दादी का लोहे का संदूक: हमारी जड़ों का आख़िरी पता

घर – परिवार

दादी का लोहे का संदूक: हमारी जड़ों का आख़िरी पता

  • उसके अंदर रखी हर चीज़ आज भी दादी की आवाज़ में बात करती है

डॉ रीटा अरोड़ा

घर के सबसे अंधेरे कमरे में, जहाँ अब पुराने पंखे, टूटे खिलौने और बेकार समझी जाने वाली चीज़ें धूल खा रही हैं… वहीं एक कोने में दादी का लोहे का संदूक पड़ा है।

चुप। भारी। थोड़ा जंग लगा हुआ।

और इतना खामोश कि लगता है जैसे उसने बोलना छोड़ दिया हो।

उस पर धूल की मोटी परत जम चुकी है। हरे और नीले रंग की पुरानी पुताई जगह-जगह से उखड़ चुकी है। लोहे के कुंडों पर जंग जम चुका है।

लेकिन सच कहूँ? उस संदूक में आज भी पूरा परिवार साँस लेता है।

दादी का लोहे का संदूक कभी सिर्फ एक बक्सा नहीं था।

वह घर का बैंक (Bank) था… अलमारी था… यादों का तहखाना था… और कई बार तो पूरा इतिहास भी।

मुझे आज भी याद है – दादी जब उस भारी लोहे के संदूक की चाबी अपनी साड़ी के पल्लू में बाँधकर खोलती थीं, तो ऐसा लगता था जैसे किसी खजाने का दरवाज़ा खुलने वाला हो।

“खट्…” ताला खुलता था।

“घर्रऽ…”

लोहे का ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठता था।

और फिर आती थी एक खुशबू – पुराने कपड़ों, कपूर, हल्दी, मिट्टी और बंद पड़े वर्षों की मिली-जुली खुशबू। वह खुशबू किसी ब्रांडेड परफ्यूम में नहीं मिल सकती। क्योंकि वह खुशबू “बीते हुए जीवन” की थी।

उस संदूक में दादी की साड़ियाँ होती थीं। कुछ हल्की पीली पड़ चुकी… कुछ किनारों से घिसी हुई…

लेकिन हर साड़ी में एक कहानी तह करके रखी होती थी।

“ये वाली तेरे पापा की शादी में पहनी थी…”

“ये तेरी माँ की पहली तीज पर…”

“और ये… ये तेरे दादा जी को बहुत पसंद थी…”

आज की जनरेशन मेमोरीज़ क्लाउड (Cloud) में सेव करती है।

हमारी दादी उन्हें संदूक में संभालकर रखती थीं।

उस संदूक में सिर्फ कपड़े नहीं होते थे। उसमें त्योहार रहते थे। राखियाँ रहती थीं। पुराने खत रहते थे।

कुछ चाँदी के सिक्के… कुछ टूटी चूड़ियाँ… भगवान की तस्वीरें…

और कई ऐसी चीज़ें जिनकी कोई मार्केट वैल्यू नहीं थी लेकिन इमोशनल वैल्यू पूरी दुनिया से बड़ी थी।

आज के बच्चे पूछेंगे – “इतना पुराना सामान संभालकर क्यों रखा था?”

क्योंकि बेटा… उन लोगों के पास स्टोरेज कम था, लेकिन अटैचमेंट बहुत ज्यादा थी।

आज हमारे पास अनलिमिटेड स्टोरेज है… लेकिन याद रखने के लिए एक भी रिश्ता नहीं।

पहले जब घर में कोई बच्चा पैदा होता था, दादी उसी संदूक से छोटे-छोटे कपड़े निकालती थीं। जब शादी होती थी, उसी में से गहने निकलते थे। जब कोई मरता था, सफेद कपड़ा भी उसी से आता था। पूरा जीवन उस लोहे के संदूक से होकर गुजरता था।

जन्म भी।

शादी भी।

मौत भी।

दादी का लोहे का संदूक सुंदर नहीं था… लेकिन सच्चा था। उस पर बच्चों ने चॉक (Chalk) से नाम लिखे होते थे। किसी कोने पर चाय गिर चुकी होती थी। कहीं हल्दी का दाग होता था। मतलब उसमें “इंसान” रहते थे।

दादी का संदूक कभी अकेला नहीं रहता था। उसके ऊपर हमेशा कोई रजाई रखी होती थी। पास में भगवान की छोटी-सी फोटो (Photo)। और अक्सर कोई बच्चा उस पर बैठकर आम खा रहा होता था।वह घर का फर्नीचर नहीं था। वह घर का सदस्य था।

लेकिन मॉडर्नाइजेशन नाम की बीमारी ने सबसे पहले उसी को मारा। आज की मॉड्यूलर वॉर्डरोब्स को देखो। इतनी चमकदार कि आदमी अपना चेहरा देख ले। लेकिन उनमें इतिहास नहीं रहता। उनमें सिर्फ ब्रांडेड कपड़े टंगे रहते हैं।

एक दिन घर में नया इंटीरियर आया।

और फिर किसी ने कहा – “ये पुराना लोहे का संदूक बहुत आउटडेटेड लगता है।”

बस।

उसी दिन उसे स्टोररूम में निर्वासित कर दिया गया। जिस संदूक ने तीन पीढ़ियों को संभाला… आज उसे पुराने अखबारों और टूटी बाल्टियों के साथ बोझ समझ फेंक दिया गया।

आज की दुनिया यूज़-एंड-थ्रो वाली हो गई है।

रिश्ते भी।

लोग भी।

भावनाएँ भी।

पुराने लोग चीज़ें नहीं फेंकते थे क्योंकि वे अटैचमेंट में विश्वास करते थे।

अगली बार जब घर जाओ तो उस पुराने लोहे के संदूक को एक बार खोलना।

धीरे से।

हो सकता है उसमें तुम्हारा बचपन अभी भी तह करके रखा हो।

हो सकता है किसी कोने में दादी की खुशबू अब भी बची हो।

हो सकता है कोई पुराना खत तुम्हें याद दिला दे कि इस घर में कभी लोग “टाइपिंग… (Typing…)” नहीं, सच में इंतज़ार किया करते थे।

और शायद…

*तुम समझ जाओ कि जड़ें जमीन में नहीं होतीं।*

*वे ऐसे ही पुराने लोहे के संदूकों में छुपी रहती हैं।*

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *