लघु कथा
वह आवाज़
डॉ रीटा अरोड़ा
“फॉर्म भर दिया?”
रिया ने पूछा।
निशा ने सिर हिलाया, “नहीं।”
“क्यों?”
“शायद मुझसे नहीं होगा।”
“ये किसने कहा?”
“किसी ने नहीं।”
“फिर?”
निशा हल्का-सा मुस्कुराई, “मन ने।”
रिया कुछ क्षण उसे देखती रही।
“मन की हर बात सच होती है?”
निशा ने कोई जवाब नहीं दिया।
लैपटॉप पर आवेदन-पत्र खुला था।
“तू हर बार ऐसा ही करती है,” रिया ने कहा।
“क्या?”
“पहले डरती है… फिर दूसरा रास्ता ढूँढ़ लेती है।”
निशा की आँखें झुक गईं।
“अगर असफल हो गई तो?”
“तो कोशिश की होगी।”
“लोग क्या कहेंगे?”
रिया मुस्कुराई, “लोगों का काम कहना है।”
निशा चुप रही।
स्क्रीन पर Submit चमक रहा था।
उसकी उँगली माउस पर थी।
मन ने फिर फुसफुसाया-
“रहने दे… अभी नहीं।”
निशा ने स्क्रीन से नज़र हटाकर खिड़की के बाहर देखा।
कुछ देर बाद उसने फिर स्क्रीन की ओर देखा।
कर्सर अब भी वहीं चमक रहा था।
उसने धीरे से माउस आगे खिसकाया।
घड़ी की टिक-टिक अचानक उसे बहुत साफ़ सुनाई देने लगी।
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