व्यंग्य
फासीवाद
रणबीर सिंह दहिया
एक बर मनै एक सेमिनार मैं जावण का मौका मिलग्या। मनै सोच्ची अक ले तूं भी ले चाल किमै ज्ञान की बात, चालकै गाम मैं बताइये भाइयां ताहिं। उड़ै बात होवण लागरी साम्राज्यवाद पै, पूंजीवाद पै, सामन्तवाद पै अर फासीवाद पै। कई बोलणियां आये अर अपणी बात अंग्रेजी मैं कै टूटी फूटी हिन्दी मैं कैहकै चाले गए।
मेरै आधी अक बात पल्लै पड़ी अर कई बात कानां पर कै बी गई। खड़या होकै कुछ बूझल्यूं इसकी हिम्मत नहीं पड़ी। फेर एक बात जरूर समझ मैं आगी अक इन वादयां के बारे मैं बेरा पाड़े बिना ईब म्हारा काम कोण्या चालै। दो तीन दिन बहोत बेचैन रह्या। मेरे यार दोस्त भी मेरे बरगे क्लीन स्लेट थे इस मामले मैं। अपणे कालेज के टीचरां तै बूझण की कोशिश करी तो उननै न्यों कैंहके धमका दिया अक घणा आण्डी मतना पाकै ईबै तै राजनीति मतना करै पढ़ले। आच्छी ढालां, पहलम अपणा कैरियर बणा ले फेर इन हरफा की पूछड़ ठा ठाकै देखें जाइये।
मेरै और बिश्वास होग्या अक इनके बारे मैं जानना तो और भी जरूरी होग्या। यो टीचर आप तै राजनीति मैं बड़या रहै सै अर हमनै दूर राखणा चाहवै सै।
लायब्रेरी मैं चाल्या गया। उड़ै किताबा मैं माथा मारया। कई किताब देखी पर उड़ै इन हरफां के दर्शन कोन्या होकै दिये। आच्छा साका हुया। मेरा इसा हाल होग्या अक जणूं तै मनै बावली गादड़ी के कान पाकड़ लिये हों – छोडडूं तो मरग्या अर ना छोडडूं तो ऊं पसीने आ लिये। मेरा इसा हाल होग्या अक बस के बताऊं। उठते बैठते, सोते-जागते मेरे दिमाग मैं फासीवाद, साम्राज्यवाद, पूंजीवाद,सामन्तवाद के हथौड़े से लागण लागगे।
मैं एक अपणे पड़ौस मैं कांग्रेसी नेता धोरै गया अर उसपै बूझया इनका मतलब तै ओ हंसकै टालग्या। मेरै बी जिद्द होगी अक बेरा जरूर पाड़णा सै इनके मतलब का। चौटाला का भगत सै मेरा एक स्साला मैं उसके धोरै गया। ओ तै जमा कोरा काल्लर पाया। न्यो बोल्या मनै तो पहली बार सुणे सैं ये शब्द। हां ताऊ देवीलाल पहलम पूंजीवाद अर पूंजीपतियां का जरूर जिकरा करया करता अर इननै गाल बकया करता। इननै बहोतै भूंडे बताया करता। पर इसका मतलब कदे खोल कै उसनै बी नहीं बताया म्हारे ताहिं। अर बाद मैं तै ताऊ की यारी दोस्ती होगी थी उनकी गेल्यां तो फेर तो इसका मतलब क्यांनै बतावै था।
मैं माथा पाकड़ कै बैठग्या। यो नेता माड़ा सा स्याणा दीखै था मनै पर यो बी निरा धौल कपड़िया पाया। कांग्रेसी बूझ कै देख लिए, इनेलो आले झाड़ पिछोड़ लिये तो मनै सोच्ची अक ईब कित जाऊं? मैं एक बीजेपी आला रहवै सै म्हारे पड़ोस मैं उसके घरां चाल्या गया। चा बणवा ली अर बात सुरू होगी। भाई नै तो अपणा रिकाट चढ़ा दिया अटल का। अटल जी न्यूं, अर अटल जी न्यूं, आध घन्टे ताहिं सांसै कोन्या लेकै दिया बन्धु नै।
फेर बोल्या हां तो बन्धु बताओ कैसे आये? मेरे जी मैं जी आया अर मनै बूझया अक मैं इन चार हरफां का सताया औड़ हांडण लागरया सूं – साम्राज्यवाद, पूंजीवाद, सामन्तवाद, अर फासीवाद। इनका मतलब मनै खोल कै समझाद्यो बंधू जी। अरै मेरे कान्ही इसे ढालां लखाया ज्यूकर कसाई बकरे कान्ही देख्या करै। फेर बोल्या ये म्हारी संस्कृति के सब्द कोन्या। संस्कृत मैं अर म्हारे पुराण ग्रन्थों मैं इन हरफां का कितै जिकराए कोण्या। ये सब तै कोरे बदेसी सबद सैं बन्धु इनके चक्करां मैं मतना पड़ै। भूलज्या इन हरफां नै अर फेर भूल के बी याद मतना करिये। मैं अपणा सा मुंह लेकै आग्या।
सोच्चण लाग्या अक मामला तो घणा गड़बड़ सै। पूरे हरियाणा मैं इतने पढ़े लिखे माणस, हरियाणा इतनी तरक्की करग्या अर इन चार हरफां का मतलब साफ-साफ खोल कै बतावणिया कोए नहीं पा लिया। बताइयो कोये तमनै बेरा होतै जो मनै इनका मतलब समझा सकै।
2006
