जयपाल की कविता–भूख 

जयपाल की कविता–भूख

 

वह भूखा था

पेट में समाई थी शताब्दियों की भूख

आँखों में एक सूखी हुई झील की दास्तान

चेहरे पर अकाल की दहशत

सिर, मानों उस पर लदा हो सारी दुनिया का बोझ

कमर जैसे घुन खाई लकड़ी

घिस-घिस कर मुड़ चुके कंधे

नहीं बचा था शरीर में कुछ भी सिवाय पेट के

पेट जो सदियों से खाली था

और जिसे अभी भी लड़ना था भूख से

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