कविता
जनता का जनतंत्र हमारा है
मुनेश त्यागी
हर जोर जुल्म की टक्कर में
जिंदा संघर्ष हमारा नारा है,
शिक्षा रोजगार लेकर रहेंगे
यह सारा ही देश हमारा है।
जनता इस देश की मालिक है
यहां कुछ भी नहीं तुम्हारा है,
तुम ठहरे शासकों के चाकर
यह सारा ही देश हमारा है।
देर लगी पर जीते हमीं हैं
कहता इतिहास हमारा है,
लड़कर ही तो हम जिंदा हैं
यही जन-जन का नारा है।
जंतर मंतर को तुम कब्जाओ
लड़ता जन कभी ना हारा है,
संविधान को रौंद रहे तुम
यह रास्ता नहीं हमारा है।
सच में तुम ही हारोगे
यही नसीब तुम्हारा है,
यह दुनिया हम ने संवारी है
कहता इतिहास हमारा है।
अमीर तुम्हारे मालिक हैं
कहां संविधान तुम्हारा है?
तुम तो धनतंत्र के हो गए
जनता का जनतंत्र हमारा है।
