कविता
वे खुश हैं
रत्ना भदौरिया
वे खुश हैं
कि उन्होंने सच की गर्दन पर
जुमलों का पाँव रख दिया है
कि अब हत्या को दुर्घटना
लूट को उपलब्धि
और पराजय को विजय लिखने का
अधिकार उनके पास है
वे खुश हैं
कि उन्होंने झूठ की दीवारें नहीं लाँघीं
बल्कि दीवारों पर ही
सच का नाम लिख दिया है
अब अपराधी इतिहास लिखते हैं
और इतिहास के पन्नों पर
निर्दोषों के बयान काट दिए जाते हैं
उन्होंने शब्दकोश से
असुविधाजनक शब्द निकाल दिए हैं—
भूख, अन्याय, प्रतिरोध, जवाबदेही
उनकी जगह रख दिए हैं
उत्सव, उपलब्धि, संकल्प और विश्वास
भाषा अब भाषा नहीं
सत्ता की रखैल बना दी गई है
यह कैसा समय है
जहाँ झूठ को प्रमाणपत्र मिलते हैं
और सच को चरित्र प्रमाण देना पड़ता है;
जहाँ आईना दिखाने वाले
षड्यंत्रकारी कहलाते हैं
और चेहरे पर कालिख पोतने वाले
राष्ट्र के चित्रकार!
वे खुश हैं
कि भीड़ ने तालियाँ बजाई हैं
उन्हें लगता है तालियों की आवाज़
सच की अंतिम चीख को निगल गई है
वे भूल गए हैं—
भीड़ का शोर इतिहास नहीं होता
और सिंहासन पर बैठा हुआ झूठ
सत्य का उत्तराधिकारी नहीं होता
सच फिलहाल अदालतों
अभिलेखों
चौराहों और अखबारों से बेदखल है
लेकिन वह उन आँखों में बचा है
जिन्होंने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है,
उन हाथों में बचा है
जिन्होंने अपने हिस्से की रोटी खोई है
उन स्मृतियों में बचा है
जिन्हें कोई फरमान मिटा नहीं सकता
