कविता
जाग उठो, आवाज़ दो!
नरसिंह कुमार मयूर
जाग उठो, आवाज़ दो!
बदलाव की आस और हमारी ज़िम्मेदारी;
हम बदलाव चाहते हैं, पर अपनी जान के बदले नहीं,
हम चाहते हैं, कहीं से कोई मसीहा उतर आए,
हमारे हक़ की बात करे, अनशन करे, प्रदर्शन करे, धरने दे
या करे कोई चमत्कार, खाए हमारे हिस्से की लाठियाँ,
सहे सारे तिरस्कार, और बिना कुछ बोले, परोस दे
हमारी थाली में हमारे अधिकार, रोटी और रोज़गार।
हम बदलाव चाहते हैं, मगर ख़र्च कुछ न हो,
बैठे बिठाए हमको मिल जाए हर एक जो।
कोई तो आए जो हमारी जंग ख़ुद ही लड़े,
धूप में तप कर वो सड़कों पर अकेले अड़े।
सह ले ज़ुल्मों-सितम वो और खाए लाठियाँ,
चुपचाप वो समेटे हमारे हिस्से की बाटियाँ।
हम तो बस दूर से तमाशा ये देखेंगे,
हक़ीक़त से मुँह मोड़ कर आराम करेंगे।
नसों में ख़ून की गर्मी कहीं गुम हो गई,
बेफिक्री की ये आदत तो ज़हर बन गई।
उठो अब नींद से तुम भी ज़रा आँख खोलो,
बदलाव के वास्ते अब तुम ख़ुद भी कुछ बोलो।
पर कब तक यूँही दूसरों के, कंधों पर बंदूक चलाओगे?
बैठे-बिठाए कब तक, तुम अपना मुक़द्दर पाओगे?
इंकलाब की मशाल को खुद भी, तो हाथ लगाना होगा,
अपनी तकदीर का पहिया, खुद ही तो घुमाना होगा।
