जसवीर त्यागी की कविताएं
बेरोज़गार प्रेमी
बेरोज़गार प्रेमी से
प्रेमिका ने रोते हुए कहा
मुझे तन पर दो कपड़े
और दो वक़्त की रोटी चाहिए
इसके अलावा
कुछ नहीं मांगूंगी तुमसे
बनकर रहूँगी सदा तुम्हारी छाया
प्रेमी के मुँह से
न फूटता था एक भी शब्द
उसे देख लगता था
मानो मिला हो किसी देवता का शाप
बोलते ही उसके
प्रेमिका हो जाएगी
पत्थर की प्रतिमा में तब्दील
अपने-अपने डर के किलों में कैद थे
दोनों प्रेमी।
÷÷÷÷
नौकरी
तुम नौकरी
कभी भी छोड़ सकते हो
लेकिन तुम नौकरी
कभी भी पकड़ नहीं सकते।
—————
बेरोज़गार लड़का
रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप
बेरोज़गार लड़का निकल पड़ा है घर से
रोज़गार की तलाश में
लड़का कई जगहों पर जाकर
सवाल-जवाब करेगा
और एक द्वार खुलने की आश लिए
कई द्वार खटखटाएगा
इस तरह खाली पेट
पीकर दो-चार कड़वे अनुभवों के घूँट
लौट आएगा रीते हाथ शाम को घर
लड़का इस बात से अनभिज्ञ है
कि रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप
उसके घर से निकलने के बाद
किसी ने बजाई होगी मन्दिर की घण्टी
फैला दी होगी अगरबत्ती की महक चारों ओर
चमचमा उठी होगी दीये की लौ
हाथ जोड़े कोई खड़ा होगा ध्यानमग्न
शीश झुका दिया होगा किसी ने आराध्य के चरणों में
और आँखों की कोरों से चुपचाप
ढुलक गये होंगे कुछ आँसू चढ़ावे के रूप में
रोज़मर्रा की दिनचर्या के अनुरूप।
■
वे आसमान के सितारे हैं
——————————
सरकार को,नेता को
अपने-अपने क्षेत्र के
भूखे,बेघर,गरीब लोगों के लिए
रहने-जीने की व्यवस्था करनी चाहिए
निर्धन,बेघर,बेरोजगार मजदूर
सिर्फ़ वोट बैंक नहीं है
वे भी हमारी-तुम्हारी तरह
जीते-जागते इंसान हैं
वे जीवन संघर्ष और
चुनौतियों की चट्टानी पहचान हैं
उनके ख़ून पसीने से ही
जिन्दगी के अंधेरे हारे हैं
उनके बलबूते ही
दुनिया के चमत्कार सारे हैं
वे भी इंसानियत के आसमान के
चमकते सितारे हैं
वे भी किसी की आँख के तारे हैं।
■
