लोकधुनों से से हिंदी सिनेमा को अमर संगीत देने वाले सचिन देव बर्मन

सिनेमा जगत

1 अक्तूबर को 120वीं जयंती थी, विनम्र श्रद्धांजलि

लोकधुनों से से हिंदी सिनेमा को अमर संगीत देने वाले सचिन देव बर्मन

 

“सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा…
> बहती नदिया कहे पुकार, मौज न दूजी बार…!”

> जब किसी संगीतकार की तान गूंजती है, तो लगता है जैसे गंगा-ब्रह्मपुत्र के कछार पर कोई मांझी अपनी नाव खेते हुए ज़िंदगी का सबसे गहरा सच गुनगुना रहा हो। एक ऐसा संगीतकार जिसके जिस्म में त्रिपुरा के राजवंश का ख़ून दौड़ता था, लेकिन जिसकी रूह बंगाल के बाउल और भाटियाली लोकगायकों की फटी हुई चादर में लिपटी रहती थी। जिसने महलों की ऐयाशी और नवाबी ठाठ-बाट को ठोकर मारकर माटी के सुरों को अपनी सल्तनत बना लिया। भारतीय सिनेमा के उस अमर स्वर-शिल्पी का नाम था—सचिन देव बर्मन (S. D. Burman / सचिन दा)।

आज 1 अक्टूबर 2026 को भारतीय संगीत के युगपुरुष, पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित महान संगीतकार व गायक सचिन देव बर्मन की 120वीं पावन जयंती है। 1 अक्टूबर 1906 को तत्कालीन अविभाजित भारत के कोमिला (अब बांग्लादेश) में जन्मे सचिन दा ने हिंदी सिनेमाई संगीत को वो सोंधापन, वो सादगी और वो गहराई दी जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में नहीं मिलती।

1. राजमहल की चारदीवारी से निकलकर माटी के सुरों का मुरीद

सचिन दा का जीवन किसी महागाथा से कम नहीं था:
* वे त्रिपुरा के शाही परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता राजा नबद्वीपचंद्र देव बर्मन खुद एक कुशल चित्रकार और सितार वादक थे।
* घर में राजसी सुख-सुविधाओं का अंबार था, लेकिन सचिन दा का मन महलों के सोने-चांदी में नहीं, बल्कि खेतों, जंगलों और नदियों के किनारे गाए जाने वाले मछुआरों और चरवाहों के लोकगीतों में रमता था।
* उन्होंने उस्ताद बादल खान और भीष्मदेव चट्टोपाध्याय जैसे उस्तादों से शास्त्रीय संगीत की तालीम ली, लेकिन सुरों को माटी से जोड़े रखा। 1944 में जब वे मुंबई (तब बॉम्बे) पहुंचे, तो उनका एकमात्र मक़सद था—हिंदुस्तानी सिनेमा को वो धुनें देना जो बनावटी न हों, बल्कि सीधे रूह में उतर जाएं।

2. देव आनंद और ‘नवकेतन’: रोमांस का वो अल्हड़ स्वर्ण युग

सचिन दा और देव आनंद की जोड़ी हिंदी सिनेमा के सबसे जादुई अध्यायों में से एक है:
* जब देव आनंद ने अपने बैनर ‘नवकेतन’ की स्थापना की, तो सचिन दा उनके घर के स्थायी संगीतकार बन गए।
* बाज़ी (1951): गीता दत्त की आवाज़ में “तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले…” ने हिंदी फिल्मों में ग़ज़ल को पाश्चात्य जैज़ और क्लब बीट्स के साथ मिलाकर एक नया इतिहास रच दिया।
* टैक्सी ड्राइवर (1954): तलत महमूद की आवाज़ में “जाएँ तो जाएँ कहाँ…” ने सचिन दा को उनका पहला फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाया।
* नौ दो ग्यारह (1957), काला पानी (1958), तेरे घर के सामने (1963): “हम हैं राही प्यार के”, “अंछा जी मैं हारी चलो मान जाओ ना”, “दिल का भंवर करे पुकार”—इन गीतों ने देव आनंद के ऑन-स्क्रीन चार्म को अमर बना दिया।

3. गुरु दत्त और ‘प्यासा’ से ‘कागज़ के फूल’: रूहानी विलाप का चरम

अगर गुरु दत्त की फिल्में सिनेमा का क्लासिक साहित्य हैं, तो सचिन दा का संगीत उस साहित्य की स्याही है:
* प्यासा (1957): साहिर लुधियानवी की आग उगलती शायरी और सचिन दा की रूहानी धुनें। मोहम्मद रफी का गाया “ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया…” और हेमंत कुमार का “जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला”—सचिन दा ने इन धुनों में ऐसा ठहराव दिया कि दर्शक सिनेमा हॉल में सुबक पड़ते थे।
* कागज़ के फूल (1959): गीता दत्त का गाया “वक़्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे न तुम हम रहे न हम…”—कैकी मिस्त्री के हवाईयन गिटार के नाज़ुक सुरों और रोशनी के एक अकेले बीम के बीच सचिन दा ने जो उदासी रची, वह आज भी विश्व सिनेमा का मास्टरक्लास है।

4. ‘गाइड’ (1965): संगीत का वो एवरेस्ट जिसे कोई लांघ न सका

शैलेंद्र के अमर बोल और सचिन दा के संगीत से सजी ‘गाइड’ भारतीय सिनेमा के संगीत का सर्वोच्च शिखर है:
* “आज फिर जीने की तमन्ना है”: लता मंगेशकर की शोख़ आवाज़ और मटके की थाप पर वहीदा रहमान का वो बेपरवाह घुंघरू तोड़ डांस—इस गाने ने नारी मुक्ति को एक नई परिभाषा दी।
* “तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं“: मोहम्मद रफी की मखमली गायकी में डूबा दो आत्माओं का मौन मिलन।
* “दिन ढल जाए हाय रात न जाए“: जुदाई और शराब के नशे में डूबे दर्द का अमर तराना।
* “गाता रहे मेरा दिल“: किशोर कुमार और लता जी का वो सदाबहार रोमांस।
* और सबसे बढ़कर, खुद सचिन दा की अपनी आवाज़ में गाया—”वहाँ कौन है तेरा, मुसाफ़िर जाएगा कहाँ…“। जब सचिन दा अपनी कंपकंपाती लेकिन रूह कंपा देने वाली आवाज़ में गाते हैं, तो लगता है जैसे कोई संन्यासी दुनिया के नश्वर होने का अंतिम सच समझा रहा हो।

5. अपनी आवाज़ का जादू: जब खुद सचिन दा ने माइक थामा

सचिन दा केवल दूसरों से नहीं गवाते थे, बल्कि जब वे खुद गाते थे, तो उनका स्वर सीधे कायनात से जुड़ जाता था:
* बंदिनी (1963): “ओ रे मांझी… मेरे साजन हैं उस पार…”—नूतन की आंखों का मौन दर्द और सचिन दा की भाटियाली पुकार ने इस गाने को अमर कर दिया।
* सुजाता (1959): “सुन मेरे बंधु रे, सुन मेरे मितवा…”
* आराधना (1969): “सफ़ल होगी तेरी आराधना…”
* उनकी आवाज़ में शास्त्रीय नज़ाकत से ज़्यादा वह देहाती दर्द और मिट्टी की सोंधी पुकार थी जो सीधे दिल की परतों को चीरती हुई रूह में बैठ जाती थी।

6. किशोर कुमार का पुनर्जन्म और पंचम दा (R. D. Burman) को तराशना

सचिन दा नए प्रयोगों और प्रतिभा को पहचानने के सबसे बड़े पारखी थे:
* आराधना (1969): जब सचिन दा बीमार पड़े, तो उन्होंने अपने बेटे राहुल देव बर्मन (पंचम) के साथ मिलकर किशोर कुमार को मुख्य आवाज़ बनाया। “रूप तेरा मस्ताना” और “मेरे सपनों की रानी” ने किशोर कुमार को रातों-रात सुपरस्टार गायक बना दिया और हिंदी संगीत का मिज़ाज हमेशा के लिए बदल दिया।
* अभिमान (1973): ऋषिकेश मुखर्जी की इस क्लासिक फिल्म में सचिन दा ने शास्त्रीय संगीत की जड़ों को फिर से खंगाला। “तेरे मेरे मिलन की ये रैना”, “पिया बिना पिया बिना”, और “मीत ना मिला रे मन का”—यह साबित करने के लिए काफी था कि 67 वर्ष की उम्र में भी सचिन दा का संगीत कितना युवा और ताज़ा था।
31 अक्टूबर 1975 को जब 69 वर्ष की आयु में सचिन दा ने इस नश्वर संसार को अलविदा कहा, तो वे अपने पीछे सुरों का ऐसा अनमोल खजाना छोड़ गए जो सदियों तक मानवता को सुकून देता रहेगा।
माटी के गीतों को राजमहलों के सिंहासन पर बिठाने वाले, संगीत के अमर संत और युगदृष्टा सचिन देव बर्मन साहब की 120वीं जयंती पर कोटि-कोटि नमन व संगीतमयी स्वरांजलि! जब तक किसी नदी के किनारे कोई मांझी नाव खेएगा और जब तक हवाओं में “वहाँ कौन है तेरा मुसाफ़िर…” की गूंज रहेगी, सचिन दा हर संगीतप्रेमी के दिल में अमर रहेंगे।
****
सचिन दा की संगीतबद्ध की हुई कौन सी धुन—’गाइड’ का “दिन ढल जाए”, ‘कागज़ के फूल’ का “वक़्त ने किया”, ‘प्यासा’ का दर्द, या उनकी खुद की आवाज़ में “ओ रे मांझी”—आपकी रूह को सबसे गहरा सुकून देती है?

song with soul फेसबुक वॉल से साभार

Comments

Your email address will not be published.

0