अस्पताल की चौखट पर खड़ा नागरिक और आयुष्मान के पाँच लाख का सवाल

अस्पताल की चौखट पर खड़ा नागरिक और आयुष्मान के पाँच लाख का सवाल

रत्ना भदौरिया

हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबनाओं में एक यह है कि बीमारी मनुष्य के शरीर में पैदा होती है, लेकिन उसका सबसे गहरा आघात अक्सर उसकी आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। एक गंभीर बीमारी केवल शरीर को नहीं तोड़ती; वह परिवार की वर्षों की बचत, बच्चों की पढ़ाई, भविष्य की योजनाएँ और कभी-कभी पूरी सामाजिक प्रतिष्ठा तक को गिरवी रख देती है। ऐसे समय में जब सत्ता स्वास्थ्य सुरक्षा की योजनाओं को अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है, तब यह पूछना और भी आवश्यक हो जाता है कि इन योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता अस्पताल की चमकदार घोषणाओं से बाहर निकलकर उस परिवार के जीवन में कितनी उतरती है, जो इलाज के लिए दर-दर भटक रहा है।
आयुष्मान जैसी स्वास्थ्य बीमा योजना ने निश्चित रूप से बड़ी संख्या में लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे में लाने का प्रयास किया है। गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सहायता का विचार अपने आप में महत्वपूर्ण है। लेकिन किसी भी योजना की आलोचनात्मक समीक्षा उसका विरोध नहीं होती; बल्कि यह सुनिश्चित करने का लोकतांत्रिक तरीका है कि योजना कागज पर जितनी प्रभावशाली दिखाई देती है, जमीन पर भी उतनी ही प्रभावी हो।
यहीं से पाँच लाख रुपये की कवरेज सीमा को लेकर गंभीर प्रश्न सामने आते हैं।
सत्ता के भाषणों में पाँच लाख की राशि एक बड़ी संख्या दिखाई देती है, लेकिन निजी स्वास्थ्य व्यवस्था की वास्तविकता में यह राशि कितनी देर तक साथ देती है, यह उस व्यक्ति से पूछा जाना चाहिए जो हृदय रोग, कैंसर, जटिल सर्जरी या किसी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए निजी अस्पताल के बिलिंग काउंटर पर खड़ा है। गंभीर उपचार में अस्पताल का खर्च केवल ऑपरेशन तक सीमित नहीं होता। जाँच, डॉक्टर की फीस, ICU, उपकरण, अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि, सर्जरी, संक्रमण या अन्य जटिलताओं का उपचार—इन सबका खर्च अलग-अलग जुड़ता जाता है। कई बार उपचार की वास्तविक लागत निर्धारित कवरेज सीमा से कहीं आगे निकल जाती है।
यहीं सरकारी दावे और नागरिक की वास्तविकता के बीच एक गहरी खाई दिखाई देती है।
किसी योजना का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसमें कितनी राशि का बीमा उपलब्ध है। असली प्रश्न यह है कि वह राशि वास्तविक उपचार लागत के अनुपात में कितनी पर्याप्त है। यदि किसी परिवार को गंभीर बीमारी के इलाज के बीच अपनी जेब से लगातार पैसा लगाना पड़े, तो फिर स्वास्थ्य सुरक्षा का अर्थ सीमित हो जाता है।
और समस्या अस्पताल में भर्ती होने के बाद खत्म नहीं होती। असल संकट कई बार मरीज के घर लौटने के बाद शुरू होता है।
हृदय रोगों से लेकर कई अन्य गंभीर बीमारियों में उपचार के बाद भी लंबे समय तक दवाइयाँ चलती हैं। नियमित जाँच, चिकित्सकीय परामर्श और दवाओं का खर्च परिवार के मासिक बजट का स्थायी हिस्सा बन सकता है। बीमा योजना यदि मुख्यतः अस्पताल में भर्ती होने की लागत को संबोधित करती है, लेकिन दीर्घकालिक दवाइयों और उपचार की आर्थिक वास्तविकता को पर्याप्त रूप से नहीं देखती, तो स्वास्थ्य सुरक्षा अधूरी रह जाती है।
यहाँ मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न और भी गंभीर है।
मानसिक बीमारी का संकट यह है कि वह अक्सर दिखाई नहीं देती। समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पहले से ही अनेक भ्रांतियाँ और कलंक मौजूद हैं। ऐसे मरीजों को लंबे समय तक चिकित्सकीय निगरानी और दवाओं की आवश्यकता हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति महीनों या वर्षों तक दवा पर निर्भर है, तो उसके लिए स्वास्थ्य सुरक्षा का अर्थ केवल अस्पताल में भर्ती होने के अवसर तक सीमित नहीं हो सकता। उसे निरंतर उपचार, दवाइयों और चिकित्सकीय परामर्श की आवश्यकता होती है।
इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को स्वास्थ्य नीति के हाशिए पर रखकर कोई भी व्यापक स्वास्थ्य सुरक्षा पूरी नहीं मानी जा सकती।
यहाँ एक बड़ा प्रश्न हमारी पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ता है। क्या स्वास्थ्य को हम अभी भी नागरिक अधिकार की तरह देखते हैं या धीरे-धीरे उसे बाजार की वस्तु में बदलते जा रहे हैं?
निजी अस्पताल आधुनिक चिकित्सा की अनेक महत्वपूर्ण सुविधाएँ उपलब्ध कराते हैं। विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक उपकरण, जटिल सर्जरी और आपातकालीन सेवाएँ अनेक मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित होती हैं। लेकिन दूसरी ओर निजी स्वास्थ्य क्षेत्र में उपचार की बढ़ती लागत आम नागरिक के लिए गंभीर चिंता का विषय है। जब स्वास्थ्य का बाजार तेजी से महँगा होता जाता है और सरकारी सुरक्षा की सीमा वहीं बनी रहती है, तब दोनों के बीच का अंतर अंततः मरीज की जेब को भरना पड़ता है।
यही वह जगह है जहाँ बीमारी आर्थिक असमानता का सबसे क्रूर चेहरा दिखाती है।
जिस परिवार के पास पैसा है, वह अतिरिक्त खर्च कर सकता है। जिसके पास बचत है, वह कुछ समय तक संकट संभाल सकता है। जिसके पास जमीन या गहने हैं, वह उन्हें बेच सकता है। लेकिन जिसके पास इनमें से कुछ भी नहीं है, उसके सामने कर्ज, उधार और उपचार छोड़ देने जैसे विकल्प बचते हैं। इसलिए गंभीर बीमारी भारत में केवल स्वास्थ्य संकट नहीं है; वह सामाजिक और आर्थिक संकट भी है।
हमें यह पूछना चाहिए कि क्या स्वास्थ्य योजना की सफलता इस बात से मापी जानी चाहिए कि कितने लोगों को कार्ड दिए गए, या इस बात से कि कितने परिवार गंभीर बीमारी के बाद भी आर्थिक रूप से सुरक्षित रहे?
किसी गरीब परिवार को कार्ड देना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि उस कार्ड के बावजूद उसे इलाज के लिए अपनी जमीन न बेचनी पड़े, बच्चों की पढ़ाई न रोकनी पड़े, वर्षों तक कर्ज न चुकाना पड़े और दवाइयों के अभाव में उपचार न छोड़ना पड़े।

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *