बुधवार 30 सितंबर को सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जिस तरह चौंकाते हुए धनराज परिमल नाथवानी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया वह विपक्ष ही नहीं पूरे देश के लिए शॉकिंग न्यूज की तरह था जो अखिलेश को इंडिया गठबंधन में बड़े भागीदार के तौर पर देखते हैं। अब केवल वोट लेने के लिए ही समाजवाद के नाम का उपयोग रह गया है। एक बड़ी लंबी सूची है समाजवादियों के विचारधारा से हटने की। नाथवानी को राज्यसभा ले जाने के पीछे अखिलेश की मंशा या रणनीति क्या है यह तो बाद में पता चलेगा, लेकिन लोगों द्वारा संदेह और संशय उठाना लाजिमी है। वरिष्ठ लेखक, चिंतक, पत्रकार अरुण माहेश्वरी ने भी एक आकलन किया है, आप भी पढ़िए। इस कड़ी में कुछ और प्रतिक्रियाएं दी जा सकती हैं। संपादक
राजनीति
केंद्र में बादशाह, राज्यों में क्षत्रप?
अरुण माहेश्वरी
इंडिया ब्लॉक की बैठक में अखिलेश यादव की अनुपस्थिति और उसी समय समाजवादी पार्टी द्वारा रिलायंस इंडस्ट्रीज के वरिष्ठ अधिकारी धनराज परिमल नाथवानी को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाए जाने से कुछ स्वाभाविक सवाल उठते हैं। निश्चित ही अभी इन घटनाओं को किसी गुप्त समझौते का प्रमाण मानना गलत होगा। सपा को संदेह का पूरा लाभ मिलना चाहिए। लेकिन ऐसी राजनीतिक घटनाओं के संभावित अर्थों पर विचार करना गैर-जरूरी नहीं लगता है।
अखिलेश की अनुपस्थिति के पीछे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ सीटों के बँटवारे पर तनाव की बात भी कही जा रही है। नाथवानी की उम्मीदवारी के पीछे सपा का अपना कोई राजनीतिक गणित भी हो सकता है।

फिर भी सवाल रह जाता है कि जब वोट चोरी और चुनाव आयोग की साज़िशों की पृष्ठभूमि में जनतंत्र की ज़िंदगी और मौत के सवाल पर एक साझा संघर्ष की तैयारी चल रही है, ऐन उसी वक्त एक मोदी-समर्थक सबसे बड़े कॉरपोरेट घराने से जुड़े व्यक्ति को राज्य सभा में पहुँचाने का निर्णय क्या राजनीतिक संदेश देता है?
क्या यह सोचना पूरी तरह से काल्पनिक होगा कि भारत की राजनीति में कोई ऐसी संभावना बन रही है जिसमें मोदी केंद्र में अपनी सत्ता के स्थायित्व के बदले क्षेत्रीय दलों के लिए राज्यों में शासन की गुंजाइश को मान लें ? विपक्ष के कुछ दलों को प्रदेश की सत्ता सौंप कर केंद्र को चुनौती देने वाले साझा संघर्ष को कमजोर कर दिया जाए?
उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ये सवाल विशेष महत्व रखता है। मोदी वहाँ भाजपा की हार को मान कर कहीं वोट चोरी के अपराध के प्रमाणित आरोप का उत्तर देने का तो नहीं सोच रहे हैं कि जिस चुनाव-प्रणाली में भाजपा उत्तर प्रदेश हार सकती है, उस पर धाँधली का आरोप कैसे लगाया जा सकता है?
इससे आगे की आशंका और गंभीर है। फासीवादी शासन की संरचना का मर्म है पूंजीवादी शासन की जनतांत्रिक प्रणाली के स्थान पर पूंजीवादी शासन की राजशाही वाली प्रणाली लाना । केंद्र में एक बादशाह और प्रदेशों (रियासतों) में राजसी ठाठ वाले क्षत्रपों की पूरी श्रृंखला । ऐसे में क्षेत्रीय दलों की सरकारें होंगी, उनके झंडे और स्थानीय प्रतिद्वंद्विताएँ भी होंगी। लेकिन राज्य और नागरिक के जीवन के सभी प्रमुख मामलों में बादशाह के फ़रमान ही अंतिम होंगे ।
ऐसे में कॉरपोरेट पूँजी परस्पर विरोधी दलों के बीच संपर्क का माध्यम रहेगी, उनके संघर्ष की सीमाएँ तय करने वाली बाहरी शक्ति । सबके लिए कॉरपोरेट के कारोबारी हितों को प्राथमिकता देने एक अलिखित कर्तव्य होगा ।
आरएसएस के एकचालकानुवर्तित्व से इस राजशाही व्यवस्था का पूरा मेल बैठता है । अंतिम आदेश के एक केंद्र में संकेंद्रित होना ही उसके मूल में है।
हमारे से सवाल अभी सपा के खिलाफ कोई राय नहीं हैं। वह तो उसके आगे के आचरण से जाँचा जायेगा । चुनाव आयोग की वोट चोरी के विरुद्ध संघर्ष में उसकी भागीदारी से, विपक्ष की एकता के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से और मोदी-आरएसएस को चुनौती देने के मामले में आगे की उसकी तत्परता से।
फिर भी, सपा को संदेह का लाभ देते हुए ही, हम उनसे यह जरूर पूछना चाहेंगे कि क्या प्रदेश में सरकार बनाने की अपनी लड़ाई को वे देश में लोकतंत्र की रक्षा के संघर्ष से जोड़ कर देखेंगे या राजनीति के नाम पर उसे ही स्वयं में एक अंतिम लक्ष्य मानने की पैंतरेबाज़ी करेंगे?
हमारे सवाल का उत्तर तो अभी भविष्य के गर्भ में ही है।
अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से साभार
