सिनेमा की बातें
शैलेंद्र की जन्म तिथि 30 अगस्त को थी।
मैं, मेरा कवि और मेरे गीत
शैलेन्द्र
मैं, मेरे गीत और मेरा कवि विरोधाभास के बावजूद अरसे से साथ हैं। सबसे पुरानी स्मृति शायद तब की है जब अलस सुबह नींद खुली थी, जाडे के दिन थे रजाई में लिपटा मैं बिस्तरे पर बैठा था, पिता फौज में थे, सबेरे ही तैयार होकर परेड में पहुँचना होता था, स्नान करने जा रहे थे और गा रहे थेः ‘अब कहाँ जायेगो रे लीन्हों हाथ पकड़ के’। माखनचोर कृष्ण पकड़ में आ गये, नन्हें गोपाल कृष्ण की बचपन में कल्पित यह तस्वीर जीवन भर नहीं भूलेगी।
पिता तो भक्ति-रस के गीत गाते ही थे, माँ भी अच्छा-खासा गा लेती थीं। चक्की पीसते हुए, काम करते हुए उनका गीतः ‘हँस पूछे जनकपुर की नार- नाथ कैसे गज के फंद छुड़ाए’। गीत, संगीत और काव्य से मेरा यही प्रथम परिचय था। गीत, संगीत और काव्य में पहले योगदान की भी वह रात, जब शिवनारायण पंथी विरादरी के लोग बसंत पंचमी की रात को आरती में गा रहे थेः ‘दीन दयाऽऽल कृपाऽऽल महाऽप्रभो – दीन दयाऽऽल कृपाऽऽल महाऽप्रभो’। मैं भी बुजुर्गों और समवयस्कों के साथ गा रहा था और डफली बजा रहा था। लय की समझ प्रायः प्राकृतिक होती है, क्योंकि बाद में ऐसे लोग भी देखने में आये हैं, जिन्हें जिन्दगी भर ताल सिखाइए, तो नहीं सीख सकेंगे।
प्रकृति के विस्मयकारी कार्यकलाप भी बहुत बचपन में ही देखने को मिले। कोहमरी (अब पाकिस्तान में) की वे रातें, चीखने-चिंघाड़ने की आवाजें आ रही हैं, कोई जानवर है या प्रेत ? भयभीत जागता रहा हूँ, कब नींद आयी मालूम नहीं। सबेरा हुआ, तो दरवाजा नहीं खुलता, बर्फ जम गयी है। पिताजी फावड़े से बर्फ हटा रहे हैं। बर्फ हटेगी तो दरवाजा खुलेगा, और कोहमरी में ही विदेशी शासन के अन्याय का पहला अनुभव हुआ था। मैं और बहन श्यामा तितलियाँ पकड़ रहे थे। नीचे ढाल पर सड़क से जा रहे थे कान्वेण्ट के अंग्रेज विद्यार्थी लड़के। किसी एक ने पत्थर मारा। बहन की कनपटी से खून बह रहा था- हम काले अपने बाप-दादाओं की जमीन पर स्वछन्द क्यों घूम रहे हैं, इसी की जलन थी उन गोरे सँपोलों को।
मैं, मेरे गीत और मेरा कवि तीनों यदि दौड़ें तो ‘मैं’ ही विजयी होगा, इसलिए नहीं कि अहं बोल रहा है, केवल इसलिए कि यह चोर बदन ‘मैं’ मेरे गीत और मेरे कवि पर बराबर हावी रहा है और अपना प्रभाव डालता रहा है- बुरा और अच्छा।
इस ‘मैं’ का कहना है कि कलाकार कोई आसमान से टपका हुआ जीव नहीं है, बल्कि साधारण इन्सान है, यदि वह साधारण इनसान नहीं, जो जनसाधारण के मनमानस के दुख-सुख को कैसे समझेगा और उसकी अभिव्यक्ति कैसे करेगा? इस ‘मैं’ ने मेरे कवि के वैभव को बहुत बार नोटा-खसोटा है और मेरे ‘गीतकार’ को समय-असमय नींद से झकझोरा है। मेरे कवि के चेहरे पर इसके नाखून के दाग हमेशा के लिए रह गये हैं। मेरा कवि महीन धोती और रेशमी कुर्ता कब से सहेज कर रखे हैं, मगर पहनने का अवसर ही नहीं मिलता। बिना कमानी का चश्मा भी बेकार पड़ा है, क्योंकि ‘मैं’ का कहना है आँखें अभी तेज हैं।
उस दिन ‘मैं’ की ही जिद थी कि मैं कॉलेज छोड़ रहा था, कवि कलप रहा था और गीतकार रो रहा था। सारे आदर्श और सपने छोड़कर जा रहा था- इंजीनियरिंग पढ़ने। कॉलेज के अधिकारियों का कहना था- पैसे ही चाहिए तो यहाँ शिक्षक बन जाओ, पढ़ो भी और पढ़ाओ भी। लेकिन ‘मैं’ कि अड़ा हुआ था। मनोविज्ञान के प्रोफेसर मेहता ने चीरनेवाली आँखों से देखा था और हिन्दी के प्राध्यापक गोपालदत्त शर्मा ने पूछा था, “तो अब क्या मशीनों पर कविता लिखोगे?” मशीनें गाती हैं- यह मुझे भी उस समय नहीं मालूम था, हाँ हाँ- आऽ आऽ आऽ साऽ और मशीनों के साथ गाया जा सकता है। तानपूरे की तरह मशीनें भी स्वर कायम कर सकती हैं। ‘सा’ मिल गया है, दिन की चिलचिलाती धूप में भी आप गा सकते हैं:
रात्रि का अन्तिम प्रहर है
झिलमिलाते हैं सितारे-
वक्ष पर युगबाहु बाँधे
मैं खड़ा सागर किनारे अथवा
(बच्चन)
कहो कौन तुम दमयन्ती-सी तरु के नीचे हो सोई, क्या तुमको भी छोड़ गया है
अलि नल-सा निष्ठुर कोई या
(पन्त)
ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे
(प्रसाद)
फिर पूरे आठ वर्ष मशीनों के तानपूरे पर गीत गाते निकल गये। हजारों की भीड़ से कन्धे रगड़ते सबेरे कारखाने में घुसना और शाम के भोंपू के साथ बाहर निकलना, देश के हर कोने के लोग कारखाने में मौजूद थे- बल्कि विदेश के भी- चीनी सुतार (बढ़ई) भी। देश की एकता का प्रमाण किसी को चाहिए तो चले कारखाने में। तमिल भाषी श्रीकान्तन हिन्दी राष्ट्रभाषा प्रचार सभा माटुंगा का कार्यकर्ता है। शचिन सान्याल अभिनेता पहाड़ी सान्याल का भतीजा है और धड़ल्ले की हिन्दी बोलता। तिवारी जिला जौनपुर का है और उसे दुख है मैं ईरानी चाय पीकर अपना धर्म नष्ट कर रहा हूँ। पलसोले जो अकोला जिले का है सोलह आना महाराष्ट्रीय है और उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के पक्के गीत गुनगुनाता रहता हैः ‘फगुआ ब्रज देखन को चली री’। गुजराती पण्ड्या, जिसके पूर्वज मेरे कृष्ण के साथ गुजरात में आ समाए, जब अपनी भाषा में बोलता है, लगता है, वह ब्रजभाषा का कोई दूसरा रूप बोल रहा है। उद्धव, पण्ड्या का पूर्वज ही होगा जो विरहिणी गोपिकाओं का हाल पूछने आया था और गोपिकाओं ने कहा थाः
हाल कहा बूझत बेहाल परीं बाल सबै
बस दिन द्वैकि देखि दृगन सिधाइयो
रोग यह कठिन न ऊधो कहिबे के जोग
सूधो सो संदेसो याहि तू न ठहराइयो
औसर मिले और सरताल कछु पूछिहैं
तो कहियो कछू न दसा देखी सो दिखाइयो
आर कै कराहि नैन नीर अवगहि कछू
कहिबे को चाहि हिचकी लै रहि जाइयो।
(रत्नाकर)
मशीनों के तानपूरे पर गीत गाते हुए भी सामाजिक विषमता पर नजर जाए बिना न रह सकी। तनख्वाह के दिन (नौ या दस तारीख को) कारखाने के दरवाजे पर जहाँ मिठाई और कपड़े की दूकानों का मेला लगता था, वहाँ पठान और महाजन अपना सूद ऐंठ लेने के लिए खड़े रहते थे। आदमी निकला और गर्दन पकड़ी। देश के बहुत से लोग उधार और मदद पर ही जिन्दगी गुजार रहे हैं। गरीबी मेरे देश के नाम के साथ जोंक की तरह चिपटी है। नतीजा, हम सब एक हो गये- कवि, मैं और मेरे गीत और विद्रोह के स्वर गूंजने लगे- पचास-पचास हजार की भीड़ के बीच। सभाओं और जुलूसों में गाये हुए इस काल के गीत, ‘नया साहित्य’ और ‘हंस’ में छपी इस काल की कविताएँ अति उग्रवादी अवश्य थीं, लेकिन इनके माध्यम से जनजीवन और रुचि को समझने का अवसर मिला और जनजीवन के पास रहने की आदत पड़ी, जो कालान्तर में फिल्मी गीतकार की हैसियत से बहुत काम आये।
जैसा कि पहले कई बार लिख चुका हूँ, फिल्मों में मुझे लानेवाले हैं श्री राजकपूर। उनकी फिल्म ‘बरसात’ ने कई नये लोगों को फिल्म संसार में चमका दिया- निम्मी, प्रेमनाथ, शंकर-जयकिशन, हसरत जयपुरी और मैं धूम से चल निकले, आज हम सोलह वर्ष का लम्बा फासला तय कर आये हैं।
इन सोलह वर्षों के हर दिन ने मेरे गीतकार को कुछ न कुछ सिखाया है, एक बात तो दृढ़ता से मेरे मन में विश्वास बनकर बैठ गयी है कि जनता को मूर्ख या सस्ती रुचि का समझने वाले कलाकार या तो जनता को नहीं समझते या अच्छा और खूबसूरत पैदा करने की क्षमता उनमें नहीं है। हाँ, वह अच्छा मेरी नजरों में बेकार है, जिसे केवल गिने-चुने लोग ही समझ सकते हैं।
इसी विश्वास से रचे हुए मेरे कई गीत (जिन्हें लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे को छेड़ने के लिए नहीं इस्तेमाल कर सकते) बेहद लोकप्रिय हुए हैं, जैसे:
नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है (बूट पालिश), तुम्हारे हैं तुमसे दया माँगते हैं (बूट पालिश), मेरा जूता है जापानी (श्री 420), ऐ मेरे दिल कहीं और चल (दाग), तू प्यार का सागर है (सीमा), बहुत दिया देनेवाले ने तुझको (सूरत और सीरत), सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी (अनाड़ी), सूरज जरा और पास आ (उजाला), हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है (जिस देश में गंगा बहती है), ओ जाने वाले हो सके तो लौट के आना (बन्दिनी) इत्यादि।
कुछ और मजेदार अनुभव सुनाये बगैर आज की बात पूरी नहीं होगी; फिल्म ‘आवारा’ की कहानी सुने बिना, केवल फिल्म के नाम से प्रेरित होकर मैंने ‘आवारा हूँ’ गीत लिख मारा था। मैंने सुनाया तो राजकपूर साहब ने गीत अस्वीकृत कर दिया। फिल्म पूरी बन गयी, तो फिर एक बार उन्होंने यह गीत सुना और अब्बास साहब को सुनाया। अब्बास साहब की राय हुई कि यह तो फिल्म का मुख्य गीत होना चाहिए। बाद में यह गीत अपने देश की सीमा लाँघकर परदेश में भी प्रसिद्ध हो गया।
कई बार गीत की उत्पत्ति अजीब परिस्थिति में हुई। शंकर-जयकिशन से कोई मनमुटाव हुआ था, लिख माराः
छोटी-सी ये दुनिया पहचाने रास्ते हैं,
तुम कभी तो मिलोगे कहीं तो मिलोगे,
तो पूछेंगे हाल।
बाद में यह गीत फिल्म ‘रंगोली’ में पसन्द किया गया। ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के एक गीत की स्थिति के बारे में राजकपूर साहब से बहस हो गयी, धुनकी में उन्हें चुनौती दे बैठा ‘तुम भी हो हम भी हैं दोनों हैं आमने-सामने।’ लड़ाईवाली स्थिति में उसी फिल्म में यह गीत बेहद प्रसिद्ध हुआ। एक दौर फिल्म संगीत में आया, जब लगभग सारे संगीतकार जोर लगाकर कांखनेवाले स्वर में गीत रचना कर रहे थे। यह भेड़चाल मुझे अच्छी नहीं लगी, लिखाः
टीन कनस्तर पीट-पीट कर
गला फाड़कर चिल्लाना-
यार मेरे मत बुरा मान
यह गाना है न बजाना।
‘लव मैरेज’ में यह गीत बड़ा चुटीला रहा।
एकाध बात फिल्म-गीत-लेखन की तकनीक के संबंध में कहूँगा। फिल्म-गीत लिखना अधिकतर बहुत आसान समझा जाता है। सीधे-सादे शब्द, घिसी-पिटी तुकें, कहा जाता है कि फिल्म-गीत और है क्या? मेरा अनुभव कुछ और है। फिल्म-गीत-रचना मेरी समझ से एक विशेष कला है, चूँकि हमारी फिल्में शत-प्रतिशत गीत प्रधान होती हैं, गीत उनमें होते ही हैं, इसलिए गीत जैसे पात्रों के संवाद का काम करते हैं, अन्यथा गीत कहानी को रोकेगा और दूँसा हुआ मालूम होगा। इसलिए भावना और शब्दों का चुनाव कहानी के अनुसार बड़ी सावधानी से करना होता है। यहाँ मुझे याद आती है श्री राजकपूर की एक बात, यूरोप के दौरे से लौटे थे और जवाविनी और डिसीका की कई फिल्में देखकर आये थे। कहने लगे, ‘यार क्या प्यार-मुहब्बत, फूल-पत्तियों को छोड़कर गीत नहीं लिखे जा सकते ?’ और उन्होंने ‘मिरैकिल और मिलान’ के किसी गीत का जिक्र किया था। हमने शीघ्र ही उन्हें जवाब दिया, उनकी अपनी फिल्म ‘बूट पालिश’ जिसके गीतों में दूसरी ही मानवीय भावनाओं से खेला गया था और सफलतापूर्वक गीत ‘तुम्हारे हैं तुमसे दया माँगते हैं, तेरे लाडलों की दुआ माँगते हैं, की रिकार्डिंग के समय मुझे अपने दिवंगत माता-पिता की याद हो आयी थी और मैं अनाथ बच्चे की तरह रो पड़ा था।
गीत पहले लिखा जाए और फिर धुन बनाई जाए या धुन पर गीत लिखा जाए, इस सवाल को लेकर काफी कुछ कहा गया है। बहुत-से लोगों का मत है कि धुन पर लिखा गीत बढ़िया नहीं हो सकता, मैं ऐसा नहीं मानता। मेरा ख्याल है कि यदि गीतकार को संगीत की थोड़ी-बहुत समझ है तो वह धुन पर अच्छा गीत लिखेगा-नये-नये छंद उसे मिलेंगे और दूसरी ओर यदि संगीतकार को काव्य की थोड़ी-बहुत समझ है तो वह लिखे हुए गीत पर बढ़िया धुन बनाएगा, शब्दों और भावनाओं को फूल की तरह खिलाता हुआ।
आजकल मैं, मेरा गीतकार और मेरा कवि एक फिल्म निर्माण में लगे हैं। फिल्म है रेणु की ‘तीसरी कसम उर्फ मारे गये गुलफाम’। आशा है ये लोग कसम निभाएँगे।
यह लेख ‘धरती कहे पुकार के… गीतकार शैलेंद्र’ से साभार लिया गया है। इसके संपादक इंद्रजीत सिंह हैं।)
