विचार
छात्रों की गूँज के आशय और प्रासंगिकता
राजकुमार कुम्भज
किसी भी देश के लिए ” छात्रों की गूँज ” के आशय की सबसे महत्वपूर्ण तथा प्राथमिक प्रासंगिकता यही है कि देश एक बार फिर बदलाव के लिए जाग रहा है.दुनिया जानती है कि किसी भी देश की संपूर्ण संभावनाऍं तथा शक्तियाँ युवाओं के हाथों में ही निहित रहती आईं हैं.
व्यवस्था-परिवर्तन के आशय और दृष्टिकोण से देश के कुछ शहरों में “छात्रों की गूँज” कार्यक्रम हो रहे हैं.आरोप है कि ये सभी कार्यक्रम प्रायोजित हैं.फिर भी ध्वनियाँ साफ़-साफ़ सुनी जा सकती हैं,लेकिन सवाल ये है कि जिन्हें सुनना चाहिए क्या वे भी सुन पा रहे हैं या सुनेंगे?
व्यवस्था-परिवर्तन के संदर्भ में छात्रों की गूॅंज जैसी घटनाओं से लोकतंत्र का परिमार्जन होता रहता है.छात्र-शक्ति के कंधों पर ही किसी भी देश का वर्तमान और भविष्य निर्भर करता है.
छात्र-छात्राओं के तथाकथित कार्यक्रम प्रायः सफल हो जाते हैं और जब
खेल-तमाशा,बैंड-बाजा,नाच-गाना,
फूहड़ताभरे हास्यास्पद प्रसॅंगों की शर्मशार करनेवाली उत्तेजनाभरी प्रस्तुतिया हों,तब तो कहना ही क्या?( संदर्भ;-जंतर-मंतर की कथित अश्लीलता )
दूसरी तरफ़,राहुल गांधी के शो अगर वोट में तब्दील नहीं हो पा रहे हैं,तो ये एक ऐसी वास्तविकता है,जिसे सभी काॅंग्रेसी-हमदर्द अच्छी तरह से समझ तो रहे हैं,लेकिन स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं.शहर इन्दौर में ‘ छात्रों की गूॅंज ‘ की अनुगूँज देश में सुनाई दी,तभी दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने भाजपा और आरएसएस समर्थित,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के पदाधिकारियों को विजेता चुन लिया.ग़ौरतलब है कि उमड़ती अथवा साथ चलती हुई भीड़ का वोट में तब्दील नहीं हो पाना एक सर्वव्यापी,सर्व विदित सच्चाई पूर्ववत तथा यथावत साभार बनी हुई है.
किन्तु काग्रेस-विरोधियों की स्थिति पूर्ववत पूर्णतः दुराग्रह मुक्त नहीं है.कहना कठिन है कि वे लोकतांत्रिक-प्रणाली से भी कभी कुछ सोच-समझकर अभिव्यक्त कर पाऍंगे या नहीं? क्यों स्वीकार नहीं किया जा रहा है कि प्रतिपक्ष के प्रति जागरूकता और हमदर्दी का इधर,विभिन्न स्तरों पर, ( विकल्पहीनता के बावजूद )जो विस्तार दिखाई दे रहा है,वह ज़रा भी अकारण नहीं है.
दिलचस्प है कि सत्ता-पक्ष का ये अपराजेयवाला तथाकथित दंभ और मुग़ालता दूर हो सकता है.विपक्ष की आंतरिक कलह व काँग्रेस की जगजाहिर गुटबाज़ी के रहते हुए भी आगामी चुनाव नतीज़े अप्रभावित नहीं रह सकेंगे.इसे दावा नहीं,संभावना समझा जाना चाहिए.
सत्ता-पलट होगा या नहीं,ये अलग बात है,किन्तु सीटों में हेर-फेर निश्चित दिखाई दे सकता है.हार-जीत के फ़ैसले बदल सकते हैं.प्राप्त मतों के ऑंकड़ों में अगर कुछ चमत्कारी-फ़ासले दिखाई दे जाऍं,तो कृपया आश्चर्य नहीं करें!
माना कि सिस्टम की निंदा में सभी की सहमति रहती आई है,मगर परिवर्तन की प्रक्रिया और ज़िम्मेदारी से न सिर्फ़ सभी पीछे हट जाते हैं,बल्कि बड़ी बेशर्मी से मौजूदा व्यवस्था का ख़ुद ही हिस्सा भी बन जाते हैं,जो कि नितांत निंदनीय तो है ही,गंभीर विचार का भी विशेष सवालिया विषय है.
में हर गूज का तूती बन जाना,एक ऐसी ही सच्चाई है जिसे देश का समूचा वर्तमान भुगत रहा है.फिर भी व्यवस्था-परिवर्तन के संदर्भ में “छात्रों की गूज” के आशय की प्रासंगिकता सदैव ही बनी रहेगी.
