घोंसला खाली होने के बाद… दरवाजे पर दस्तक का इंतज़ार
उम्र 55 पार… और मन में एक सवाल – बुढ़ापा कैसे कटेगा?
डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, आप दोनों ठीक तो हो न?”
“हाँ बेटा, बिल्कुल ठीक हैं।”
“दवा समय पर लेती हो?”
“हाँ, बिल्कुल।”
“अच्छा माँ, अभी मीटिंग है… बाद में बात करता हूँ।”
“ठीक है बेटा… अपना ध्यान रखना।”
फोन कट गया।
माँ कुछ देर मोबाइल को देखती रही।
पिता ने पूछा, “बात हो गई?”
माँ ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ।”
“क्या कह रहा था?”
“यही… कि अपना ध्यान रखना।”
पिता ने धीरे से कहा, “हमारा ध्यान रखने के लिए तो अब उसके पास समय नहीं है… इसलिए शायद वह बार-बार कहता है कि अपना ध्यान रखना।
माँ ने उनकी ओर देखा।
दोनों कुछ नहीं बोले।
क्योंकि कुछ दर्द ऐसे होते हैं, जिन्हें कह दिया जाए तो शिकायत लगते हैं और चुप रहो तो सीने में पत्थर बनकर पड़े रहते हैं।
55 पार की उम्र…
वह उम्र जब माता-पिता को लगता है कि अब जिंदगी थोड़ी आसान होगी।
बच्चे बड़े हो चुके हैं। उनकी पढ़ाई पूरी हो गई। नौकरी लग गई। घर बस गया।
जिस भविष्य के लिए उन्होंने अपनी इच्छाएँ टाली थीं, वह भविष्य सामने खड़ा है।
लेकिन तभी एक दूसरा सवाल धीरे-धीरे उनके भीतर जन्म लेने लगता है-
“अब हमारा क्या?”
बच्चे दूर हैं।
किसी का शहर अलग है, किसी का देश।
फोन पर रोज बात हो जाती है, वीडियो कॉल पर चेहरा भी दिखाई दे जाता है।
लेकिन जब रात के दो बजे अचानक तबीयत बिगड़ती है, तब मोबाइल की स्क्रीन से निकलकर कोई हाथ माथे पर नहीं रखा जा सकता।
यही डर 55 पार माता-पिता को अंदर से खाता है।
वे बच्चों से यह नहीं कहते-
“हमारे पास आ जाओ।”
क्योंकि उन्हें मालूम है कि बच्चों की भी अपनी जिंदगी है।
वे यह भी नहीं कहते-
“हमारे लिए अपनी नौकरी छोड़ दो।”
उन्हें बच्चों की मजबूरी समझ आती है।
वे बस मन ही मन चाहते हैं-
“जब हम कमजोर पड़ें, तब हमें अकेला मत छोड़ना।”
और यही इच्छा कई बार उनके लिए अपराधबोध बन जाती है।
वे बीमार होते हैं तो कहते हैं-
“कुछ नहीं हुआ।”
डॉक्टर के पास जाना होता है तो कहते हैं-
“अकेले चले जाएँगे।”
दर्द बढ़ता है तो कहते हैं-
“उम्र हो गई है, थोड़ा बहुत तो चलता है।”
क्यों?
क्योंकि वे बच्चों को परेशान नहीं करना चाहते।
जिस माँ ने बच्चे के बुखार में पूरी रात उसके सिरहाने बैठकर सुबह की थी, वही माँ आज अपनी बीमारी छिपाकर सो जाती है।
जिस पिता ने बच्चे की फीस भरने के लिए अपनी जरूरतें रोक दी थीं, वही पिता आज दवा खरीदने से पहले कीमत देखता है।
और फिर भी बच्चे को फोन करके कहता है-
“बेटा, तुम्हें किसी चीज की जरूरत हो तो बताना।”
यही तो माता-पिता होते हैं।
बुढ़ापे में भी बच्चों के लिए माता-पिता बने रहते हैं।
शायद इसी वजह से उन्हें अपने बुढ़ापे से डर लगता है।
पैसा कम होने से नहीं।
घर छोटा होने से नहीं।
सुविधाएँ कम होने से भी नहीं।
उन्हें डर लगता है कि कहीं एक दिन वे इतने कमजोर न हो जाएँ कि खुद से उठ न पाएँ…
और उस दिन फोन करने के लिए बच्चों का नंबर तो हो…
लेकिन बच्चे कहें-
“माँ, अभी थोड़ा मुश्किल है… आप पड़ोसी से मदद ले लो।”
यह वाक्य शायद किसी बूढ़े माता-पिता को सबसे ज्यादा तोड़ सकता है।
बच्चे गलत नहीं हैं।
लेकिन माता-पिता का डर भी गलत नहीं है।
बदलते समय ने रिश्तों की दूरी को किलोमीटर में नहीं, समय में मापना शुरू कर दिया है।
बच्चे हजार किलोमीटर दूर रहकर भी हर दिन बात कर सकते हैं।
और एक ही घर में रहकर भी कोई किसी से बात न करे तो दूरी हजारों किलोमीटर की हो सकती है।
इसलिए बुढ़ापे की सबसे बड़ी जरूरत साथ रहना नहीं है।
साथ महसूस होना है।
माता-पिता को यह महसूस होना चाहिए कि-
“हम अभी भी जरूरी हैं।”
“हमारी आवाज अभी भी किसी को सुनाई देती है।”
“हमारी बीमारी किसी की चिंता है।”
“हमारे आने का कोई इंतजार करता है।”
और सबसे बढ़कर-
“हम अपने ही बच्चों के लिए बोझ नहीं हैं।”
शायद बच्चों को यह समझना होगा कि माता-पिता को हर महीने पैसे भेजना पर्याप्त नहीं।
कभी अचानक फोन करके पूछ लेना-
“माँ, आज मन कैसा है?”
कभी पिता से कहना-
“पापा, आपकी आवाज कुछ थकी हुई लग रही है।”
कभी बिना किसी त्योहार के घर पहुँच जाना।
कभी उनकी पसंद की कोई छोटी-सी चीज लेकर कहना-
“आपके लिए लाया हूँ।”
इन छोटी-छोटी बातों से माता-पिता का बुढ़ापा बहुत बड़ा हो जाता है।
क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ इंसान की जरूरतें कम नहीं होतीं…
बस वह अपनी जरूरतें बताना कम कर देता है।
और एक दिन शायद बच्चे समझें कि जिस माँ ने कभी उनके रोने की आवाज आधी रात में सुन ली थी, आज वही माँ फोन पर “मैं ठीक हूँ” कहकर अपनी सिसकी छिपा रही थी।
जिस पिता ने कभी उनके भविष्य की चिंता में रातें जागकर काटी थीं, आज वही पिता अपने भविष्य के बारे में सोचकर चुपचाप छत निहार रहा था।
उसके मन में शायद केवल एक सवाल है-
“हमने तो तुम्हारा बचपन संभाल लिया था बेटा…
क्या तुम हमारा बुढ़ापा संभाल पाओगे?”

बिल्कुल सही है।
परन्तु इसमें बच्चों का कम और हमारा कसूर ज्यादा है क्योंकि आज जो हालात पैदा हुए हैं वह सब तो भारत में सिस्टम के कारण से हुए हैं क्योंकि हम संवैधानिक जीवन में कुछ और है और सामाजिक जीवन में कुछ और। क्या हम सामाजिक जीवन में संवैधानिक मूल्यों को स्थापित कर पाए हैं अगर नहीं तो फिर दोषी कौन?
भारत का संविधान जन्म से लेकर मृत्यु तक सबके कल्याणकारी जीवन की गारंटी देता है क्या हम भारत के लोगों ने इसको, पढ़ा, समझा और जाना।
शायद नहीं। इसी चुक का शायद इस देश के चंद मुट्ठीभर लोग धर्म और जाति की आड़ में सबकुछ छीन कर हम भारत के लोगों को बेगाना सा बनाने में सफल हुए। ऐसी गली सड़ी जातिगत एवं धार्मिक व्यवस्था कायम कर पाए जिसके आज सब शिकार हो रहे हैं। सच में हमने आज की युवा पीढ़ी को क्या दिया। आज तक हम भारतीय ही नहीं बन पाए।
सही कहा है,,, बोएं पेड़ बबूल का, आम कहां से होय।