जसवीर त्यागी की पेड़ का गिरना और अन्य कविताएं
पेड़ का गिरना

महानगर की सड़क पर बीचोबीच
एक पेड़ टूटकर गिरा है
आने-जाने वालों का रास्ता अवरुद्ध है
अधिकांश लोग पेड़ को कम
रुके रास्ते को गौर से देखते हैं
मन ही मन कुछ बुदबुदाते हुए
बगल से निकल जाते हैं
पेड़ की पीड़ा को नहीं समझते लोग
मैं गिरे पेड़ के पास जाकर
उसे सहलाना चाहता हूँ
स्नेह-संवाद करना चाहता हूँ
हौसले की हुंकार से जोश भरना चाहता हूँ
कि तुम कोई जहाज नहीं
जो एक बार गिर कर उठ न सको
पेड़ हो तुम
प्रेम-प्रेरणा से पल्लवित है तुम्हारा रोम-रोम
मिट्टी में मिले नहीं हो
मिट्टी से जन्मे हो तुम
उठो तुम्हारे साथ उठेंगी
अनंत धूप-छाया की छवियाँ
तुम्हारे उठने से बचेंगे मासूम पंछियों के घर-घोंसले
तुम्हारी हिम्मत की शाखों पर बसते हैं अनेक स्वप्न
तुम लहराओगे
अलग-बगल के पेड़ भी गायेंगे
जैसे हवाओं की ताल पर गाते हैं
पुलकित पात साथ-साथ।
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अमर प्रेम
पिता को गए
बीस बरस से ऊपर हो गए
उनके स्नेह की स्मृति
मेरे साथ-साथ चलती है
पड़ोस में
एक बुज़ुर्ग आदमी के खाँसने का लहज़ा
मेरे पिता के खांसने से मिलता है
देर-सबेर
वह बुज़ुर्ग आदमी जब खाँसता है
उसकी आवाज़ सुनकर
एक अजीब-सी बैचेनी
मेरे सिर पर सवार हो जाती है
उस आदमी की खाँसी
जब बंद रहती है
तसल्ली की एक तरलता
मेरे भीतर नमी की तरह रहती है।
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सुकून
घर के कामों से थककर
उसे कभी-कभी दिन में ही
हल्की-फुल्की नींद आ जाती है
जरूरी काम होने पर भी
मैं उसे जगाता नहीं
सोता हुआ इंसान
मुझे कोई फरिश्ता लगता है
आँख खुलने पर वह कहती है-
अरे!आपने मुझे जगाया नहीं
कितना काम अभी बाकी है
यह कहती हुई
वह अपने काम में लग जाती है
उसकी हल्की-सी नींद
मुझे भारी सुकून से भर देती है।
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