भारतीय राजनीति में माताओं और परिवारों के नाम पर होने वाली राजनीति, दोहरे मानदंडों और मर्यादा की तलाश को बयां करती हुई एक संवेदनशील और गहरी कविता प्रस्तुत है: मयूर
कविता
माँ सिर्फ माँ है
नरसिंह कुमार ‘मयूर’
माँ कोई हथियार नहीं है,
इस सत्ता की पैंतरेबाज़ी में,
माँ को मत घसीटो आकर,
अपनी घटिया सियासत बाज़ी में।
चाहे पक्ष हो या प्रतिपक्ष सभी,
बात यह सबको समझनी होगी,
मर्यादा की इस देहरी पर सबको,
हर नीतिगत रीत निभानी होगी।
जब मंच सजते हैं नफरत के,
और ताली बजती जाती है,
तब विरोधी की माँ या बेटी,
निशाने पर आ जाती है।
सुविधा के ये दोहरे पैमाने,
सच कब तक न्याय करेंगे?
अपने को पूज्य बताकर,
कैसे अपना ये पाप छुपायेंगे?
कभी मंच से फब्तियां कसी गईं, कभी रिश्तों पर गहरे वार हुए,
व्यक्तिगत हमलों के किस्से,
हर चुनाव में क्यों तैयार हुए?
जर्सी गाय और पचास,
करोड़ के ताने गूंज उठे,
राजनीतिक मर्यादा के,
अब तो सारे धागे टूट चुके।
पर सच तो यह है यारो,
माँ दल में नहीं बंटी होती,
हर आँचल की छांव एक सी,
हर ममता ठंडी होती।
न वह भाजपा की होती है,
न वह कांग्रेस की होती है,
हर बेटे की पीड़ा पर,
हर माँ की आँखें रोती हैं।
चलो आज यह संकल्प करें,
इस राजनीति के बाजार में,
परिवारों को छोड़ के लड़ लें,
हम अपने इस अधिकार में।
नीतियों पर प्रहार करो तुम,
फैसलों पर सवाल उठाओ,
पर माँ के पवित्र आंचल को,
इस कीचड़ से दूर भगाओ!
