जन्मदिन पर विशेष
कविता
बस, मैं रह जाऊँ
नीलाभ अश्क
भागे जा रहे हैं लोग
गठरियाँ उठाए, जेब में रखे पैसों,
परिचय-पत्रों और प्रतिभूतियों को सँभालते,
नाक की सीध में देखते,
अपने-अपने कम्प्यूटरों पर
लगाते हुए आने वाली दुनिया का हिसाब
अजीब हड़बड़ है
किसी को होश नहीं है दूसरे का
ज़रा-सी रुकावट पड़ते ही कुहनियों से
ठेला-ठाली शुरू हो जाती है
चिंता बस इतनी है कि पार हो जाएँ किसी तरह
बीसवीं सदी की वैतरणी जो पीछे छूट जाएँ
दहेज और दौलत और दमन की बलि-वेदी पर
तो उनका भाग्य
सुहृद सहयात्रियो,
क्या ऐसा नहीं हो सकता
चली जाए इक्कीसवीं सदी में सारी दुनिया
गाती-बजाती, शोर मचाती, एक-दूसरे पर गिरती-पड़ती
बस, मैं रह जाऊँ अपनी इस बेचारी, बेग़ैरत, बेरहम,
बीसवीं सदी में।
