राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं
1.घर के भीतर घर में
घर के भीतर घर में
और फिर घर के बहुत-बहुत भीतर ही
तरतीब से रखी हैं कुछ बेतरतीब चीज़ें
उन्हीं-उन्हीं बेतरतीब चीज़ों में एक स्त्री
तलाश रही है,सदियों से तलाश रही है
अपनी पसंद,अपने हिस्से की कुछ चीज़ें
सोचती है,ज़रा कुछ सोचती है कभी
कहाँ गईं,कहाँ गईं वे तमाम सुंदर चीज़ें
जो कभी,यहीं-कहीं सलीक़े से रखीं थीं
कठिन वक़्त की कठिनाइयाँ समेटते हुए
एक माँ ने अपने ऑंसुओं में भिगोकर
बच्चों की तुतलाती ख़ुशियों के साथ-साथ
समझकर अपने जीवन का तप और ताप
एक स्त्री फिर-फिर तलाशती है जीवन
और तलाशती रहती है दु:ख दूसरे-तीसरे
कभी ऑंसू,कभी ऑंसुओं में सुख-संताप
और कभी बेतरतीब चीज़ों में घर अपना
जो गुम हुआ जाता है बार-बार यहीं-कहीं
और फिर घर के बहुत-बहुत भीतर ही
घर के भीतर घर में.
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2.माँ ने देखे हैं कई-कई इतिहास
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घर के ख़ाली हिस्सों में
हमेशा ही गूँजती रहती है माँ की आवाज़
कोई भी जगह होती नहीं है शून्य समान
बच्चों की किलकारियों के साथ-साथ
हर कहीं बिखरे पड़े हैं माँ के कठिन दिन
सोचती है,अक़्सर ही सोचती रहती है माॅं
क्यों,गुस्से में क्यों हैं आजकल ये बच्चे
क्यों करते हैं शोर,क्या हैं शिक़ायतें उन्हें
क्यों कर रहे हैं हॅंगामा,क्यों तोड़-फोड़
क्या कुछ मटमैला हुआ है पीने का पानी
क्या कुछ कम हुआ है शब्दों में नमक
क्या हड्डियाँ झुकने-मुड़ने से करतीं हैं मना
क्या काँटे चुभने का दर्द अब रहा नहीं
याद रखने की बात है,याद रखना चाहिए
सिर्फ़ चीख़ने से बदलते नहीं हैं इतिहास
बहुत ज़रूरी है युद्ध-मैदानों की घुड़दौड़
माँ जानती है ख़ून और ऑंसू का मतलब
समेटते हुए ऑंसू अपने समझाती है माँ
ऑंसू और ख़ून से लथपथ युद्ध-मैदानों के
माँ ने देखे हैं इतिहास कई-कई
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3.पृथ्वी का अनुवाद है माँ
पृथ्वी का अनुवाद है माँ
और संसारभर की संस्कृतियों का साराँश
जिसके अंतस में रहते हैं खरबों खनिज
जो कुछ लिखा नहीं,देखा नहीं,सुना नहीं
वह सब छुपाए रखती है माँ अपने सीने में
ऑंखों का पता नदी भी,आग का घर भी
पाँव उसके,गाँव उसके चहकते पक्षी-राग
ख़ुद जागती है फिर जगाती है सूरज को
ब्रह्म वही,ब्रह्माँड वही,नाद वही,सृष्टि वही
ऑंधी-तूफ़ानों की शीतल दृष्टि-वृष्टि वही
उसीसे है अंधेरी रातों में मेले चाॅंद-तारों के
फूल में रॅंगों का खिलना क्या,खौलना क्या
खनकतीं हैं चूड़ियाँ,कौंधती हैं बिजलियाँ
माँ का होना है होना मेरा,तेरा और सब
अक़्सर-अक़्सर ही जब आती नहीं है नींद
मेरे सिरहाने रखकर एक छोटा-सा चाकू
अपने कटे-फटे कपड़ों के किसी पल्लू से
ख़ुशी-ख़ुशी बाँध रखती है प्रेम और दु:ख
पृथ्वी का अनुवाद है माँ।
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