कल्पना कीजिए, एक ऐसी भारतीय महिला की, जिसने अपनी पूरी जिंदगी पेड़-पौधों, फूलों और प्रकृति के रहस्यों को समझने में लगा दी। जिसने हजारों किलोमीटर की यात्राएं कीं, दुनिया के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों में काम किया और कृषि विज्ञान को नई दिशा देने वाले प्रयोग किए। जिसके नाम पर विदेशों में फूलों की एक प्रजाति का नाम रखा गया, लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि जिस देश में उसने जन्म लिया, उसी देश में लंबे समय तक उसके योगदान को वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थीं। वह केवल फूलों की खूबसूरती देखने वाली महिला नहीं थीं, बल्कि उनके भीतर छिपे विज्ञान को समझने वाली असाधारण वैज्ञानिक थीं। उन्होंने गन्ने की बेहतर किस्मों के विकास में योगदान दिया, पौधों के गुणसूत्रों का अध्ययन किया और जैव विविधता के महत्व को उस समय समझाया, जब दुनिया में इस विषय पर चर्चा भी बहुत सीमित थी। आखिर कौन थीं ई.के. जानकी अम्माल? क्यों उन्हें ‘क्रोमोसोम वुमन’ और ‘नोमैड साइंटिस्ट’ कहा गया? कैसे एक भारतीय महिला ने अमेरिका और ब्रिटेन के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थानों में अपनी जगह बनाई? और आखिर क्यों उनकी प्रतिभा के बावजूद उन्हें अपने ही देश में संघर्ष करना पड़ा? यह कहानी है विज्ञान की दुनिया की उस निडर महिला की, जिसने कहा था कि मेरा काम जीवित रहेगा, और सचमुच उनका काम आज भी जीवित है।
1897: केरल के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्मी वह लड़की, जिसने विज्ञान की दुनिया में बनाई अपनी अलग पहचान
ई.के. जानकी अम्माल का जन्म 1897 में केरल के थालास्सेरी में हुआ था। उनका पूरा नाम एडावलेथ कक्कट जानकी अम्माल था। उनके पिता ई.के. कृष्णन मद्रास प्रेसीडेंसी में हाईकोर्ट के सब-जज के पद पर कार्यरत थे। उनका परिवार शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न था। परिवार का घर ‘एडम’ नाम से जाना जाता था, जहां एक बड़ी लाइब्रेरी, विशाल कमरे, सुंदर बगीचा और यहां तक कि ग्रैंड पियानो भी मौजूद था। किताबों और प्रकृति से घिरे इस वातावरण ने जानकी के भीतर जिज्ञासा और ज्ञान के प्रति प्रेम को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि, उनका सामाजिक जीवन पूरी तरह आसान नहीं था। वे थिया समुदाय से संबंध रखती थीं, जिसे उस समय जातिगत व्यवस्था में सामाजिक रूप से पिछड़ा माना जाता था। इस वजह से उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना भी करना पड़ा। लेकिन जानकी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने कभी सामाजिक सीमाओं को अपनी महत्वाकांक्षाओं के रास्ते में नहीं आने दिया। वे अपनी शर्तों पर जीवन जीना जानती थीं और उनका ध्यान हमेशा अपने काम पर रहता था।
मद्रास से अमेरिका तक का सफर: कैसे एक भारतीय महिला पहुंची दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में?
स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद जानकी उच्च शिक्षा के लिए मद्रास, जिसे आज चेन्नई के नाम से जाना जाता है, चली गईं। यहां उन्होंने वनस्पति विज्ञान यानी बॉटनी के प्रति अपनी रुचि को और गहरा किया। उस समय भारत में महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और शोध के अवसर बेहद सीमित थे। विज्ञान जैसे क्षेत्र में किसी महिला का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ना तो और भी चुनौतीपूर्ण था। लेकिन जानकी ने इन परिस्थितियों को अपनी राह का अवरोध नहीं बनने दिया। वर्ष 1924 में जब वे एक महिला कॉलेज में अध्यापन कर रही थीं, तब उन्हें अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मिशिगन से प्रतिष्ठित छात्रवृत्ति प्राप्त हुई। यह उनके जीवन का बड़ा मोड़ था। वे उच्च शिक्षा और शोध के लिए अमेरिका पहुंचीं, जहां उन्होंने वनस्पति विज्ञान में अपनी विशेषज्ञता विकसित की। वर्ष 1931 में उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की और भारतीय महिलाओं के लिए विज्ञान के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की। उन्हें भारत की पहली महिला वनस्पति वैज्ञानिक डॉक्टरेट धारकों में गिना जाता है। उनकी यह सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उस दौर की उन तमाम महिलाओं के लिए प्रेरणा थी, जो विज्ञान की दुनिया में अपनी जगह बनाना चाहती थीं।
गन्ने पर ऐसा शोध, जिसने भारतीय कृषि के भविष्य को नई दिशा देने में मदद की
अमेरिका से लौटने के बाद जानकी अम्माल ने भारत में वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में काम जारी रखा। उन्होंने कुछ समय अध्यापन किया और बाद में कोयंबटूर स्थित शुगरकेन ब्रीडिंग स्टेशन से जुड़ गईं। यहां उनका प्रमुख कार्य गन्ने की विभिन्न प्रजातियों का अध्ययन और उनके संकरण पर शोध करना था। उस समय भारत में गन्ने की खेती के सामने एक बड़ी चुनौती थी। देश में उगाई जाने वाली गन्ने की कुछ किस्मों में चीनी की मात्रा और उत्पादन क्षमता सीमित थी। ऐसे में बेहतर किस्में विकसित करना कृषि और उद्योग दोनों के लिए महत्वपूर्ण था। जानकी ने पौधों के गुणसूत्रों और आनुवंशिक विशेषताओं का गहन अध्ययन करते हुए गन्ने की प्रजातियों के बीच संकरण के प्रयोग किए। उन्होंने गन्ने और मक्का के बीच सफल संकरण करने वाले शुरुआती वैज्ञानिकों में महत्वपूर्ण स्थान हासिल किया। इस शोध से गन्ने की उत्पत्ति, विकास और आनुवंशिक संरचना को समझने में मदद मिली। उन्होंने ऐसे संकर पौधों पर भी काम किया, जिनके आधार पर आगे व्यावसायिक प्रजनन कार्यक्रम विकसित किए गए। उनके शोध का महत्व केवल बेहतर फसल तैयार करना नहीं था, बल्कि पौधों की आनुवंशिक क्षमता को समझकर कृषि विज्ञान के लिए नए रास्ते खोलना भी था।
1940: जब युद्ध के बीच भारत छोड़कर ब्रिटेन पहुंचीं जानकी अम्माल
साल 1940 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद जानकी अम्माल ब्रिटेन चली गईं। वहां उन्होंने लंदन के जॉन इन्स हॉर्टिकल्चरल इंस्टीट्यूशन में शोध कार्य शुरू किया। यह संस्थान वनस्पति विज्ञान और पौधों के आनुवंशिक अध्ययन के लिए प्रतिष्ठित माना जाता था। जानकी के लिए यह अवसर अपनी वैज्ञानिक क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का था। यहां उन्होंने पौधों की कोशिकाओं, गुणसूत्रों और उनकी आनुवंशिक विशेषताओं पर महत्वपूर्ण अध्ययन किया। ब्रिटेन में उनका जीवन हालांकि आसान नहीं था। युद्ध के कारण खाद्य सामग्री की राशनिंग हो रही थी और लंदन पर बमबारी का खतरा लगातार बना रहता था। उनकी भांजी की बेटी और लेखिका गीता डॉक्टर के अनुसार, जानकी ऐसी परिस्थितियों में भी अपने काम को लेकर विचलित नहीं होती थीं। जब बम गिरते तो वे मेज के नीचे छिप जातीं या बिस्तर के नीचे सो जातीं, लेकिन अगले दिन फिर अपने शोध में जुट जाती थीं। यह उनके साहस और वैज्ञानिक समर्पण का अद्भुत उदाहरण था।
रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी में पहली महिला वैज्ञानिक बनने का गौरव
ब्रिटेन में उनके वैज्ञानिक सफर की एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि वर्ष 1945 में सामने आई। जानकी अम्माल रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी के विस्ली गार्डन में नियुक्त होने वाली पहली महिला वैज्ञानिक बनीं। यह उस समय के वैज्ञानिक संस्थानों में महिलाओं की सीमित भागीदारी को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। विस्ली के बगीचों में उन्होंने विभिन्न पौधों, फूलों और वृक्षों का अध्ययन किया। विशेष रूप से मैग्नोलिया जैसे खूबसूरत फूलों से उनका वैज्ञानिक जुड़ाव उल्लेखनीय रहा। आज भी ब्रिटेन के विस्ली गार्डन में उनके योगदान की याद दिलाने वाले फूल मौजूद हैं। मैग्नोलिया की एक विशेष किस्म को उनके सम्मान में ‘मैग्नोलिया कोबस जानकी अम्माल’ नाम दिया गया। यह केवल किसी वैज्ञानिक को सम्मानित करने का तरीका नहीं था, बल्कि प्रकृति और विज्ञान के क्षेत्र में उनके योगदान को स्थायी पहचान देने का प्रयास भी था। सोचिए, भारत की एक महिला वैज्ञानिक के नाम पर ब्रिटेन में फूलों की एक प्रजाति पहचानी जाए, लेकिन अपने देश में उनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी हो!
केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं थीं जानकी, जंगलों और पहाड़ों में भी खोजती थीं विज्ञान
जानकी अम्माल को केवल प्रयोगशाला में काम करने वाली वैज्ञानिक समझना उनकी प्रतिभा को सीमित करना होगा। वे एक फील्ड बायोलॉजिस्ट, पादप भूगोलवेत्ता, जीवाश्म वनस्पति वैज्ञानिक, प्रयोगात्मक प्रजनक और एथ्नोबॉटनिस्ट भी थीं। यानी वे पौधों को केवल कोशिकाओं और गुणसूत्रों के स्तर पर नहीं देखती थीं, बल्कि उनके भौगोलिक वितरण, विकास, पर्यावरण और मानव जीवन से संबंधों को भी समझती थीं। वर्ष 1948 में वे नेपाल में पौधों की खोज के लिए जाने वाली पहली महिला वैज्ञानिक अभियानकर्ताओं में शामिल हुईं। उन्होंने नेपाल की वनस्पति विविधता का अध्ययन किया और वहां की प्राकृतिक संपदा को समझने का प्रयास किया। उनके लिए हर जंगल, हर पौधा और हर फूल एक नई वैज्ञानिक पहेली था। वे मानती थीं कि प्रकृति की विविधता को समझना मानव सभ्यता के भविष्य के लिए बेहद जरूरी है। खास बात यह है कि उन्होंने 1930 के दशक में ही जैव विविधता के महत्व पर बात की थी, जब यह विषय आज की तरह वैश्विक चिंता का केंद्र नहीं बना था।
1951: प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बुलावे पर भारत लौटीं, लेकिन यहां मिला संघर्ष
वर्ष 1951 में भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जानकी अम्माल को देश लौटने और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण यानी बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पुनर्गठन में सहयोग देने के लिए आमंत्रित किया। जानकी ने इस निमंत्रण को स्वीकार किया और भारत लौट आईं। उन्हें उम्मीद थी कि अब वे अपनी अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक विशेषज्ञता का उपयोग अपने देश के लिए कर सकेंगी। लेकिन यहां उन्हें एक ऐसी चुनौती का सामना करना पड़ा, जिसकी शायद उन्होंने कल्पना नहीं की थी। संस्थान में उनके कुछ पुरुष सहकर्मी एक महिला के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। उनके पुनर्गठन और सुधार के प्रयासों का विरोध हुआ और उन्हें वह सहयोग नहीं मिला जिसकी वे अपेक्षा कर रही थीं। वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में अपनी योग्यता साबित करने वाली वैज्ञानिक को अपने ही देश में लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। इस अनुभव ने उन्हें गहरा दुख पहुंचाया। लेकिन उन्होंने अपनी वैज्ञानिक जिज्ञासा को समाप्त नहीं होने दिया। वे देश के अलग-अलग हिस्सों में पौधों की खोज और अध्ययन के लिए यात्राएं करती रहीं। शायद इसी कारण उन्हें ‘नोमैड साइंटिस्ट’ यानी घूम-घूमकर विज्ञान की खोज करने वाली वैज्ञानिक कहा गया।
80 वर्ष की उम्र में मिला पद्मश्री सम्मान, लेकिन क्या यह पहचान उनके योगदान के लिए पर्याप्त थी?
जानकी अम्माल ने अपना पूरा जीवन विज्ञान और प्रकृति के अध्ययन को समर्पित कर दिया। उनके शोध का महत्व किसी एक बड़ी खोज तक सीमित नहीं था। उन्होंने अनेक छोटे-बड़े वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से पौधों के विकास, आनुवंशिकी और जैव विविधता को समझने में योगदान दिया। वर्ष 1977 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उस समय उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी। यह सम्मान उनके लंबे वैज्ञानिक योगदान की सरकारी मान्यता था, लेकिन उनके जीवनकाल में उन्हें वह व्यापक लोकप्रियता और सार्वजनिक पहचान नहीं मिल सकी जिसकी वे हकदार थीं। 7 फरवरी 1984 को उनका निधन हो गया। वे अपने पीछे शोध, वैज्ञानिक विचारों और प्रकृति को समझने की एक ऐसी विरासत छोड़ गईं, जिसका महत्व समय के साथ और स्पष्ट होता गया।
16 साल की रिसर्च के बाद सामने आई उनकी कहानी: आखिर क्यों दुनिया को फिर याद आईं जानकी अम्माल?
जानकी अम्माल की जिंदगी और उपलब्धियों को व्यापक रूप से सामने लाने में इतिहासकार डॉ. सावित्री प्रीथा नायर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने लगभग 16 वर्षों तक तीन महाद्वीपों में शोध करके जानकी के जीवन से जुड़े दस्तावेजों और ऐतिहासिक तथ्यों को एकत्र किया। इसी शोध के आधार पर उनकी जीवनी ‘Chromosome Woman, Nomad Scientist: E.K. Janaki Ammal, A Life 1897–1984’ प्रकाशित हुई। इस पुस्तक ने विज्ञान के इतिहास में महिलाओं के योगदान को नए सिरे से देखने का अवसर दिया। इसका एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि भारतीय विज्ञान के इतिहास में केवल प्रसिद्ध पुरुष वैज्ञानिकों की कहानियां ही नहीं, बल्कि उन महिलाओं की यात्राएं भी शामिल होनी चाहिए, जिन्होंने सामाजिक बाधाओं और संस्थागत भेदभाव के बावजूद असाधारण उपलब्धियां हासिल कीं। जानकी की कहानी इसी भूले हुए इतिहास को सामने लाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
जानकी अम्माल की सबसे बड़ी विरासत: उनका वह विश्वास, जो आज भी सच साबित हो रहा है
जानकी अम्माल की भांजी की बेटी गीता डॉक्टर ने उनके व्यक्तित्व को याद करते हुए बताया था कि वे बेहद स्वतंत्र विचारों वाली, अनुशासित और अपने काम के प्रति समर्पित महिला थीं। वे बच्चों के साथ समय बितातीं, उन्हें किताबें देतीं और पिकनिक पर ले जाती थीं। उनके व्यक्तित्व में कठोर वैज्ञानिक अनुशासन के साथ जीवन के छोटे-छोटे पलों का आनंद लेने की क्षमता भी थी। उनके पास ‘टिमोथी’ नाम की एक गुड़िया थी और वे एक छोटी गिलहरी ‘कपोक’ को अपनी साड़ी में छिपाकर लंदन तक ले गई थीं, ताकि वहां अकेलेपन में उन्हें साथ मिल सके। उनके जीवन में विज्ञान और संवेदनशीलता दोनों का अद्भुत मेल था। वे अक्सर कहा करती थीं, ‘मेरा काम जीवित रहेगा।’ यह वाक्य उनके आत्मविश्वास और अपने शोध पर विश्वास को दर्शाता है। आज जब दुनिया जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन, कृषि और पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियों से जूझ रही है, तब जानकी अम्माल के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक दिखाई देते हैं।
ई.के. जानकी अम्माल की कहानी हमें याद दिलाती है कि महानता हमेशा शोर नहीं मचाती। कभी-कभी वह प्रयोगशाला में बैठकर किसी छोटे से पौधे के गुणसूत्रों को समझने में लगी होती है। दुनिया ने शायद उन्हें देर से पहचाना, लेकिन प्रकृति के इतिहास में उनका योगदान कभी मिट नहीं सकता।
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