बहुत मेहनती, ईमानदार और समर्पित नेता हैं – राजेन्द्र बाटू

जूझते जुझारू लोग -132

बहुत मेहनती, ईमानदार और समर्पित नेता हैं – राजेन्द्र बाटू

सत्यपाल सिवाच

राजेन्द्र प्रसाद बाटू ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें अपनी पहचान के लिए कभी जरूरत महसूस नहीं हुई। वे शांत रहकर बिना किसी दिखावे के काम करते जाने के कारण एक इंसान, शिक्षक, संगठन के नेता और जिम्मेदार नागरिक के रूप में ख्यातिप्राप्त हैं। उनका रिकॉर्ड स्वतः बोलता है। मैं उन्हें वर्षों से जानता हूँ। ऊपर से साधारण और भीतर से मजबूत, बुद्धिमान और समर्पित – यही पहचान दूसरों को आकर्षित करती है।

राजेन्द्र प्रसाद बाटू का जन्म श्रीमती बालम देवी और श्री हरी राम के घर दिनांक 2 जनवरी 1963 को गांव लाली, तहसील रतिया जिला फतेहाबाद में हुआ। वे छह भाई और दो बहनें हैं। वे आठवीं कक्षा तक अपने गांव लाली में ही पढ़े और दसवीं कक्षा राजकीय उच्च विद्यालय रतिया से उत्तीर्ण की। उन्होंने बी.एससी. (नॉन-मेडिकल) गवर्नमेंट कॉलेज हिसार से 1985 में की और 1986 में जाट कॉलेज ऑफ एजूकेशन हिसार से बी.एड. के उपरांत शिक्षक नियुक्त हो गए। बाद में      इतिहास और लोक प्रशासन में एम.ए. उपाधि प्राप्त की।

23.12.1986 को तदर्थ आधार पर राजकीय उच्च विद्यालय, हमीरगढ़ में गणित अध्यापक नियुक्त हुए। यूनियन के संघर्षों के फलस्वरूप 01.01.1991 से उनकी सेवाएं दो वर्ष के अनुभव के आधार पर नियमित हो गई। दिनांक 31.01.2021 को राजकीय उच्च विद्यालय, हांसपुर से मुख्याध्यापक पद से सेवानिवृत्त हो गए। वे 2020 में उच्च विद्यालय के मुख्याध्यापक बनने से पहले तीन साल राजकीय माध्यमिक विद्यालय जाखनदादी में एलिमेंट्री स्कूल मुख्याध्यापक के रूप में कार्य करते रहे।

राजेन्द्र प्रसाद ने अच्छे शिक्षक और कुशल प्रशासक की भूमिका निभाई तथा जिस भी विद्यालय में रहे वहाँ स्टॉफ, छात्रों और अभिभावकों के साथ बहुत घनिष्ठ संपर्क व संबंध बनाए। सन् 1994 से 2006 तक 12 वर्ष बलियाला लगाने के बाद आपने 2013 तक 7 वर्ष लाली में मेहनत से जहाँ स्कूल के बच्चो को पढा़या, वहीं अपने बच्चों को भी उच्च शिक्षा दिलवाई।

हरियाणा राजकीय/विद्यालय अध्यापक संघ, सर्व कर्मचारी संघ हरियाणा और स्कूल टीचर्ज फैडरेशन ऑफ इंडिया में काम किया। सेवानिवृत्त होने के बाद वे रिटायर्ड कर्मचारी संघ, हरियाणा और अखिल भारतीय किसान सभा में सक्रिय हैं। वे सन् 1994-98 तक खण्ड रतिया में हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ के कोषाध्यक्ष, 1998-2004 तक खण्ड प्रधान, 2006-2008 में जिला सचिव फतेहाबाद, 2008-2011 में राज्य कोषाध्यक्ष तथा 2011-2013 में हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के राज्य कोषाध्यक्ष, 2014-2017 में उप महासचिव और 2018-2021 में फिर राज्य कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुए।सन् 1994-2000 तक वे  सर्वकर्मचारी संघ खण्ड रतिया के कोषाध्यक्ष, 2000-2006 में खण्ड सचिव, 2007-2011 जिला कोषाध्यक्ष और 2016-2021 तक राज्य कोषाध्यक्ष चुने गए।

सेवानिवृति के बाद अखिल भारतीय किसान सभा में 2021-23 जिला कोषाध्यक्ष, 2023-25  जिला सचिव और 2025 से राज्य कोषाध्यक्ष चुने गए हैं। लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारी उन्हें दी जाती रही है जो उनके व्यक्तित्व की खूबियों की ओर इशारा करती है।

वे प्रारंभ से ही शोषण, अन्याय, असमानता खत्म करवाने के लिए व्यापक एकता के पक्ष में रहे हैं। यही बात उन्हें यूनियन में खींच लाई। वे कभी संघर्षों से नहीं झिझके। डी.डी.ओ. रहते हुए 23.11.1993 से 30.11.1993 तक 8 दिन बुडैल जेल चण्डीगढ़ में रहे।सरकार के साथ संगठन का समझौता होने के बाद उत्पीड़न रद्द हुआ।      सेवा में आए तब तक सर्व कर्मचारी संघ बन चुका था। विभागीय यूनियन शुरू से ही सर्व कर्मचारी संघ से संबंध थी।सेवा में आते ही तदर्थ होते हुए भी अध्यापक संघ व सर्व कर्मचारी संघ के सभी आंदोलनों में लगातार भाग लिया।

उन्हें आंदोलनों में परिवार का सहयोग रहा। कभी किसी भी राजनेता से संपर्क नहीं रहे और न ही वरिष्ठ आई.ए.एस. या आई.पी.एस. के साथ नजदीकी रही। इस तरह कभी किसी से निजी काम के लिए सिफारिश करवाने की जरूरत नहीं पड़ी। उनका विवाह 24 मई 1984 को श्रीमती मीरा के साथ हुआ। एक बेटी और एक बेटा – दो बच्चे हैं। लड़की किरण ने एमएससी के बाद 2013 में बैंक में पी.ओ. के पद पर ज्वाईन किया। एक जागरूक संगठन के प्रगतिशील सक्रिय कार्यकर्ता की तरह बेटी के प्रेम विवाह व अंतर्जातीय शादी पर समाज के विरोध के बावजूद बच्चों के सहयोग में अड़े रहे। दामाद जतिन भी सुलझे हुए बैंक ऑफिसर है। पुत्र अंकुर बाटू जम्मू कश्मीर ग्रामीण बैंक में लिपिक से स्टेट बैंक आफ इंडिया रतिया में आ गए हैं। मेधा बी.कॉम. बी.एड. हैं और घर का काम देखती हैं। राजेन्द्र प्रसाद और मीरा दोनों ने मृत्योपरांत  नेत्र दान व देह दान के लिए शपथपत्र दिया हुआ है।

उनका विवाह पढ़ते समय ही  हो गया था, लेकिन उन्होंने अपनी पढ़ाई में कमी नहीं आने दी। पढ़ाई के दौरान ही बेटी किरण का जन्म हुआ और कुछ ही समय बाद राजेन्द्र को राजकीय उच्च विद्यालय हमीरगढ़ जीन्द में गणित अध्यापक की नौकरी मिल गई।   वे गरिमापूर्ण सामाजिक जीवन के लिए संगठन को जरूरी मानते हैं। इस मामले में वे औरों के लिए भी प्रेरणास्रोत हैं। इसी के चलते आपने ज्वाईनिंग के मात्र 13 दिन बाद अध्यापक संघ की सदस्यता मांग कर ले ली थी। कच्ची व प्रोबेशन की नौकरी के पहले महीने ही सर्व कर्मचारी संघ की हिसार जोनल रैली में  भाग लिया। सन् 1987-90 में अध्यापक संघ व सर्व कर्मचारी संघ के नियमितीकरण को लेकर चले आंदोलन की बदौलत ही 1 जनवरी 1991 को हमीरगढ़ में ही रेगुलर हुए। बेटी के जन्म साल में मिली नौकरी, बेटे अंकुर के जन्म साल में पक्की होने की दोहरी खुशी घर में मनाई गई।

रेगुलर होने के 1 साल 8 महीने बाद अगस्त 1992 में इनका तबादला मोहमदपुर रोही फतेहाबाद में हुआ। यहाँ पर एक वर्ष सेवा देने के बाद सितंबर 1993 से अगस्त 1994 तक आप हड़ोली में सेवाएं देते रहे। यही वह दौर था जब इनकी प्रतिभा हर जगह शोर मचाने लगी थी, परन्तु वे हमेशा की तरह शांत ही रहे थे। कक्षा में, स्कूल के दूसरे कामों में, घर में बंटवारे के बाद बड़ी जिम्मेदारियों में, भाईचारे के साथ-साथ आपने संगठन की जिम्मेदारी भी शिद्दत से निभाई।

भीड़ देखकर ऊंची आवाज में भाषण देने वालों व सस्ती लोकप्रियता चाहने वालों के एकदम उल्ट सिर्फ काम से काम रखने के गुण के कारण इन्हें संगठन में बड़े से बड़ी जिम्मेदारी दी गई। वर्षों तक अध्यापक लहर पत्रिका के कामों में सहयोग कर रहे, वहीं सन् 1998 से छप रही अध्यापक संघ की सांगठनिक डायरी में इनका अहम् रोल रहा। उल्लेखनीय है कि वे पदों के पीछे कभी नहीं भागे, बल्कि पद आपकी काबिलियत के पीछे आपके मना करने के बाद भी भागते रहे। पिछले 30 वर्षों से लगभग प्रतिदिन छुट्टी के बाद संगठन के दफ्तर में उपस्थिति ने संगठन के कामों, संगठन के काम, योजनाओं, पत्र व्यवहार, ज्ञापन व मांगपत्र के साथ-साथ पैसे के हिसाब-किताब में जो पारदर्शिता के पैमाने बनाए हैं, वे हमेशा अनुकरणीय बने रहेंगे।

 

लेखक – सत्यपाल सिवाच

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