वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026
आईना बोलता है
मनोज कुमार झा
राजनीतिक दार्शनिक जी.ए. कोहेन ने एक तीखा सवाल पूछा था— “अगर आप समानता के समर्थक हैं, तो इतने अमीर कैसे हैं?” आर्थिक समानता में विश्वास रखने और एक अमीर जीवनशैली जीने के बीच के इस अंतर पर जवाब देना न तो आसान है और न ही आरामदायक। आंकड़े बताते हैं कि इस असहजता से बचना नामुमकिन है।
‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट 2026’ के अनुमान के अनुसार, भारत के सबसे अमीर 10% लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 57.7% हिस्सा आता है और देश की 65% संपत्ति इन्हीं के पास है। अकेले शीर्ष 1% लोगों के पास कुल आय का 22.6% और कुल संपत्ति का 40.1% हिस्सा है, जबकि आबादी के निचले आधे हिस्से को कुल आय का केवल 15% मिलता है और उनके पास कुल संपत्ति का महज 6.4% हिस्सा है। ये आंकड़े केवल अर्थशास्त्रियों के लिए नहीं हैं; ये हमें उस भारत के बारे में बहुत कुछ बताते हैं, जहाँ ‘योग्यता’ (मेरिट) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। हमारे पास एक ऐसा संविधान है जो समानता का वादा करता है, लेकिन असल में हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ जन्म आज भी शिक्षा, पेशे, आय, सामाजिक नेटवर्क और सम्मान को प्रभावित करता है। हम ‘योग्यता’ के बारे में तो बहुत बात करते हैं, लेकिन उन परिस्थितियों के बारे में शायद ही कभी बात करते हैं जो इस योग्यता को जन्म देती हैं।
अक्सर यह तर्क दिया जाता है: मैंने कड़ी मेहनत की, मैं सफल हुआ, इसलिए जो मेरे पास है, वह मेरा हक है। लेकिन अपनी व्यक्तिगत मेहनत की शुद्धता पर खुद को बधाई देने से पहले, हमें कुछ ऐसे सवाल भी पूछने चाहिए जो शायद हमें असहज कर दें। हममें से किसे बेहतर स्कूलों में पढ़ने का मौका मिला? कौन ऐसे घर में पला-बढ़ा जहाँ किताबें मौजूद थीं? कौन प्राइवेट ट्यूशन का खर्च उठा सकता था? कौन पूरे आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजी बोल सकता था, क्योंकि उसके घर में भी अंग्रेजी बोली जाती थी? किसे यह छूट थी कि वह एक-दो बार परीक्षा में फेल भी हो जाए? किसे विरासत में घर, ज़मीन, कारोबार, पेशेवर संपर्क या सामाजिक आत्मविश्वास मिला? किसे यह पता था कि किसी बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान में कैसे आगे बढ़ना है, क्योंकि परिवार में कोई और पहले ही ऐसा कर चुका था? इन सवालों का मतलब यह नहीं है कि कड़ी मेहनत का कोई महत्व नहीं है, लेकिन इनसे ‘पूरी तरह से खुद के दम पर सफल होने वाले व्यक्ति’ वाली धारणा पर सवाल ज़रूर खड़े होते हैं। यहीं पर भारत में ‘जाति’ का मुद्दा सामने आ जाता है। ऐतिहासिक रूप से, जाति ने ही यह तय किया है कि किसे ज़मीन, शिक्षा, काम-धंधे, नेटवर्क, रुतबे और सत्ता तक पहुँच मिलेगी। भले ही भेदभाव पर रोक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सदियों से चले आ रहे भेदभाव के नतीजे रातों-रात खत्म हो जाएंगे।
यही वजह है कि जाति जनगणना मायने रखती है। यह हमें कुछ ऐसी बातें बता सकती है, जिन्हें जानने से हम अक्सर कतराते रहे हैं—जैसे कि अवसरों और संसाधनों तक पहुँच में किस तरह का पदानुक्रम (श्रेणीबद्ध अंतर) मौजूद है। बेशक, कार्यप्रणाली, श्रेणियों और डेटा के इस्तेमाल को लेकर बहसें होंगी। ऐसी बहसें ज़रूरी भी हैं। लेकिन असमानता की ओर न देखने से असमानता खत्म नहीं हो जाती। कोई लोकतंत्र सामाजिक न्याय पर तब तक गंभीरता से बहस नहीं कर सकता, जब तक वह उस समाज के बारे में पर्याप्त जानकारी के बिना ही उस पर चर्चा करने की ज़िद करता रहे, जिसे वह बदलना चाहता है।
सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) के खिलाफ तर्क अक्सर ‘योग्यता’ (merit) का हवाला देते हैं: किसी व्यक्ति को केवल इसलिए अवसर क्यों मिलना चाहिए कि वह किस समूह में पैदा हुआ है, न कि इसलिए कि उसने अपने जीवन में क्या हासिल किया है? यह सवाल सुनने में काफी दमदार लगता है, लेकिन तब तक, जब तक कि कोई यह न पूछे कि क्या अवसर खुद सभी को समान रूप से मिलते हैं। अगर विरासत में मिली संपत्ति, शिक्षा और नेटवर्क का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाना ‘योग्यता’ पर हमला नहीं माना जाता, तो फिर विरासत में मिली कमियों को दूर करने के उपायों को ‘योग्यता’ का उल्लंघन क्यों माना जाना चाहिए?
इसका मतलब यह नहीं है कि विशेषाधिकार प्राप्त प्रत्येक व्यक्ति ऐतिहासिक अन्याय के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार है। इसका मतलब है कि विशेषाधिकार एक सामाजिक तथ्य है और अन्यथा दिखावा करने से सामाजिक व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण नहीं हो जाती। यह शायद सबसे उपयोगी सबक है जो कोई कोहेन से सीख सकता है। न्याय को पूरी तरह संसद, अदालतों और सरकारी योजनाओं पर नहीं छोड़ा जा सकता। संस्थाएँ बहुत मायने रखती हैं, खासकर भारत के बहिष्कार के इतिहास वाले देश में। लेकिन संस्थाएँ लोगों के माध्यम से संचालित होती हैं, और सामाजिक असमानता न केवल कानूनों द्वारा बल्कि रोजमर्रा की पसंदों द्वारा भी पुनरुत्पादित होती है।
आइए, विशेषाधिकारों से भरे उस जीवन पर विचार करें जो पूरी तरह से कानूनी है। एक अमीर परिवार अपनी सामर्थ्य के अनुसार सबसे अच्छी शिक्षा खरीदता है, सुरक्षित इलाकों में रहता है, निजी स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करता है और अपने बच्चों को हर संभव सुविधा देता है। वे घर के कामों के लिए लोगों को काम पर रखते हैं और उन्हें उतना ही भुगतान करते हैं जितना बाजार में तय है। इनमें से कुछ भी गैर-कानूनी नहीं है। फिर भी, जब ऐसे लाखों फैसले एक साथ जुड़ते हैं, तो वे एक ऐसे समाज को जन्म देते हैं जहाँ कुछ बच्चों की जिंदगी दूसरों के मुकाबले कई कदम आगे से शुरू होती है।
यही कारण है कि समानता को केवल ‘दान’ तक सीमित नहीं किया जा सकता। एक अमीर व्यक्ति दिल खोलकर दान दे सकता है, और साथ ही उन व्यवस्थाओं के साथ पूरी तरह सहज रह सकता है जो असमानता को पैदा करती हैं। दान से गरीबों की मदद तो हो सकती है, लेकिन यह सवाल शायद ही पूछा जाता है कि आखिर इतने सारे गरीब लोग हैं ही क्यों? इसलिए, ‘एकजुटता’ (solidarity) कहीं अधिक बड़ी मांग करती है। यह केवल यह नहीं पूछती कि हम क्या देने को तैयार हैं, बल्कि यह पूछती है कि हम किन बातों पर सवाल उठाने को तैयार हैं। हम अपने घर में काम करने वाले व्यक्ति को क्या भुगतान करते हैं? सफाई कर्मचारी के लिए हम किस वेतन को उचित मानते हैं? जो व्यक्ति हमारा खाना पहुँचाता है, उससे बिना किसी सुरक्षा के काम करने की उम्मीद क्यों की जाती है, जबकि हम कम कीमत पर ज्यादा सुविधाएँ चाहते हैं? और एक खेतिहर मजदूर से ऐसी आय पर गुजारा करने की उम्मीद क्यों की जाती है, जिस पर शहरी मध्यम वर्ग के लिए जीवन जीना असंभव होगा?
भारत की आर्थिक वृद्धि ने इतनी संपत्ति और अवसर पैदा किए हैं, जिनकी कल्पना पिछली पीढ़ियाँ शायद ही कर पातीं। लेकिन सिर्फ आर्थिक वृद्धि से न्याय का सवाल हल नहीं हो जाता। अगर आर्थिक तरक्की के साथ-साथ सामाजिक ऊंच-नीच और कठोर होती जाए, तो हमें यह पूछना होगा कि असल में आगे कौन बढ़ रहा है, और किसे बस और तेज़ दौड़ने के लिए कहा जा रहा है।
इस बहस का एक और असहज पहलू भी है। समानता चाहने वाले अक्सर सरकार से और ज़्यादा कदम उठाने की मांग करते हैं — जैसे संपत्ति पर टैक्स लगाना, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, सार्वजनिक शिक्षा का विस्तार, आरक्षण देना, नौकरियां पैदा करना, कल्याणकारी योजनाओं को मजबूत करना और कामगारों की सुरक्षा करना। ये जायज़ मांगें हैं। लेकिन हम खुद से क्या मांग करते हैं? क्या हम सामाजिक न्याय की बात तब कर सकते हैं, जब हम यह भी मानते हों कि हर निजी फायदे का हकदार सिर्फ वह व्यक्ति खुद है? क्या हम भाईचारे की बात तब कर सकते हैं, जब हम सेवा करने वालों और सेवा पाने वालों के बीच सम्मान और गरिमा के गहरे अंतर को भी स्वीकार कर लेते हैं?
भारतीय संविधान में समानता की परिकल्पना केवल ‘कानून के समक्ष समानता’ तक सीमित नहीं थी। इसका नैतिक ढांचा स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर टिका है। इन शब्दों का उद्देश्य केवल सरकारों के कामकाज को परिभाषित करना नहीं था, बल्कि इनका मकसद एक ऐसे गणतंत्र का निर्माण करना था, जिसके लिए ‘विशेषाधिकार’ (privilege) को समझने के हमारे नजरिए में बदलाव की जरूरत है। विशेषाधिकार होने पर अपराधबोध महसूस करने की जरूरत नहीं है; और न ही सफलता के लिए माफी मांगने की आवश्यकता है। लेकिन, इनसे सहानुभूति और जिम्मेदारी का भाव पैदा होना चाहिए—या कम से कम, इन्हें ‘दूसरों से श्रेष्ठ होने’ के सिद्धांत में नहीं बदला जाना चाहिए।
शायद इसीलिए कोहेन की बात इतनी असहज लगती है। यह तर्क देने वाले व्यक्ति की ओर ही आईना घुमा देती है। अगर मेरा मानना है कि असमानता अन्यायपूर्ण है, तो इस सोच के नाते मुझसे क्या अपेक्षा की जाती है? एक समतामूलक समाज की असली कसौटी यह है कि क्या समानता हमारे घरों, कार्यस्थलों, संस्थानों और एक-दूसरे को समझने के हमारे नजरिए में एक आदत बन पाती है या नहीं। भारत को एक ऐसे सामाजिक परिवेश की जरूरत है, जहां विशेषाधिकार मिलने पर व्यक्ति खुद को हकदार (entitled) मानने के बजाय, जिम्मेदारी का अनुभव करे। सफलता का इस्तेमाल कभी भी उन लोगों को भुलाने के बहाने के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, जिन्होंने इस दौड़ की शुरुआत बहुत पीछे से की थी।
