छोटे लम्हे, बड़ी सीख (11)

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

छोटे लम्हे, बड़ी सीख (11)

डॉ. रीटा अरोड़ा

1. पापा की धीमी चाल

बाज़ार में पिता धीरे-धीरे चल रहे थे।

बेटे ने कहा, “पापा, थोड़ा जल्दी चलिए न।”

पिता मुस्कुराए, “तू छोटा था तो मैं भी तेरी चाल से चलता था।”

बेटे के कदम अपने-आप धीमे हो गए।

*सीख*: जिन्होंने कभी हमारी रफ्तार पकड़ी थी, एक दिन हमें उनकी रफ्तार पकड़नी होती है।

 

2. बच्चे की हार

 

बेटा उदास होकर बोला, “मम्मी, मैं हार गया।”

माँ ने पूछा, “कोशिश पूरी की थी?”

“हाँ।”

माँ ने उसे गले लगाया, “तो आज हार नहीं मिली बेटा… अनुभव मिला है।”

*सीख:* बच्चों को हर बार जीतना नहीं, कभी-कभी हारकर संभलना भी सिखाइए।

3. पुरानी कहानी

दादाजी ने वही पुराना किस्सा फिर शुरू किया।

पोता बोला, “दादाजी, यह आप कई बार सुना चुके हैं।”

दादाजी चुप हो गए।

थोड़ी देर बाद पोते ने उनका हाथ पकड़ा, “फिर से सुनाइए… शायद पिछली बार मैंने ठीक से नहीं सुना था।”

दादाजी का चेहरा खिल उठा।

*सीख:* बुज़ुर्ग कभी-कभी कहानी नहीं दोहराते, वे अपना बीता हुआ समय हमारे साथ फिर जीते हैं।

 

4. *घर में कौन है?*

 

पिता मोबाइल पर, माँ लैपटॉप पर और दोनों बच्चे अपने-अपने कमरों में थे।

अचानक बिजली चली गई।

कुछ देर बाद बैठक से हँसी की आवाज़ आने लगी।

बेटी बोली, “पापा, बिजली थोड़ी देर और न आए तो?”

*सीख:* कभी-कभी घर को जोड़ने के लिए नेटवर्क का टूटना भी जरूरी हो जाता है।

5. *दरवाज़ा*

बेटा रोज़ देर से घर आता। माँ दरवाज़ा खोलतीं और पूछतीं, “खाना गरम कर दूँ?”

वह हमेशा कहता, “माँ, आप सो जाया करो, मैं बच्चा नहीं हूँ।”

एक दिन माँ रिश्तेदारी में गई हुई थीं।

उसने अपनी चाबी से दरवाज़ा खोला।

घर वही था… पर पहली बार उसे लगा, दरवाज़ा खोलना और किसी का इंतज़ार करते हुए दरवाज़ा खोलना – दोनों एक बात नहीं हैं।

*सीख:* कुछ रिश्तों की कीमत उनके न होने पर नहीं, उनकी छोटी-छोटी मौजूदगी को समय रहते समझ लेने में है।

6. *टूटा हुआ कप*

 

बच्चे के हाथ से नया कप टूट गया।

वह डरते हुए बोला, “मम्मी, गलती हो गई।”

माँ ने पूछा, “चोट तो नहीं लगी?”

“नहीं।”

“तो कप ही टूटा है… तुम्हारा भरोसा नहीं।”

*सीख:* चीज़ों से ज्यादा कीमती वह विश्वास है, जिसके साथ बच्चा अपनी गलती हमारे सामने स्वीकार कर सके।

 

डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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