौर पर देखा जा सकता था।

सीजेपी प्रतिनिधियों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद, सरकार उनकी ज़्यादातर माँगें मानने को तैयार हो गई। दो अहम माँगें थीं — नीट पीड़ितों के परिवारों को मुआवज़ा देना और प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी केस वापस लेना। इन दोनों बातों पर सहमत होने के बावजूद, सरकार आखिर तक धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े पर बातचीत टालने की कोशिश करती रही। तब तक, यह मामला सिर्फ़ सीजेपी के हाथ में भी नहीं रह गया था। आम लोगों ने साफ़ कर दिया था कि वे शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े से कम कुछ भी मंज़ूर नहीं करेंगे। 20 जुलाई को हुई ज़्यादतियों के लिए प्रधानमंत्री से सार्वजनिक माफ़ी की भी माँग की गई। यह भांपते हुए कि आंदोलन पूरे देश में फैल चुका है और अब किसी भी तरह के नफ़रत भरे अभियान या दमनकारी रवैये से प्रदर्शनकारियों को हराना मुमकिन नहीं होगा, 25 जुलाई की दोपहर धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया।

हमने देखा कि नई पीढ़ी अपनी बात पर अड़ गई और उसने कहा, बस बहुत हो गया। तुम्हारी बांटने वाली चालें अब हमें बेवकूफ नहीं बना सकतीं। यह सच में ऐतिहासिक था।
*

अब ज़्यादा मुश्किल सवाल उठता है। सीजेपी किस रास्ते पर चलेगा? क्या आम लोग अपनी पूरी क्षमता को पहचान पाएंगे, या यह आंदोलन सिर्फ़ एक मंत्री के इस्तीफ़े तक ही सीमित रह जाएगा?

फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि अगर कोई और नहीं, तो एसएफआई उन सभी ताकतों को एकजुट करने के लिए अथक प्रयास करेगा, जो भारत की शिक्षा नीतियों में केवल दिखावटी बदलाव नहीं, बल्कि वास्तविक संरचनात्मक सुधारों की मांग कर रही हैं। हम सीजेपी टीम पर कड़ी नज़र रखेंगे और विश्लेषण करेंगे कि वे किस दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। ‘कॉकरोच आंदोलन’ ने एक लोकतांत्रिक मंच तैयार किया था, जिसके निश्चित रूप से कुछ मुख्य आधार थे, लेकिन उनसे भी अधिक, यह आम जनता थी, जिसने सामान्य न्यूनतम मांगों के आधार पर आंदोलन को स्वतःस्फूर्त रूप से आगे बढ़ाया है। अब भारत की चरमराई सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को बचाने के लिए आगे की पहल करना एसएफआई का काम है। हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
*

मार्क्स ने हीगेल के ‘अधिकार के दर्शन’ की आलोचना में लिखा था कि जब कोई विचार आम लोगों द्वारा अपना लिया जाता है, तो वह एक भौतिक शक्ति बन जाता है। भारत ने मई-जुलाई 2026 के दौरान एक ऐसा जन-विद्रोह देखा, जिसने खुद को अजेय समझने वालों को ज़बरदस्त तरीके से उनकी असलियत दिखा दी है। आम जनता की ओर से हुआ यह प्रतिरोध बेहद ज़रूरी था, खासकर इसलिए, क्योंकि इसने फासीवादियों को भी यह सिखा दिया कि सत्ता में बैठे लोगों की तुलना में जनता की शक्ति कहीं ज़्यादा बड़ी होती है।

अंग्रेजी से अनुवाद : संजय पराते

लेखक स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) के महासचिव हैं।

अनुवादक छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *