लेखिकाओं दो दिवसीय कार्यशाला में स्त्री लेखन पर चर्चा की

लेखिकाओं दो दिवसीय कार्यशाला में स्त्री लेखन पर चर्चा की

  • जनवादी लेखक संघ ने लखनऊ में आयोजित की ‘स्त्री लेखन : इतिहास, रचना प्रक्रिया और आलोचना पर कार्यशाला

  • 8 राज्यों से 51 लेखिकाएं कार्यक्रम में हुईं शामिल, शुभा ने बांटे स्मृति चिह्न और प्रमाणपत्र

 

जनवादी लेखक संघ द्वारा लखनऊ के एक स्थानीय होटल में 3 और 4 अक्टूबर 2026 को ‘स्त्री लेखन : इतिहास, रचना प्रक्रिया और आलोचना’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र में ‘स्त्री लेखन : परंपरा और इतिहास’ विषय पर उद्घाटन वक्तव्य रोहतक से आईं प्रसिद्ध कवयित्री शुभा ने दिया। बीज वक्तव्य दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस में प्रोफेसर और “आलोचना” पत्रिका की संपादक बलवंत कौर ने दिया।

कार्यशाला में भाग ले रही प्रतिभागियों का स्वागत समीना खान ने किया और उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता महिलाओं के मुद्दों को लेकर लगातार संघर्षरत रहने वाली जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता मधु गर्ग ने की। संचालन जनवादी लेखक संघ लखनऊ की सचिव शालिनी सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन आभा खरे द्वारा किया गया।

पहले सत्र में ‘जीवन स्मृति और साहित्य : मैं क्यों लिखती हूँ’ विषय पर रोहतक से आई दीपा और हिसार से आई प्रसिद्ध कवयित्री विपिन चौधरी ने अपने विचार रखे। इस सत्र का संचालन सीमा सिंह ने किया। दूसरा सत्र ‘स्त्री दृष्टि : कौन बोल रहा?’ को केंद्र में रखकर आयोजित हुआ। इसमें गोरखपुर की लेखिका रंजना जायसवाल और दिल्ली से आई युवा लेखिका दिव्या तिवारी ने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन ज्योति नंदा ने किया। तृतीय सत्र में शीला पांडे ने ‘गीतों में स्त्री’ और आगरा से आई साहित्यकार अनामिका सिंह ने ‘ग़ज़ल में स्त्री’ विषय पर अपनी बात रखी। संचालन आभा खरे ने किया। पहले दिन के अंतिम सत्र में शालू शुक्ला के संचालन में 22 कवयित्रियों का कविता पाठ हुआ। धन्यवाद ज्ञापन आजमगढ़ से पधारी जनवादी लेखक संघ की संयुक्त सचिव कंचन मौर्य ने किया।

4 अक्टूबर को पहले सत्र में ‘स्त्री होकर पढ़ना : पाठ, पाठक और पुनर्पाठ’ विषय पर अलवर की योगमाया सैनी, भोजपुर की लक्ष्मी कुमारी और लखनऊ की अनुजा शुक्ला ने विचार व्यक्त किया। इस सत्र में त्रिशंकु, हरी बिंदी, बोलने वाली औरत, सिक्का बदल गया और मिशन जंगल और गिनीपिग कहानियों को केंद्र में रखकर विमर्श किया गया। इन कहानियों को स्त्री विमर्श के आईने में देखते हुए फर्रुखाबाद की गीता भारद्वाज, आगरा की यशोधरा यादव, फर्रुखाबाद की प्रियल मिश्रा, लखनऊ की सोनी दयाल और शुभम यादव ने विचार व्यक्त किया। संचालन माया मिश्रा ने किया।

‘भाषा, शिल्प और लेखिकीय पहचान’ विषय पर हुए सत्र में महाराष्ट्र से आई लेखिका कल्पना उबाले ने निर्मला पुतुल की कविताओं पर और कल्पना दिलीप महापुस्कर ने सुशीला टाकभौरे की कविताओं को केंद्र में रखकर बात की। बिहार से आई रूपम कुमारी ने ‘लोक भाषा में स्त्री’ विषय पर बात रखी और बाराबंकी की अलका तिवारी ने ‘स्त्री भाषा की निर्मिति’ पर व्याख्यान दिया। इस सत्र में हुए संवाद में रायपुर की लेखिका श्रीदेवी, आगरा से आई रमा वर्मा और लखनऊ से अर्चना यादव, अंशिका सिंह भदौरिया एवं राधिका रावत ने प्रतिभाग किया। इस सत्र का संचालन जलेस कानपुर की सचिव भावना मिश्रा ने किया।

तीसरे सत्र में आत्मकथा एवं रचना को केंद्र में रखकर बात की गई। रांची से आई कहानीकार किरण की कहानी वंश वृक्ष, लखनऊ की कहानीकार समीना खान की कहानी राकिया की अम्मा, बीकानेर की कहानीकार सरिता भारत की कहानी तमाशेवाली, लखनऊ की कहानीकार कुसुम लता पांडेय की कहानी तुमने कहा था और कानपुर की कहानीकार अनीता मिश्रा की कहानी ड्रामा क्वीन को केंद्र में रखकर कहानीकारों ने अपनी बात कही। इस सत्र में दिल्ली से आई अर्पिता यादव सहित भाग्यवती पाल, श्रद्धा यादव, प्रिया सिंह एवं गोरखपुर से आई श्रुति मिश्रा ने संवाद किया। इस सत्र का संचालन शालू शुक्ला ने किया।

समापन सत्र में दिल्ली से आई काव्या तिवारी ने लेखा-जोखा प्रस्तुत किया और समापन वक्तव्य जनवादी लेखक संघ उत्तर प्रदेश की उपाध्यक्ष अनीता मिश्रा ने दिया। सत्र का संचालन शालिनी सिंह ने किया और धन्यवाद ज्ञापन सीमा सिंह द्वारा किया गया।

इस कार्यशाला में प्रतिभागिता करने वाली आठ राज्यों से आई 51 लेखिकाओं को कवयित्री शुभा के हाथों प्रमाण पत्र और स्मृति चिह्न दिया गया। कार्यशाला में जलेस के केंद्रीय महासचिव नलिन रंजन सिंह, राज्य सचिव ज्ञान प्रकाश चौबे, पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित बिहार के राज्य सचिव कुमार विनिताभ, माधव महेश, राजेंद्र वर्मा, नूर आलम, आजमगढ़ जलेस इकाई के अध्यक्ष अरुण मौर्य, सुधांशु साहिल, राजीव प्रकाश गर्ग भी उपस्थित थे।

जलेस के केंद्रीय महासचिव नलिनरंजन सिंह की रिपोर्ट

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