जनसंहार हथियारों से नहीं, शब्दों से शुरू होते हैं

चिंतन

जनसंहार हथियारों से नहीं, शब्दों से शुरू होते हैं

सतीश महम

पिछले कुछ वर्षों में समाज और सार्वजनिक विमर्श में जिस तरह की भाषा सामान्य होती जा रही है, उससे किसी भी सभ्य इंसान का बेचैन होना स्वाभाविक है।

बार-बार कुछ समुदायों, धर्मों या समूहों के लिए ऐसे शब्द सुनाई देने लगे हैं, जो किसी इंसान के लिए नहीं, बल्कि किसी बीमारी, गंदगी या कीड़े-मकोड़ों के लिए इस्तेमाल होते हैं।

कभी किसी को “परजीवी” कहा जाता है।
कभी “देश पर बोझ, आंदोलनजीवी, टुकड़े टुकड़े गैंग, आरक्षणजीवी, लवजेहाद।“
कभी “गंदगी”।
और कभी सीधे “चूहा”, “कॉकरोच” या “कीड़ा”।

मुझे इतिहास की बहुत विस्तृत जानकारी नहीं है।

इसलिए शुरुआत में लगा कि यह केवल सोशल मीडिया का ज़हर होगा।

लेकिन फिर मन में एक सवाल उठा,

क्या इतिहास में भी नफ़रत की शुरुआत इसी तरह हुई थी?

मैंने उपलब्ध संसाधनों से जानना और समझना शुरू किया।

जो सामने आया, उसने भीतर तक डरा दिया।

इतिहास बताता है कि बड़े जनसंहार अचानक नहीं होते।
वे पहले भाषा में जन्म लेते हैं।
पहले किसी समुदाय का मज़ाक उड़ाया जाता है।
फिर उसे समाज की समस्या बताया जाता है।
फिर उसकी मानवता पर हमला किया जाता है।
और अंततः उसे इंसान नहीं, बल्कि “खतरा” घोषित कर दिया जाता है।
यहीं से सभ्यता का पतन शुरू होता है।

सबसे भयावह उदाहरण होलोकॉस्ट था।

1930 और 1940 के दशक में और नाज़ी प्रचार मशीन ने जर्मनी की आर्थिक समस्याओं, बेरोज़गारी और राष्ट्रीय अपमान का दोष यहूदियों पर डालना शुरू किया।

नाज़ी अखबार डेर श्टूर्मर लगातार यहूदियों को “परजीवी” और “राष्ट्र की बीमारी” बताता था।

1940 में बनी नाज़ी प्रचार फ़िल्म डेर एवीगे यूदे में यहूदियों की तुलना चूहों से की गई। फ़िल्म में चूहों के झुंड दिखाकर कहा गया कि जैसे चूहे बीमारी फैलाते हैं, वैसे ही यहूदी समाज को “अंदर से नष्ट” कर रहे हैं।

यह केवल अपमान नहीं था।

यह लोगों के दिमाग में यह भावना भरने की प्रक्रिया थी कि सामने वाला इंसान नहीं है।

फिर क्या हुआ?

1935 के नूर्नबर्ग कानूनों के तहत यहूदियों से नागरिक अधिकार छीने गए।

उन्हें सरकारी नौकरियों, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन से बाहर किया गया।
फिर उन्हें अलग बस्तियों और घेट्टो में धकेला गया।

और अंततः गैस चैंबरों और यातना शिविरों में लगभग 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी गई।

इतिहास का दूसरा भयावह उदाहरण है।

1994 के जनसंहार से पहले उग्र हूतू राष्ट्रवादी रेडियो चैनल लगातार तुत्सी समुदाय को “Inyenzi”, यानी “कॉकरोच”, कहकर पुकारते थे।

रेडियो प्रसारणों में खुलेआम कहा जाता था,
“कॉकरोचों को कुचल दो।”

यह केवल नफ़रत नहीं थी।
यह लोगों की संवेदनाओं को खत्म करने की रणनीति थी।

जब किसी इंसान को बार-बार “कीड़ा” कहा जाए, तब उसकी हत्या भी हत्या नहीं लगती।

और फिर वही हुआ।

करीब 100 दिनों में लगभग 8 लाख तुत्सी और उदार हूतू मारे गए।

पड़ोसियों ने पड़ोसियों को काट डाला।
साधारण नागरिक भी हत्यारे बन गए।

क्योंकि प्रचार ने पहले ही उनके भीतर से इंसानियत खत्म कर दी थी।

में भी यही पैटर्न दिखाई दिया।

1990 के दशक में उग्र सर्ब राष्ट्रवादी प्रचार ने बोस्नियाई मुसलमानों को “खतरा” और “अशुद्ध तत्व” की तरह चित्रित करना शुरू किया।

“जातीय शुद्धता” और “राष्ट्र की रक्षा” के नाम पर लोगों के भीतर डर और घृणा पैदा की गई।

परिणामस्वरूप सामूहिक हत्याएँ, बलात्कार शिविर और जातीय सफाया हुआ।

1995 के में हजारों बोस्नियाई मुस्लिम पुरुषों और लड़कों की हत्या कर दी गई।

इटली में के फासीवादी शासन ने भी अतिराष्ट्रवाद, नस्लवादी श्रेष्ठता और “राष्ट्र की शुद्धता” की राजनीति को बढ़ावा दिया।

राज्य-प्रचार का उद्देश्य केवल सत्ता बनाए रखना नहीं था, बल्कि जनता को यह विश्वास दिलाना था कि कुछ लोग “कमतर” हैं और राष्ट्र के लिए खतरा हैं, भी इसी मानसिकता का उदाहरण था।
श्वेत वर्चस्ववादी शासन ने अश्वेत लोगों को बराबर इंसान की तरह नहीं देखा।
भेदभाव को कानून बना दिया गया।
स्कूल, अस्पताल, परिवहन और बस्तियाँ — सब कुछ नस्ल के आधार पर अलग कर दिया गया।

जब राज्य यह तय करने लगे कि कौन “उच्च” है और कौन “कमतर”, तब इंसानियत हारने लगती है।

इन सभी घटनाओं में एक बात समान थी
हत्या से पहले अमानवीकरण हुआ था।
पहले भाषा जहरीली हुई।
फिर समाज संवेदनहीन हुआ।
फिर हिंसा सामान्य लगने लगी।

इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि जनसंहार बंदूकों से पहले शब्दों में जन्म लेते हैं।

जब राजनीति इंसानों को “कीड़ा”, “परजीवी”, “गंदगी” या “देश की बीमारी” बताने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि समाज एक खतरनाक दिशा में बढ़ रहा है।

क्योंकि किसी भी समाज में नफ़रत कभी सीधे हत्या से शुरू नहीं होती।
वह पहले शब्दों से शुरू होती है।
पहले भाषा बदलती है।
फिर संवेदनाएँ मरती हैं।
और अंत में इंसान मरने लगते हैं।

सभ्य समाज की पहचान यह नहीं कि वहाँ मतभेद नहीं होते।
सभ्य समाज की पहचान यह है कि मतभेद के बावजूद वह किसी इंसान की मानवता को खत्म नहीं होने देता।
और जिस दिन समाज लोगों को इंसान नहीं, बल्कि “समस्या” समझने लगता है, उसी दिन इंसानियत मरना शुरू हो जाती है।

रणबीर सिंह दहिया के ब्लाग से साभार

Comments

Your email address will not be published.

0