कहानी गुलजार की

कहानी गुलजार की

राहुल मिश्रा

 

पहली किताब उसने चुराई थी। उम्र, दस-बारह बरस।
नाम था-‘द गार्डनर’। उर्दू तर्जुमे में। लिखने वाला-रवींद्रनाथ ठाकुर।
सत्तर साल बाद, उसी आदमी ने उसी किताब का तर्जुमा खुद किया।
और नाम रखा-बागबान।
अब शुरू से शुरू करते हैं-
एक कस्बा था-दीना। झेलम जिले में।
वो अब पाकिस्तान में है।
और वो आज भी एक आदमी के नाम के भीतर रहता है।
नाम था गुलजार दीनवी।
गुलजार यानी खिला हुआ बाग। दीनवी यानी दीना का।
दीना का खिला हुआ बाग।
फिर कहीं रास्ते में उन्होंने दीनवी छोड़ दिया।
कस्बा नाम से भी निकल गया।
वह ‘खिला हुआ बाग’ यानी ‘गुलजार’ रह गया।
कल, अठारह अगस्त को, वो बाग बयानवे बरस का हो गया।
कागज पर उनका नाम संपूर्ण सिंह कालरा है।
और नाम बदलना शौक नहीं था।
पिता मक्खन सिंह कालरा दीना के बाजार में एक छोटी हट्टी चलाते थे। उन्हें बेटे का शेर कहना पसंद नहीं आता था।
टोका। झिड़का। रोका।
पर बेटे ने लिखना नहीं छोड़ा। उसने अपना नाम छोड़ दिया।


जो लड़का अपने बाप के नाम से लिख नहीं सकता था, उसने अपने कस्बे के नाम से लिखना शुरू कर दिया।
अब उस घर के भीतर आइए।
मां का नाम था सुजान कौर। गुलजार ने उन्हें कभी नहीं देखा। वो तब चली गईं, जब बच्चा दूध पीता था।
रेख्ता पर उनका ब्योरा दर्ज है- सौतेली मां का बरताव अच्छा नहीं था। इसलिए बच्चा घर में कम रहता, और पिता की दुकान में ज्यादा।
एक बच्चा, जिसके पास अपनी मां का चेहरा तक नहीं था।
और जो अपने ही घर में मेहमान की तरह रहता था।
वही आदमी उम्र भर दूसरों के चेहरे लफ्जों में बनाता रहा।
एक याद है, जो वो कई बार सुना चुके हैं।
पिता दुकान का सौदा लाने दिल्ली जाते थे। पहाड़गंज।
बच्चा साथ जाना चाहता था। घरवाले उसे पकड़कर रोक लेते।
और उसे बस इतना दिखता पिता डिब्बे में खड़े हैं।
और गाड़ी सरक रही है।
उसके बाद, जब भी कहीं ट्रेन की सीटी सुनाई देती, वो बच्चा स्टेशन की तरफ भाग जाता था।
कुछ करने नहीं।
बस खड़े रहने।
फिर 1947 आया।
घर छूटा। परिवार बंटा। और वो दिल्ली पहुंचे।
एस्क्वायर इंडिया को दी गई एक बातचीत में उन्होंने बचपन की जो याद बताई है, वो आज भी पढ़ी नहीं जाती।
स्कूल में जो लड़का रोज सुबह की प्रार्थना कराता था, उसे एक भीड़ दिल्ली की सड़क पर घसीटकर ले गई।
आंखों से ओझल।
और भीड़ का सरदार लौटा, तो उसकी तलवार पर खून था।
गुलजार ने कहा मैं इतना डरा हुआ था कि रो भी नहीं सका।
दशकों तक वो उसी पागलपन के सपनों से जागते रहे।
पर उन्हीं दिनों उनके पिता ने एक बात कही थी, जिसे वो उम्र भर साथ लेकर चले।
चारों तरफ लोग मुसलमानों को कोस रहे थे। पिता ने नहीं कोसा।
उन्होंने बस इतना कहा बुरा वक्त आया है। प्रलय आ गई है। लंघ जाएगी।
गुलजार का कहना है कि उन्हीं शब्दों ने उनका जेहन साफ रखा।
जिस आदमी का सब कुछ लुट चुका था, वो अपने बच्चों को नफरत से बचा रहा था।
और बरसों बाद, उसी लड़के ने एक कहानी लिखी।
नाम रावी पार।
दंगों में दर्शन सिंह का परिवार एक गुरुद्वारे में पनाह लेता है। वहीं उसकी पत्नी जुड़वां बेटों को जन्म देती है।
अमृतसर जाती एक मालगाड़ी पर वो परिवार लदा है। रास्ते में एक बच्चा दम तोड़ देता है।
मां दोनों को सीने से चिपकाए बैठी रहती है। मरे हुए को भी।
गाड़ी रावी के पुल पर आती है। कोई सहयात्री कहता है मरे हुए को नदी में बहा दो।
और अंधेरे में, जल्दबाजी में, बाप जिंदा बच्चे को फेंक देता है।
उस आदमी ने बंटवारे पर भाषण नहीं लिखा।
उसने एक बाप के हाथ लिखे।
अब बंबई।
पढ़ाई छूटी। कमाना पड़ा।
और वो बेलासिस रोड के एक गैरेज में लग गए। मुंबई सेंट्रल टर्मिनस के ठीक बगल में।
जो लड़का कभी एक स्टेशन पर खड़ा रहता था, उसकी पहली नौकरी एक स्टेशन के पहलू में मिली।
काम क्या था?
एक्सीडेंट में टूटी गाड़ियों पर रंग चढ़ाना। शेड मिलाना, ताकि जोड़ न दिखे।
उनके अपने शब्द हैं मुझे रंगों की समझ थी।
यहां जरा ठहरिए।
जो आदमी टूटी हुई चीजों पर रंग मिलाकर उनकी दरार छुपाता था, वही आगे चलकर इस मुल्क का वो लेखक बना, जो लफ्जों से टूटे हुए इंसान की दरार दिखाता है।
पूरी उम्र उसने अपना पहला काम उल्टा करके किया।
गैरेज में फुर्सत मिलती थी। पेंट सूखने का इंतजार भी एक फुर्सत है।
उसी फुर्सत में वो पढ़ते, लिखते, कॉलेज जाते, और इतवार को प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन की बैठक में जा बैठते।
अब आते हैं वहां जहां से यह पोस्ट शुरू हुई थी
पहली किताब उसने चुराई थी। उम्र, दस-बारह बरस।
नाम था-‘द गार्डनर’। उर्दू तर्जुमे में। लिखने वाला-रवींद्रनाथ ठाकुर। या शायद किसी ने उन्हें यह किताब पढ़ने को दी थी और उन्होंने अपने पास रख ली। रवींद्रनाथ ठाकुर की। उर्दू तर्जुमे में।
ठाकुर ने वो कविताएं मूल रूप से बांग्ला में लिखी थीं। फिर खुद अंग्रेजी में उतारकर 1913 में छपवाया ‘द गार्डनर’। यानी उस लड़के के हाथ तक जो लफ्ज पहुंचे, वो रास्ते में दो जबानें पार कर चुके थे।
फिर भी पहुंच गए।
गुलजार कहते हैं कि उसी किताब को पढ़कर उन्होंने तय किया वो लिखेंगे।
और उन्होंने सिर्फ इतना नहीं किया।
उन्होंने ठाकुर को उनकी अपनी जबान में पढ़ने के लिए बांग्ला सीख ली।
एक पंजाबी लड़का, बंबई के एक गैरेज में, तीसरी भाषा सीख रहा था।
सिर्फ इसलिए कि तर्जुमे से उसका मन नहीं भरा।
उसे तब मालूम नहीं था कि वही बांग्ला उसकी पूरी जिंदगी के ताले खोलेगी।
पहला ताला।
एसोसिएशन की बैठकों में दोस्ती हुई शैलेंद्र से। और शैलेंद्र उन्हें बिमल रॉय तक ले गए।


बिमलदा ने पहला सवाल हिंदी में नहीं पूछा।
बांग्ला में पूछा, अपने सहायक से क्या यह लड़का वैष्णव पदावली समझकर लिख सकेगा?
सहायक ने कहा बिमलदा, गुलजार बांग्ला समझता है। बोलता भी है।
बिमलदा शर्मिंदा हो गए। पूछा बांग्ला कहां से सीखी?
लड़के ने कहा दोस्तों से। फिर खुद पढ़कर।
पूछा गया काबुलीवाला पढ़ी है?
जवाब हां। पहले उर्दू में। फिर अंग्रेजी में। फिर बांग्ला में।
फिल्म थी बंदिनी, 1963। बिमल रॉय की आखिरी फिल्म।
गाना उन्होंने पांच दिन में लिखा।
और सबसे अजीब बात यह है कि उन्होंने पहले मना कर दिया था। उन्हें गीतकार बनना ही नहीं था।
बिमल रॉय ने कहा तुम गैरेज में अपना वक्त बरबाद कर रहे हो।
और उन्हें अपना सहायक बना लिया।
पर उसी नौकरी की वजह से एक चीज हुई, जिसका जख्म उन्होंने कभी नहीं दिखाया।
दिल्ली में उनके पिता चल बसे।
घरवालों ने उन्हें खबर नहीं दी।
उनके अपने बड़े भाई बंबई में ही थे। उन्हें मालूम था। वो उसी दिन उड़ान भरकर दिल्ली चले गए।
छोटे भाई से एक शब्द नहीं कहा।
कुछ दिन बाद, दिल्ली के एक पड़ोसी ने खबर पहुंचाई।
वो उसी वक्त ट्रेन पकड़कर निकले। उन दिनों दिल्ली की सबसे तेज गाड़ी फ्रंटियर मेल थी।
वो भी चौबीस घंटे लेती थी।
चौबीस घंटे।
‘हाउसफुल’ नाम की किताब में उनका बयान दर्ज है जब तक मैं घर पहुंचा, सब कुछ खत्म हो चुका था।
जो बच्चा कभी स्टेशन पर खड़ा होकर अपने बाप की ट्रेन का इंतजार करता था, उसे उसी बाप तक पहुंचाने में एक ट्रेन ने चौबीस घंटे ले लिए।
और वो देर से पहुंचा।
जिस आदमी ने उसका लिखना रोका था, उसे कंधा देना भी उसके नसीब में नहीं आया।
फिर, पांच बरस बाद, वो हिसाब कहीं और चुकता हुआ।
बिमल रॉय को कैंसर हो गया।
गुलजार हर रात उनके सिरहाने बैठते थे।
और उन्हें वो पटकथा पढ़कर सुनाते थे, जो बिमलदा की सबसे प्यारी थी और जो कभी बन नहीं पाई। नाम अमृत कुंभ।
एक मरता हुआ आदमी।
और उसके सिरहाने बैठा एक नौजवान, जो उसे रोज वो कहानी सुनाता था, जो वो कभी परदे पर नहीं ला सका।
उनके शब्द हैं हर रात मैं रोता था, जैसे-जैसे कैंसर बिमलदा को थोड़ा-थोड़ा करके निगल रहा था।
7 जनवरी 1966। बिमल रॉय चले गए। छप्पन बरस के थे।
अगले दिन अंतिम संस्कार गुलजार ने किया।
और फिर उन्होंने जो एक वाक्य कहा, वो इस पूरी जिंदगी की चाबी है
उस दिन हमने बिमलदा का दाह-संस्कार किया।
और उनके साथ मैंने अपने पिता का भी कर दिया।
पांच बरस से अधूरा पड़ा एक काम, एक दूसरे आदमी की चिता पर पूरा हुआ।
और एक बाप उन्हें सरहद के उस पार से भी मिला।
रेख्ता के मुताबिक उनकी शुरुआती रचनाएं पाकिस्तान की पत्रिकाओं में छपीं। ‘फुनून’ के संपादक अहमद नदीम कासमी ने उस नए शायर को संवारा, राह दिखाई।
गुलजार उन्हें बाबा कहते थे।
जिस सरहद ने उनसे घर छीना, उसी सरहद के उस पार से उन्हें एक बाप मिल गया।
अब वो हिस्सा, जो सबसे कम कहा जाता है।
बिमल रॉय की एक फिल्म थी बेनजीर। उसी के सेट पर एक अभिनेत्री से उनका परिचय हुआ।
नाम मीना कुमारी।
देश उन्हें ट्रैजेडी क्वीन कहता था। पर उस औरत के भीतर एक शायरा बैठी थी, जिसे किसी ने कभी बाहर आने का रास्ता नहीं दिया।
गुलजार से मिलने के बाद उन्होंने लिखना शुरू किया। तखल्लुस रखा नाज।
1971 में उन्होंने अपनी ही नज्में अपनी आवाज में रिकॉर्ड कीं।
उसी बरस गुलजार ने अपनी पहली फिल्म बनाई मेरे अपने।
मीना कुमारी की तबीयत उन दिनों टूट चुकी थी। फिर भी उन्होंने वो फिल्म की। और पूरी की।
31 मार्च 1972। वो चली गईं। अड़तीस बरस की उम्र में।
और जाने से पहले उन्होंने अपनी सबसे कीमती चीज गुलजार को सौंप दी।
अपनी नज्में। अपनी डायरियां।
गुलजार ने उन्हें छापा। किताब का नाम रखा तनहा चांद।
उस किताब की भूमिका में उन्होंने अपने बारे में सिर्फ एक बात लिखी।
कि वो इनके मालिक नहीं, सिर्फ अमानतदार हैं।
और फिर वो लिखा, जो इस पूरी कहानी का आखिरी पत्ता है
कि शायर का हक अपनी नज्म पर सिर्फ तब तक है, जब तक उसने उसे कहा न हो।
कह देने के बाद नज्म पढ़ने वाले की हो जाती है।
जिस लड़के ने अपनी पहली किताब चुराई थी, उसने बड़ा होकर लिख दिया कि किताबें किसी की होती ही नहीं।
अब सांस लीजिए। आगे रोशनी है।
ठाकुर के लिए सीखी हुई वो बांग्ला दूसरा ताला भी खोल गई।
शारजाह के एक साहित्य मंच पर गुलजार ने खुद हंसते हुए बताया था बाद में वही जबान एक बंगाली लड़की को प्रेमपत्र लिखने के काम आई।
उस लड़की का नाम राखी था।
शादी 1973 में हुई। उसी दिसंबर में बेटी हुई। मेघना। घर में बोस्की।


और अगले ही बरस दोनों अलग हो गए।
तलाक कभी नहीं हुआ। बावन बरस हो गए।
गुलजार ने राखी को अपनी जिंदगी की सबसे लंबी छोटी कहानी कहा है।
पर जो घर टूटा, उसमें एक चीज नहीं टूटी।

मेघना ने अपने पिता पर जो किताब लिखी है ‘बिकॉज ही इज’ उसमें जो दर्ज है, वो किसी फिल्म से ज्यादा नरम है।
वो हर सुबह बेटी को स्कूल के लिए तैयार करते थे। फीते बांधते। बाल गूंथते, क्योंकि आया के गूंथे बाल बेटी को पसंद नहीं आते थे।
और दिन का काम शाम चार बजे बंद कर देते थे।
वजह?
बेटी का स्कूल चार बजे छूटता था।
इस मुल्क का सबसे व्यस्त लेखक अपनी घड़ी एक बच्ची के स्कूल की घंटी से मिलाकर चलता था।
हर जन्मदिन पर वो उसके लिए एक किताब लिखते थे। तेरह बरस की उम्र तक।


बांद्रा वाले घर का नाम भी उसी बेटी के नाम पर है। बोस्कियाना।
जिसे मां का चेहरा नहीं मिला, और जो अपने बाप के पास वक्त पर नहीं पहुंच सका उसने अपनी बेटी को वो सब दे दिया, जो उसे खुद कभी नहीं मिला।
कुछ लोग अपना बचपन दोबारा जीते नहीं।
अपने बच्चे को दे देते हैं।
फिर संगीत। और उस हिस्से में एक ही नाम सबसे ऊंचा है।

पंचम। आर.डी. बर्मन।
दोनों में जमीन-आसमान का फर्क था। एक ठहरा हुआ, चुप, गहरा। दूसरा बेचैन, शरारती, हमेशा किसी धुन में उलझा।
गुलजार की लाइनें बहर में नहीं आती थीं। पंचम को उन्हें बांधने में सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती थी।
एक दिन गुलजार ‘इजाजत’ के लिए एक गीत लेकर पहुंचे। बिना तुक का, बिना बहर का। चिट्ठी की तरह लिखा हुआ।
पंचम ने कागज फेंक दिया। बोले यह क्या है, टाइम्स ऑफ इंडिया?
गुलजार कोने में जाकर बैठ गए। चुपचाप।
और फिर आशा भोसले ने वो लाइनें अपने आप गुनगुनानी शुरू कर दीं।
बस उतना ही चाहिए था।
पंचम के भीतर धुन जाग गई। गीत पंद्रह मिनट में बन गया।
उस गीत पर गुलजार को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। और आशा भोसले को सर्वश्रेष्ठ गायिका का।
एक आदमी का सबसे बड़ा काम इसलिए बच गया, क्योंकि कमरे में बैठी एक औरत ने उसे गुनगुना दिया।
4 जनवरी 1994। पंचम चले गए। चौवन बरस के थे।
उसी बरस गुलजार ने एक एल्बम बनाया, जिसमें कोई नई फिल्म नहीं थी। सिर्फ पंचम की यादें थीं।
और उसमें रिकॉर्डिंग के दौरान की पंचम की असली आवाज के वो टुकड़े थे, जो गुलजार ने बरसों से अपने पास संभालकर रखे थे।
एक दोस्त ने दूसरे दोस्त की आवाज को मिट्टी में जाने से रोक लिया।
पर जिसे इतना मिला, उसने आगे बढ़ाना भी सीखा।
अस्सी के दशक के आखिर में एक नौजवान उनके पास आया। बिजनौर का लड़का, जो दिल्ली में छोटी महफिलों में हारमोनियम बजाता था।
नाम विशाल भारद्वाज।
दोनों ने मिलकर बच्चों के एक धारावाहिक का शीर्षक गीत बनाया। जंगल बुक।
वो विशाल का पहला कामयाब गाना था।
फिर गुलजार ने अपनी फिल्म ‘माचिस’ का संगीत उसी लड़के को दिया। वहीं से उसका करियर बना।
और फिर कहा अब तुम खुद निर्देशन करो।
विशाल भारद्वाज आज जो हैं, उस एक सलाह की वजह से हैं।
विशाल ने गुलजार के बारे में जो कहा, उससे बेहतर तारीफ मैंने आज तक नहीं पढ़ी
उन्होंने कहा कि गुलजार साहब दरअसल इस इंडस्ट्री के सबसे बुजुर्ग बच्चे हैं। उम्र ने उन्हें थकाया नहीं, इसीलिए वो बच्चों के लिए सबसे अच्छा लिखते हैं।
फिर सम्मान आते चले गए।
साहित्य अकादमी। पद्म भूषण। ‘जय हो’ के लिए ऑस्कर, फिर ग्रैमी। दादासाहेब फाल्के।
फिल्में उन्होंने खुद बनाईं मेरे अपने, परिचय, कोशिश, आंधी, मौसम, अंगूर, किताब, किनारा, इजाजत, लेकिन, माचिस।
आंधी को आपातकाल में रोक दिया गया था।
गालिब पर उन्होंने दूरदर्शन के लिए धारावाहिक बनाया।
फाल्के मिलने पर पूछा गया कि ऑस्कर के बाद यह क्या मायने रखता है।
उन्होंने कहा बाकी सब किसी एक गाने या फिल्म के लिए थे। यह पूरे काम के लिए है।
और फिर एक लाइन जोड़ी, जो कोई थका हुआ आदमी नहीं बोल सकता
अच्छा लगता है कि जब आप अब भी काम कर रहे हों, तभी कद्र हो जाए।
पर सबसे लंबा सफर उन्होंने 2013 में किया।
सत्तर साल बाद वो दीना लौटे।
डॉन को दिए इंटरव्यू में पूछा गया इतनी देर क्यों की?
उन्होंने कहा कि उनके जेहन में उस कस्बे की, उस गली की, उस घर की एक तस्वीर बसी हुई थी।
और उन्हें डर था कि जाकर देखने से वो तस्वीर मैली हो जाएगी।
एक आदमी अपने घर इसलिए नहीं जा रहा था, क्योंकि उसे अपनी याद के टूट जाने का डर था।
जब गए, तो गाड़ी में चुप बैठे रहे। दोस्त बातें करना चाहते थे। उन्होंने कहा मत बोलो।
वो सड़क किनारे लगे उर्दू के साइनबोर्ड पढ़ रहे थे। एक-एक करके।
उन्होंने कहा कि जिंदगी में उन्होंने कभी एक दिन में इतनी उर्दू नहीं पढ़ी थी।
फिर झेलम। फिर दीना स्टेशन।
स्टेशन बिल्कुल वैसा ही था। सत्तर बरस में सिर्फ एक छोटा कमरा नया बना था।
बगल में वही खुले खेत।
और वहीं खड़े-खड़े उन्हें वो बच्चा याद आया, जो सीटी सुनकर भागा चला आता था।
पुराना घर भी मिल गया। पर वो पिछला दरवाजा, जो खेतों में खुलता था, चिन दिया गया था।
और बचपन का एक भी आदमी वहां नहीं मिला।
अब समझिए कि यह इंसान इतना क्यों लिखता है।
अमेरिका के मनोवैज्ञानिक जेम्स पेनेबेकर ने अस्सी के दशक में एक प्रयोग किया। लोगों से कहा कि वो अपनी सबसे तकलीफदेह याद पर, लगातार कुछ दिन, रोज पंद्रह-बीस मिनट लिखें।
नतीजा चौंकाने वाला था। जिन्होंने लिखा, उनकी सेहत बेहतर हुई। डॉक्टर के पास जाना कम हुआ।
पेनेबेकर ने इसे नाम दिया एक्सप्रेसिव राइटिंग।
बात सीधी थी। जो दुख भीतर बंद रह जाता है, वो शरीर पर बोझ बनकर बैठ जाता है।
अब गुलजार का अपना वाक्य पढ़िए।
उन्होंने कहा कि बंटवारे पर वो बहुत दिनों तक लिख ही नहीं पाए।
पर आखिरकार लिखने के इसी अमल ने उन्हें संभाला, और थोड़ा जहर बाहर निकालने में मदद की।
पेनेबेकर ने जो प्रयोगशाला में साबित किया, गुलजार ने वो एक मेज पर जी लिया।
और उस मेज के बारे में उनका अपना बयान सबसे प्यारा है।
उन्होंने कहा कि वो एक बड़े मुनीम हैं, जो सुबह दस से शाम छह तक अपनी मेज पर बैठा रहता है। फर्क सिर्फ इतना कि मुनीम रुपये-पैसे का हिसाब लिखता है, और वो इंसान का।
फिर जो जोड़ा, उसमें पूरी उम्र समाई हुई है
और इंसान का हिसाब कभी बराबर नहीं बैठता।
ऊपर वाले से भी उनका रिश्ता वैसा ही टेढ़ा रहा।
वो उसे बड़े मियां कहकर बुलाते हैं। कहते हैं कि दोनों आंख-मिचौली खेल रहे हैं और उन्हें शक है कि छुपने वाला वही है।
अब वो चीज, जो इस पूरी कहानी का दायरा बंद कर देती है।
2016 में उन्होंने वही किताब दोबारा उठाई, जिसने उन्हें लेखक बनाया था।
इस बार कोई बिचौलिया नहीं। सीधे बांग्ला मूल से।
नाम रखा बागबान। और किताब में बांग्ला, ठाकुर की अपनी अंग्रेजी, और अपनी हिंदी तीनों साथ छापीं।
और फिर वो बात, जो मुझे इस पूरी रिसर्च में सबसे आखिर में मिली।
दिसंबर 2018। कोलकाता। जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी।


ठाकुर परिवार का वही घर, जहां रवींद्रनाथ पैदा हुए, और जहां उन्होंने आखिरी सांस ली।
वहां उस परिवार पर एक लाइट-एंड-साउंड शो चलता है। उस साल उसका हिंदी संस्करण शुरू हुआ।
उद्घाटन गुलजार ने किया।
और स्क्रिप्ट भी गुलजार ने ही लिखी।
यह मैं अंदाजे से नहीं लिख रहा रबींद्र भारती विश्वविद्यालय की अपनी सालाना रिपोर्ट में यह दर्ज है।
अब पूरी बात एक साथ रखिए।
एक लड़का, जिसे किसी ने ठाकुर की एक तर्जुमे वाली किताब थमा दी थी।
उसने उस किताब की खातिर बांग्ला सीखी।
उसी बांग्ला ने उसे बिमल रॉय तक पहुंचाया।
उसी बांग्ला से उसने अपने प्रेमपत्र लिखे।
सत्तर साल बाद उसने वही किताब खुद तर्जुमा की।
और फिर वो ठाकुर के अपने घर में खड़ा होकर, उस घर की कहानी, अपनी जबान में, पूरे हिंदुस्तान को सुना रहा था।
एक चुराई हुई किताब का कर्ज किसी ने इससे बड़ा कभी नहीं चुकाया।
अब आखिरी हिस्सा।
2024 में उन्हें ज्ञानपीठ मिला। देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान।
16 मई 2025 को दिल्ली के विज्ञान भवन में समारोह हुआ।
गुलजार नहीं जा सके। तबीयत।
तो 22 मई को भारतीय ज्ञानपीठ के लोग खुद बांद्रा वाले घर पहुंचे, और वो सम्मान उनके हाथ में रख दिया।
कमरे में जो लोग खड़े थे, उनमें विशाल भारद्वाज और रेखा भारद्वाज भी थे।
वही लड़का, जिसे उन्होंने बच्चों के एक गाने से उठाकर खड़ा किया था।
सत्तर बरस पहले एक बच्चे के पास किताब खरीदने के पैसे नहीं थे।
और उस दिन देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान चलकर उसके दरवाजे तक आया।
क्योंकि वो चलकर उस तक नहीं जा सका।
और इसी बरस, अप्रैल में, आशा भोसले भी चली गईं। बयानवे की उम्र में।
वही आवाज, जिसने कोने में चुप बैठे एक शायर का गीत गुनगुनाकर बचा लिया था।
बिमलदा। मीना कुमारी। पंचम। भूपिंदर। लता। और अब आशा।
गुलजार साहब उन सबसे आगे निकल आए हैं।
उस मेज के आसपास अब बहुत खामोशी होगी।
पर वो अब भी वहीं बैठते हैं।
कुछ बरस पहले उन्होंने एक काम पूरा किया, जिसे पढ़कर सांस रुकती है। चौंतीस भाषाओं के दो सौ उन्यासी कवियों की तीन सौ पैंसठ कविताएं। साल के हर दिन के लिए एक। सब उन्होंने खुद चुनीं, खुद उतारीं।
नौ बरस लगे।
नौ बरस, उस उम्र में जब लोग अपनी किताबें अलमारी में बंद करके चाबी रख देते हैं।
और इसी साल मार्च में, इक्यानवे की उम्र में, वो इस बात पर बोल रहे थे कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जमाने में कविता क्यों जरूरी है।
अब मेरी बात।
मैं अठारह साल से खबर लिख रहा हूं। इस शहर के एक दफ्तर में मेरा काम है, दूसरों के लिखे को दुरुस्त करना।
और मैं आपसे बिल्कुल ईमानदारी से एक बात कहूं।
मैं गुलजार साहब की तरह नहीं लिख सकता। बीस फीसदी भी नहीं।
कोशिश बरसों से कर रहा हूं।
पर जब भी कोई खबर मेरे सामने आती है, और मुझे लगता है कि इसके नीचे कहीं एक इंसान दबा हुआ है तो जो आदत मुझे उस इंसान तक खींचकर ले जाती है, वो मैंने उन्हीं से चुराई है।
और उन्होंने ही लिख रखा है कि लफ्ज पढ़ने वाले के हो जाते हैं।
तो शायद यह चोरी नहीं है।
शायद यह अमानत है।
जोड़ासांको भी यहीं है। इसी शहर में।
और मुझे यह इस हफ्ते पता चला कि उस घर की कहानी हिंदी में जिन लफ्जों में सुनाई जाती है, वो एक ऐसे आदमी के लिखे हुए हैं, जिसका अपना घर सरहद के उस पार छूट गया था।
हम अपने ही शहर के बारे में कितना कम जानते हैं।
तीन बातें, जो मैं इस पूरी रिसर्च से निकालकर अपनी डायरी में लिख रहा हूं।
एक। जिसने आपको रोका, जरूरी नहीं कि वो आपका दुश्मन हो। कभी-कभी वो सिर्फ एक डरा हुआ बाप होता है। नाम बदल लीजिए। रास्ता मत बदलिए।
दो। जो दुख आप किसी से नहीं कह सकते, उसे कागज पर लिख दीजिए। यह भावुकता नहीं, प्रयोगशाला में जांची हुई बात है। भीतर बंद रह गया दुख शरीर पर बैठ जाता है।
तीन। कुछ हिसाब अपनी जगह पर कभी बराबर नहीं होते। पर कहीं और, किसी और के लिए, चुका जरूर दिए जाते हैं। जो आप अपने बाप को नहीं दे पाए, वो किसी और बुजुर्ग को दे दीजिए। हिसाब वहीं पूरा हो जाएगा।
इन तीन लाइनों के लिए इस पोस्ट को Save कर लीजिए। जिस दिन लगे कि जिंदगी ने आपसे कुछ ऐसा छीन लिया है जो अब लौटेगा नहीं, इन्हें दोबारा पढ़ लीजिएगा।
यह कहानी सिर्फ एक शायर की नहीं है। यह हर उस इंसान की है, जिसका घर पीछे छूट गया, और जिसने कहीं और जड़ पकड़ ली। अगर आपकी वॉल पर इसे पढ़कर आज किसी एक इंसान ने वो काम दोबारा शुरू कर लिया, जो उसे बरसों पहले छोड़ना पड़ा था तो शेयर करना वसूल हो जाएगा।
मैं राहुल हूं। मैं उन कहानियों के पीछे जाता हूं जो शोर में नहीं, चुप्पी में रहती हैं। यह सिलसिला आपको अपना लगे, तो साथ चलिए।
और मुझे एक बात बताइए।
कोई एक काम, जो आपने किसी के मना करने के बावजूद किया।
और आज वही आपकी पहचान है।
आज उसका नाम यहां लिख दीजिए। मैं एक-एक पढ़ूंगा।

राहुल मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार

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