डॉ रीटा अरोड़ा की लघुकथा – जीत की असली कीमत

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघुकथा

जीत की असली कीमत

डॉ रीटा अरोड़ा

 

आश्रम में एक दिन गुरुजी ने देखा, उनका प्रिय शिष्य नीरज उदास बैठा था।

“क्या बात है बेटा, आज इतने चुप क्यों हो?”

“गुरुजी, बहुत मेहनत करता हूँ, फिर भी संतुष्ट नहीं हूँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझसे आगे निकलने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।”

गुरुजी उसे बगीचे में ले गए।

“देखो बेटा, यह आम का पेड़ कितनी धीरे बढ़ता है, फिर भी मीठे फल देता है।”

“लेकिन गुरुजी, दुनिया तो तेज़ चलने वालों की है!”

“अच्छा, बताओ… आख़िरी बार माँ के साथ बैठकर कब खाना खाया था?”

“याद नहीं।”

“दोस्तों से कब मिले?”

“समय ही नहीं मिला।”

“और खुलकर हँसे कब थे?”

नीरज निरुत्तर था।

गुरुजी ने पूछा, “जिस सफलता के लिए जी रहे हो, उसी के कारण जीना भूल रहे हो?”

“तो क्या मेहनत करना छोड़ दूँ?”

“नहीं बेटा, मेहनत ज़रूर करो, लेकिन अपनी सेहत और सुकून को उसकी कीमत मत बनाओ।”

“लेकिन पीछे रह गया तो?”

गुरुजी मुस्कुराए।

“बेटा, जीवन की दौड़ में सबसे आगे निकलकर भी क्या पाओगे, अगर अंत में तुम्हारे साथ चलने वाला कोई न हो?”

नीरज की आँखें नम हो गईं।

“गुरुजी, अब समझ आया… मैं सफलता कमाने निकला था, मगर ज़िंदगी ही खर्च करता जा रहा था।”

गुरुजी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“बेटा, कमाई दोबारा हो सकती है, लेकिन बीता समय, खोई सेहत और छूटे रिश्ते हमेशा वापस नहीं आते।”

नीरज ने जेब से फ़ोन निकाला।

स्क्रीन पर माँ की पाँच मिस्ड कॉल थीं।

उसने काँपती उँगलियों से नंबर मिलाया-

“माँ… आज खाना आपके साथ खाऊँगा।”

उधर कुछ पल ख़ामोशी रही।

फिर माँ की आवाज़ आई-

“बेटा, आज अचानक छुट्टी मिल गई क्या?”
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