स्व शोध या सहूलियत

स्व शोध या सहूलियत

मंजुल भारद्वाज

 

हम क्या वाकई स्व शोध करते हैं ? या वो स्व शोध के नाम पर अपनी सहूलियत ढूंढते हैं। सहूलियत के पड़ाव बदलते रहते हैं जिसे हम स्व शोध कहते रहते हैं।

मनुष्य अपने स्व भाव के अनुसार अपने स्व भाव वालों को खोजता है। अपनी पसंद अनुसार अपने दोस्त ढूंढता है। खान पान, पसंद नापसंद, आदतें सब अपने स्व भाव अनुसार। मतलब हम अपने आप को दूसरों में ढूंढते हैं और जब आप दूसरे में दिखना बंद हो जाते हो तब उस व्यक्ति से आप दूर होने लगते हो ।

अपने बचपन से देख लीजिए। कौनसा खेल , कौनसी किताब, कौनसा सीरियल,कौनसा खाना,कौनसा फ़ल सब अपनी पसंद से होता है। फ़िर इस पसंद को घर आगे बढ़ाता है, स्कूल आगे बढ़ाता है। शरीर आगे बढ़ाता है।

वयस्क होने के बाद तुम्हें जो पसंद है वाले दोस्त मिलते हैं। या आप बनाते हो या परंपरा, कुंडली, रीति रिवाज़,ऐसे दोस्त बना देती हैं। जहां ना आप घर के रहते हो या घाट के।

एक समय बाद हम अपनी विशेषता खोजते हैं। विशेषता या विशिष्टता इस फ़र्क हमें पता ही नहीं होता । सहूलियत हमें दिशा दिखाती हैं और उसका एक ही ध्येय होता है पाना वो भी भौतिक उपलब्धि…..

भौतिक उपलब्धियों की खोज को हम स्व शोध कहते हैं। क्या भौतिक उपलब्धियों को पाना ही स्व शोध है। व्यक्ति अपने जैसा समूह,समाज या पार्टी बनाते हैं। धर्म स्थापित करते हैं। भगवान को जन्म दे देते हैं। पर क्या उन आदर्शों पर चलते हैं?

उत्तर है नहीं ! वो यह सब अपनी सहूलियतों के अनुसार करते हैं। स्व शोध के नाम पर सहूलियत खोजी जा रही है।

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