Homeसाहित्य/पुस्तक समीक्षामंजुल भारद्वाज की एक लघु कविता मंजुल भारद्वाज की एक लघु कविता 7 April 2026Pratibimb Media मंजुल भारद्वाज की एक लघु कविता व्यवस्था से हारी भीड़ जब गांव छोड़ शहर की ओर भागती है तब उसका लक्ष्य क्रांति नहीं सिर्फ़ पेट भरना होता है जिस दिन व्यवस्था से पलायन व्यवस्था निर्माण का संकल्प लेगा भारत में सिर्फ़ ग्राम स्वराज होगा! Post Views: 112 Like 0 0 Comments
मंजुल भारद्वाज की कविता- आंसुओं में मुस्कुराते हुए ! कविता आंसुओं में मुस्कुराते हुए ! -मंजुल भारद्वाज एक कला संकल्प एक उन्मुक्त कला विचार एक नाटय दर्शन एक…
विजेता दहिया गुल्फ़ाम की कविता ‘भेड़िया’ भेड़ / Sheep* भेड़ किताबें नहीं पढ़ती वे कविता नहीं लिखती भेड़ भीड़ का हिस्सा है वे एकांत में नहीं…
ठिठुरते लैम्प पोस्ट ठिठुरते लैम्प पोस्ट ~ अदनान कफ़ील दरवेश वे चाहते तो सीधे भी खड़े रह सकते थे लेकिन आदमियों की…