जलेस की राष्ट्रीय कार्यशाला में लेखकों ने साझा किए अनुभव
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कहानी लेखन समाज की दरारें पाट सकता है, झूठ के खिलाफ रचनात्मक लेखन हो- चंचल चौहान
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लेखक जन सरोकारों से जुड़ेगा तभी वह समाज को मानवीय गुणों से जोड़ने वाला साहित्य लिख पायेगा- नलिन रंजन सिंह
लेखक को कहानी का अंत समझ नहीं आए तो उसे खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना चाहिए- प्रो. सगीर अफ़राहिम
ऐसे समय में जब देश की राजनीतिक सत्ता लेखक- बुद्धिजीवियों को दिमागी नक्सल कहकर तथा अभिव्यक्ति की आजादी, समाज की बहु सांस्कृतिक विरासत और जनतांत्रिक मानवीय मूल्यों को कुचलकर सांप्रदायिक फांसीवादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद स्थापित करने की कुचेष्ठा कर रही है तब जनवादी लेखक संघ (जलेस) द्वारा अलवर में कहानी लेखन पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित कर देश के सात प्रांतो- बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली के अनेक लेखक- चिन्तकों को एकजुट करके रचनात्मक लेखन के जरिये सामाजिक भेदभाव रोकने, समाज में पैदा हुई दरारों को पाटने, सामाजिक चेतना और इंसानियत को मजबूत करने पर जोर दिया गया. कार्यशाला इस मायने में महत्वपूर्ण कही जा सकती है कि इसमें वरिष्ठ लेखक ही शामिल नहीं हुए वरन देश की नई पीढ़ी (जेन जी और जेन अल्फा/ छात्र) के तीस से ज्यादा छात्र प्रतिभागियों ने भी सक्रिय सहभागिता की है. इस राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्घाटन जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंचल चौहान एवं राष्ट्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह के उद्बोधन से हुआ.
अपने वक्तव्य में चंचल चौहान ने कहा कि कहानी लेखन में कल्पना की भूमिका महत्वपूर्ण है लेकिन राजनीति से प्रेरित कल्पना कई बार झूठ का रूप ले लेती है. लेखकों को ऐसे झूठ का रचनात्मक तरीके से मुकाबला करना होगा. आज राजनीति के समाज पर हावी होने से साहित्य पीछे छूटा है और सामाजिक मूल्यों में गिरवाट आई है. इसलिए कहानी लेखन के माध्यम से सही- गलत की पहचान मजबूत करके और सामाजिक एकता एवं इंसानियत की भावना को जागृत करने का प्रयास होना चाहिए.
जनवादी लेखक संघ के केंद्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह ने कहा कि आधुनिक हिंदी कहानी के 125 साल पूरे होने पर यह कार्यशाला आयोजित की गई है। हिंदी कहानी के समूचे इतिहास पर एक विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दी कहानी ने यादगार चरित्र दिए हैं. “दोपहर का भोजन” कहानी की सिद्धेश्वरी जैसा किरदार इसका उदाहरण है. आज हिंदी कहानी कई विमर्शों के जरिए समृद्ध हो रही है. उन्होंने कहा कि जलेस की यह कार्यशाला कहानी लेखन से अधिक लेखकों को जन सरोकारों से जोड़ने का सेतु है. लेखक स्वयं जन सरोकारों से जुड़ेगा तभी वह समाज को मानवीय गुणों से जोड़ने वाला साहित्य लिख पायेगा.
स्वागत वक्तव्य देते हुए कवि- आलोचक- कथाकार जीवन सिंह मानवी ने अलवर की भाषिक विविधता, सांस्कृतिक साझेपन और साहित्यिक अतीत को सोदाहरण प्रस्तुत किया. उन्होंने बताया कि अलवर रियासत के राजा ने यहाँ हिंदी पढ़ाने के लिए प्रेमचंद और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को आमंत्रित किया था. प्रेमचंद ने अपनी अस्वीकृति दे दी थी, लेकिन आचार्य शुक्ल अलवर आए और कुछ समय के लिए यहाँ ठहरे.
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता करते हुए जलेस राजस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रोफेसर सूरज पालीवाल ने अपने उद्बोधन में लेखन का वैचारिक परिप्रेक्ष्य स्पष्ट किया.
धन्यवाद भाषण जलेस अलवर के अध्यक्ष नीलाभ पंडित ने दिया. संचालन जलेस अलवर के सचिव डाॅ. भरत मीना ने किया.
कार्यशाला के उद्घाटन के बाद दो दिनों में चार सत्रों का आयोजन किया गया. पहला सत्र- “मेरी रचना प्रक्रिया” में कथाकार हरियश राय, सूर्यनाथ सिंह, टेकचंद, ज्योति कुमारी और गंगाधर चाटे ने अपनी रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डाला. इस सत्र का मंच संचालन राघवेन्द्र रावत ने किया.
पहले सत्र में उद्बोधन देते हुए गंगाधर चाटे ने कहा कि कहानी में संवेदना और कहानीपन होना जरूरी है. कहानी में अनुभव की परिपक्वता और अनुभूति की ईमानदारी कहानी को सार्थक बनाते हैं. कहानीकार की निरीक्षण की क्षमता और अध्ययन एक कहानी लेखन के लिए बेहद जरूरी हैं.
कहानीकार एवं सामजिक कार्यकर्त्ता ज्योति कुमारी ने कहा कि लड़कियां बुनियादी तौर पर कहानीकार होती हैं और उनकी कहने की सदियों पुरानी भूख है. कहानीकार की बेचैनियों को कहानी में पनाह मिलती है. उन्होंने लिंग भेद की चर्चा करते हुए कहा कि एक ही घर में रहते हुए लडके और लड़की की परवरिश अलग अलग ढंग से होती है. लड़कियों के लिए पहचान का सवाल प्रमुख है. उन्होंने कहा कि मेरी माँ कहती हैं लड़की पैदा होने पर स्त्री एक मुठ्ठी ज़मीं में दब जाती है. इससे समाज में लड़की के प्रति सोच का पता चलता है.
कथाकार सूर्यनाथ सिंह ने रचना प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए कहा कि मेरी आधिकांश कहानियों का रंग राजनीति का है लेकिन राजनीती पर आधारित कहानियां लिखने में जोखिम बहुत है. उन्होंने कहानी में यथार्थ और कल्पना के उचित मिश्रण की बात पर जोर दिया. उन्होंने अपने निजी अनुभव साझा करते हुए 1991 में एक सॉफ्टवेर कंपनी में दो हज़ार इंजीनियर की छटनी की चर्चा की तथा अपनी ‘मशीन’ कहानी की चर्चा करते हुए युक्तियों के प्रयोग, परिवेश की समझ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता को महत्वपूर्ण बताया.
कहानीकार टेकचंद ने मुख्यधारा और फ़िल्म की कहानी के लेखन का अंतर बताते हुए कहानी लेखन के लिए जरूरी बुनियादी बातों को बताया. उन्होंने कहा कि अनुभव, शिक्षा और पढ़ना कहानीकार के लिए जरूरी हैं. कहानीकार की नज़र अपने आसपास पर होनी चाहिए और समय की समझ भी होनी चाहिए. कहानी में रोचकता हो तथा कहने का अंदाज़ ऐसा हो कि पाठक को आप बीती जग बीती लगे. उन्होंने कहानियों के उदाहरण के साथ साथ अपने निजी अनुभव भी साझा किये.
उपन्यासकार हरियश राय ने कहानी लेखन के कई महत्वपूर्ण सूत्र दिते हुए अपने समय को देखने और समझने पर जोर दिया. उन्होंने विभिन्न कहानियों की चर्चा करते हुए संवाद के महत्त्व को समझाया और कहा कि कहानी लिखते हुए कहानीकार की मनस्थिति कैसी है यह बहुत महत्वपूर्ण है. बहुत सी कहानी एक आवेग के साथ पूर्ण हो जाती हैं. उन्होंने कबीर का मोहल्ला कहानी का ज़िक्र भी किया.
दूसरा सत्र- “संरचना के सवाल” में जवरीमल्ल पारख, संजीव कुमार और मनोज कुलकर्णी ने अपनी बात रखी. इस सत्र के दूसरे हिस्से में छात्र प्रतिभागियों ने कहानी लेखन पर अभ्यास कार्य करते हुए रेखा अवस्थी, हीरा लाल नागर, प्रेम तिवारी, मज़कूर आलम, ज्योति नंदा, राजीव प्रकाश गर्ग “साहिर”, अलखदेव प्रसाद “अचल” के साथ समूह चर्चा में भाग लिया. इसके उपरांत विषय विशेषज्ञों द्वारा छात्र प्रतिभागियों से प्राप्त फीडबैक तथा उनकी साहित्यिक समझ और जिज्ञासा के अनुरूप समीक्षा प्रस्तुत की गई.
कार्यशाला के दूसरे दिन अन्तर्वस्तु के सवाल” विषय पर दो सत्र आयोजित किये गए, जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर सगीर अफ़राहिम, दिल्ली के देशबंधु कॉलेज के प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी, आकाशवाणी लखनऊ की संवाददाता समीना खान, कथा आलोचक राजाराम भादू, शंभूशरण सत्यार्थी, गजेंद्र रावत ने कहानी की अंतर्वस्तु के विभिन्न पक्षों पर विचार व्यक्त किये.
इस अवसर पर प्रोफेसर सगीर अफ़राहिम ने उर्दू साहित्य के हवाले से हिंदी कहानी को जीवन संदर्भों का दस्तावेज बताते हुए कहा कि कहानी लेखन में सबसे ज्यादा जरूरी मनुष्य और उसके मुद्धे होने चाहिए. लेखक को कहानी रचते समय कभी भी अंत को लेकर लेकर परेशान नहीं होना चाहिए. अगर कहानी का अंत समझ नहीं आता है तो उसे खूबसूरत मोड देकर छोड़ देना चाहिए. उन्होंने हिंदी उर्दू रचनाकारों से जुड़े अपने अनुभव भी साझा किये.
समीना खान ने भौतिक सत्ता द्वारा किसी मुद्धे को भटकाने के लिए घटना की अंतर्वस्तु को कैसे बदला जाता है? इस बात को लखनऊ के उदाहरण से समझाते हुए कहा कि आज भौतिकतावाद से प्रभावित होकर साहित्यकारों द्वारा लखनऊ की समृद्ध संस्कृति और साहित्य की चर्चा करने के बजाय सिर्फ वहाँ के खानपान की चर्चा की जा रही है. काली मिर्च से लेकर कोहीनूर तक अंग्रेज ले गए, लेकिन कोसा जा रहा है- मुगलों को. राजनीति द्वारा अन्तर्वस्तु के सवालों को ऐसे ही भटकाया जाता है. उन्होंने हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में कहानी विधा पर हुए एक शोध का हवाला देते हुए बताया कि कहानी मनुष्य में दया और प्रेम का हार्मोन सृजित करती है, किंतु आज साहित्य से यह हार्मोन गायब किया जा रहा है.
राजाराम भादू ने कथ्य के विस्तार की बात करते हुए सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा जन आंदोलनों को कुचल ने की बात को कहानी से जोड़ते हुए लेखकों से जन सरोकारों के साथ निडरता से जुड़े रहने का आह्वान किया.
बजरंग बिहारी तिवारी ने जीवन के विभिन्न संदर्भों से विमर्श मूलक साहित्य रचने की बात कही. उन्होंने दलित साहित्य में हिंसा के विभिन्न रूपों से अवगत कराया.
गजेंद्र रावत ने वर्ग विभाजित समाज में अंतर्वस्तु के सवाल को जंतर मंतर के जेन जी के आंदोलन और नोएडा के मजदूर आंदोलन के जरिये समझाते हुए बताया कि मीडिया मजदूर- किसानों के मुद्धों पर ध्यान नहीं दे रहा है. दूसरे दिन के सत्रों का संचालन योगमाया सैनी एवं पीसी रथ द्वारा किया गया, जबकि धन्यवाद उद्बोधन देशराज वर्मा द्वारा दिया गया.
समापन सत्र में जलेस के राष्ट्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह, कुमार विनीताभ, जलेस राजस्थान के सचिव एवं कार्यशाला के संयोजक संदीप मील और जलेस अलवर इकाई के सचिव एवं कार्यशाला के स्थानीय संयोजक भरत मीना ने कार्यशाला का समीक्षात्मक लेखा जोखा एवं.प्रतिवेदन प्रस्तुत किया. इस अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया.
