मंदिर-मस्जिद से आगे, शिक्षा तक कब पहुँचेगी सरकार?

कभी आदेश बाहर से आता था, अब कई बार भीतर से उठता है। कभी कोई सत्ता हमारी सीमाएँ तय करती थी, अब अनेक बार हमारी इच्छाएँ, भय और पूर्वाग्रह स्वयं हमारे चारों ओर दीवारें खड़ी कर देते हैं।

मंदिर-मस्जिद से आगे, शिक्षा तक कब पहुँचेगी सरकार?

रत्ना भदौरिया

 

किसी देश की असली तस्वीर उसके मंदिरों के शिखरों, मस्जिदों के गुम्बदों या धर्म के नाम पर उठते नारों में नहीं, बल्कि उसकी कक्षाओं में बैठी आँखों में दिखाई देती है। उन आँखों में यदि भविष्य का उजाला है तो राष्ट्र सचमुच आगे बढ़ रहा है; और यदि फीस की पर्ची देखकर वही आँखें झुक जाती हैं, तो विकास के तमाम दावे केवल चमकदार पोस्टर हैं।

आज शिक्षा केवल महँगी नहीं हुई है, वह धीरे-धीरे गरीब की पहुँच से बाहर होती जा रही है। एक मजदूर, किसान, छोटे कर्मचारी या निम्न-मध्यवर्गीय परिवार का बच्चा जब बारहवीं के बाद स्नातक की दहलीज पर पहुँचता है, तो उसके सामने ज्ञान का द्वार नहीं, फीस का पहाड़ खड़ा दिखाई देता है। किताबें, प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क, यात्रा, छात्रावास और दूसरी आवश्यकताओं का बोझ मिलकर उस सपने को कुचल देता है, जिसे वर्षों तक परिवार ने अपनी भूख काटकर सींचा होता है।

विडम्बना देखिए—हम ऐसी राजनीति पर घंटों बहस कर सकते हैं जिसमें धर्म के नाम पर भावनाएँ भड़कती हैं, मंदिर-मस्जिद पर बयानबाजी होती है, लेकिन शिक्षा की बढ़ती कीमत पर राष्ट्रीय बहस अक्सर कहीं पीछे छूट जाती है। प्रश्न यह नहीं कि मंदिर किसका है या मस्जिद किसकी; प्रश्न यह है कि स्कूल और विश्वविद्यालय किसके लिए हैं?

क्या शिक्षा केवल उन बच्चों के लिए रह जाएगी जिनके माता-पिता मोटी फीस भर सकते हैं?

क्या प्रतिभा की कीमत अब परिवार की आर्थिक हैसियत तय करेगी?

क्या किसी गरीब बच्चे का सबसे बड़ा अपराध यही है कि उसका जन्म एक ऐसे घर में हुआ जहाँ फीस भरने से पहले रसोई का हिसाब देखना पड़ता है?

सरकारें शिक्षा को अधिकार, अवसर और राष्ट्र-निर्माण का आधार कहती रही हैं, लेकिन यदि उसी शिक्षा तक पहुँचने के रास्ते पर आर्थिक अवरोध खड़े होते जाएँ तो ये शब्द कितने खोखले लगते हैं। शिक्षा वह सीढ़ी होनी चाहिए जो गरीब बच्चे को ऊपर उठाए, न कि वह दीवार जिसे देखकर वह अपने सपनों से समझौता कर ले।

सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कोई दान नहीं है। यह सरकार की कृपा भी नहीं है। यह उस नागरिक का अधिकार है जो अपने श्रम, अपने कर और अपने विश्वास से राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को चलाता है। जिस देश को कुशल डॉक्टर, शिक्षक, वैज्ञानिक, इंजीनियर, शोधकर्ता और संवेदनशील नागरिक चाहिए, उसे उनकी शिक्षा को बाजार की बोली पर नहीं छोड़ना चाहिए।

विडम्बना यह भी है कि शिक्षा पर खर्च को अक्सर बोझ की तरह देखा जाता है, जबकि अशिक्षा और बेरोजगारी की सामाजिक कीमत कहीं अधिक होती है। एक गरीब बच्चे को विश्वविद्यालय तक पहुँचने से रोकना केवल एक व्यक्ति के भविष्य को रोकना नहीं; यह समाज की संभावित प्रतिभा को अँधेरे में धकेलना है।

सरकार को यह तय करना होगा कि उसकी प्राथमिकताओं में नागरिक का भविष्य कहाँ खड़ा है। यदि चुनावी मंचों पर धर्म के प्रश्न के लिए अनंत समय है, तो संसद और नीति-निर्माण की मेज पर शिक्षा के लिए भी उतनी ही बेचैनी क्यों नहीं दिखाई देती?

मंदिर बनेंगे, मस्जिदें रहेंगी, धर्म अपनी जगह रहेगा—लेकिन राष्ट्र की अगली पीढ़ी का भविष्य किस जगह रहेगा?

जिस दिन सरकारें इस प्रश्न से सचमुच टकराएँगी, उस दिन शिक्षा बजट की एक संख्या नहीं, राष्ट्र के भविष्य का आईना बनेगी।

अब सवाल मंदिर-मस्जिद का नहीं है। सवाल यह है कि गरीब के बच्चे की किताब कब सरकार की प्राथमिकता बनेगी?

धर्म के नाम पर जागने वाला देश शिक्षा के नाम पर कब जागेगा?

 

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

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