लघुकथा
क्रोध : दुश्मन या संकेत?
डॉ रीटा अरोड़ा
“गुरुदेव, मुझे बहुत क्रोध आता है। मैं इसे खत्म करना चाहता हूँ।”
गुरु मुस्कुराए, “क्रोध को खत्म क्यों करना चाहते हो?”
“क्योंकि क्रोध बुरा है। क्रोध में इंसान अपना विवेक खो देता है।”
गुरु ने पूछा, “अगर कोई तुम्हारे साथ अन्याय करे और तुम्हें क्रोध न आए, तो क्या तुम उसे अन्याय मानकर भी चुप रहोगे?”
शिष्य कुछ देर सोचकर बोला, “शायद नहीं।”
“तो फिर क्रोध हमेशा बुरा कैसे हुआ?” गुरु ने कहा, “कभी-कभी वह भीतर की घंटी है, जो बताती है कि कुछ गलत हो रहा है।”
“लेकिन गुरुदेव, क्रोध में मैं बहुत कुछ कह जाता हूँ, जिसका बाद में पछतावा होता है।”
गुरु ने पूछा, “और जब तुम उस क्रोध को व्यक्त नहीं कर पाते?”
“तब मैं चुप हो जाता हूँ। लेकिन मन में वही बात बार-बार चलती रहती है।”
गुरु ने पूछा, “फिर उस दबे हुए क्रोध का क्या होता है?”
“कभी-कभी छोटी-सी बात भी बहुत बड़ी लगने लगती है और मैं फिर से भड़क उठता हूँ।”
गुरु ने शांत स्वर में कहा, “क्रोध को दबाना और उसे साधना एक बात नहीं। दबाया हुआ क्रोध भीतर जमा होता है; समझा हुआ क्रोध दिशा दे सकता है।”
शिष्य ने पूछा, “तो अगली बार क्रोध आए तो मैं क्या करूँ?”
गुरु ने कहा, “पहले यह देखना कि क्रोध तुम्हारे भीतर उठ रहा है… या तुम स्वयं क्रोध बन गए हो?”
शिष्य कुछ देर मौन रहा। फिर उसने गुरु की ओर देखा। उसके चेहरे पर अब पहले जैसी बेचैनी नहीं थी। शायद पहली बार वह अपने क्रोध से लड़ने के बजाय उसे समझने की ओर देख रहा था।
और शायद सवाल यह नहीं था कि *क्रोध को कैसे खत्म किया जाए, बल्कि यह कि उसके उठने पर हम स्वयं को कितना देख पाते हैं?*
डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
