अव्वलता का अर्थ अपराध नहीं होता

कभी आदेश बाहर से आता था, अब कई बार भीतर से उठता है। कभी कोई सत्ता हमारी सीमाएँ तय करती थी, अब अनेक बार हमारी इच्छाएँ, भय और पूर्वाग्रह स्वयं हमारे चारों ओर दीवारें खड़ी कर देते हैं।

अव्वलता अर्थ अपराध नहीं होता

रत्ना भदौरिया

 

अगर महिलाएँ अव्वल होना चाहती हैं तो उन्हें अव्वल बनने से कौन रोक सकता है? वे बनें। वे इतनी अव्वल बनें कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था की कोई भी जड़, कोई भी पूर्वाग्रह, कोई भी संकीर्ण सोच उनके मार्ग में बाधा न बन सके। वे शिक्षा में, ज्ञान में, नेतृत्व में, विज्ञान में, कला में, राजनीति में और जीवन के हर क्षेत्र में अपनी ऐसी पहचान स्थापित करें कि इतिहास उन्हें संघर्ष और उपलब्धि के अद्भुत उदाहरण के रूप में याद रखे।

लेकिन एक प्रश्न है, जिसे पूछना आज आवश्यक हो गया है—क्या अव्वलता का अर्थ केवल शक्ति प्राप्त करना है? और यदि शक्ति प्राप्त हो जाए तो क्या उसका उपयोग उसी प्रकार किया जाए, जिस प्रकार कभी पितृसत्ता ने अपने वर्चस्व के लिए किया था?

किसी भी व्यवस्था का विरोध इसलिए नहीं किया जाता कि उसके केंद्र में कोई विशेष लिंग था। उसका विरोध इसलिए किया जाता है क्योंकि उसमें अन्याय था, असमानता थी, दमन था और शक्ति का दुरुपयोग था। इसलिए यदि कोई व्यक्ति या समूह उस व्यवस्था को परास्त करके स्वयं उसी दमन, उसी हिंसा और उसी अनैतिकता का सहारा लेने लगे, तो वह परिवर्तन नहीं कहलाता; वह केवल सत्ता के चेहरे का परिवर्तन होता है।

आज समाज के सामने यही विडंबना खड़ी है। एक ओर स्त्री-सशक्तिकरण की बातें हैं, समानता के दावे हैं, स्वतंत्रता की घोषणाएँ हैं; दूसरी ओर समय-समय पर ऐसी घटनाएँ भी सामने आती हैं जो यह सोचने पर विवश करती हैं कि कहीं हम सशक्तिकरण और उच्छृंखलता के बीच का अंतर तो नहीं भूल रहे। जब किसी महिला द्वारा किया गया अपराध सामने आता है, तब अक्सर समाज का एक हिस्सा उसे अपराध की तरह देखने के बजाय किसी सामाजिक प्रतिक्रिया या व्यक्तिगत विवशता के चश्मे से देखने लगता है। यह दृष्टि स्वयं न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है।

अपराध की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह अपराधी का लिंग नहीं पूछता। हत्या, हिंसा, षड्यंत्र, छल और क्रूरता का कोई स्त्री या पुरुष संस्करण नहीं होता। वे अपने स्वरूप में समान रूप से अमानवीय होते हैं। इसलिए यदि कोई पुरुष किसी की हत्या करता है तो वह अपराधी है; और यदि कोई महिला वही करती है तो उसके लिए भी वही शब्द प्रयुक्त होना चाहिए। न्याय का तराजू किसी के लिंग के आधार पर हल्का या भारी नहीं होना चाहिए।

दुर्भाग्य यह है कि आधुनिक विमर्श के कुछ हिस्सों में समानता का अर्थ उत्तरदायित्व की समानता नहीं, बल्कि अधिकारों की एकतरफा व्याख्या बनकर रह गया है। वहाँ स्वतंत्रता तो चाहिए, पर उसके साथ आने वाली नैतिक जवाबदेही पर उतनी चर्चा नहीं होती। परिणाम यह होता है कि जब कोई महिला अपराध करती है तो कुछ लोग उसे व्यक्तिगत घटना न मानकर सामाजिक संघर्ष का विस्तार सिद्ध करने का प्रयास करने लगते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल कानून के लिए, बल्कि स्त्री-अधिकार आंदोलन के लिए भी हानिकारक है।

क्योंकि किसी भी आंदोलन की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अपने पक्ष के लोगों के अपराधों की भी उतनी ही स्पष्ट आलोचना कर सके, जितनी वह विरोधी पक्ष के अपराधों की करता है।

समाज को ऐसी महिलाएँ नहीं चाहिए जो यह साबित करें कि वे हिंसा में भी बराबरी कर सकती हैं। समाज को ऐसी महिलाएँ चाहिए जो यह सिद्ध करें कि शक्ति का उपयोग विनाश नहीं, निर्माण के लिए किया जा सकता है। जो यह दिखाएँ कि नेतृत्व का अर्थ भय पैदा करना नहीं, बल्कि विश्वास पैदा करना है। जो यह प्रमाणित करें कि संवेदना, विवेक और नैतिक साहस किसी भी प्रकार की आक्रामक सत्ता से कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं।

यदि पितृसत्ता का सबसे कुरूप चेहरा हिंसा और प्रभुत्व था, तो उसका उत्तर हिंसा और प्रभुत्व नहीं हो सकता। यदि अतीत की समस्या शक्ति का दुरुपयोग थी, तो भविष्य का समाधान शक्ति का नैतिक उपयोग होना चाहिए। अन्यथा हम केवल एक अन्याय को हटाकर दूसरे अन्याय की स्थापना कर देंगे।

स्त्री की वास्तविक विजय तब नहीं होगी जब वह पुरुष की हर अच्छाई और बुराई की प्रतिकृति बन जाएगी। उसकी वास्तविक विजय तब होगी जब वह समाज को एक उच्चतर नैतिक धरातल प्रदान करेगी। जब वह यह साबित करेगी कि समानता का अर्थ अपराध में बराबरी नहीं, बल्कि चरित्र में श्रेष्ठता है; कि स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है; और कि शक्ति का सर्वोच्च रूप किसी को कुचलने में नहीं, बल्कि स्वयं को संयमित रखने में निहित है।
इसलिए महिलाओं की अव्वलता का स्वागत होना चाहिए, लेकिन वह अव्वलता ज्ञान की हो, विवेक की हो, सृजन की हो, संघर्ष की हो और मानवीयता की हो। अपराध, हिंसा और प्रतिशोध में अव्वल होना किसी समाज की उपलब्धि नहीं, उसके नैतिक पतन का संकेत है।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहाँ कौन सत्ता में है, बल्कि इस बात से होती है कि वहाँ न्याय किसके पक्ष में खड़ा है। और न्याय का पहला सिद्धांत यही है कि अपराधी केवल अपराधी होता है—न वह पुरुष होता है, न महिला।

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

 

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