प्रतिबिम्ब मीडिया की तरफ से भावपूर्ण नमन ।विनम्र श्रद्धांजलि।
नहीं रहे बल्लभ डोभाल
प्रतुल जोशी जी के फेसबुक वॉल से पचा चला कि आज शनिवार को वरिष्ठ पत्रकार, लेखक बल्लभ डोभाल जी का निधन हो गया। उनके लेख पिछले वर्षों तक राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित होते रहे। उनके लेखों से ही पता चलता था कि वे कितने संवेदनशील पत्रकार थे। प्रतुल जोशी ने फेसबुक पर जो लिखा है उसे श्रद्धांजलि स्वरूप हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं। संपादक
वे नोएडा में रहते थे। वर्ष 1930 में वे पौड़ी गढ़वाल में पैदा हुए थे। उन्होंने लाहौर, धर्मशाला और इलाहाबाद से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने जीवन भर फ्रीलांसिंग की
वे कभी किसी समूह से बंधकर नहीं रहे। तीन दर्जन से ज्यादा किताबें लिखी हैं। वे संस्मरणों की खान हैं। लेकिन विधि का विधान है कि जिंदगी के इस मोड़ पर उन्हें अकेले ही रहना पड़ रहा है। एक बेटा धर्मशाला में है और एक दिल्ली में ही नजफगढ़ में हैं।
बल्लभ डोभाल बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे शुरू से ही यायावर रहे। साहित्य सेवा के लिए उन्होंने पूरा जीवन समर्पित कर दिया। जहां लोग नौकरी के लिए दूसरे से सिफारिश करते हैं, वहां बल्लभ डोभाल मिली हुई नौकरी को ठुकराते रहे। वे कभी भी बंध कर नहीं रहे।
भीड़ से अलग, लंबे कद व छरहरे बदन के भीतर अपनी जिज्ञासाओं से बाहर निकलते बल्लभ कभी कविता के माध्यम से अपने चिंतन की परिभाषा लिखते रहे,
‘बुझे ये आग के शोले न जाने कब भड़क जाएं।
हुई नाकाम सी बाहें न जाने कब फड़क जाएं।’
ग्रामीण पर्वतीय अंचल की सोहबत में लोकगीतों ने उन्हें गुनगुनाना सिखाया तो ‘सैनिक’ तथा ‘कदम-कदम पर’ कविता संग्रह प्रकाशित हुए, लेकिन उन्होंने हिंदी कविता को संस्कृत की प्रतिध्वनि मानते हुए स्वीकार किया कि उर्दू के रंग में हिंदी कविता ने तेवर दिखाए हैं।
