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ओम निश्चल की कविता- प्रभु जी देखो धर्म हुआ व्यापार !

कविता प्रभु जी देखो धर्म हुआ व्यापार ! ओम निश्चल   प्रभु जी देखो धर्म हुआ व्यापार ! लूटो खाओ…