सुरेंद्र कल्याण बुटाना की कविता- मनुष्य होना

मनुष्य होना एक भावना है, एक उत्तरदायित्व है, एक सतत संघर्ष है अपने भीतर की रोशनी को बचाए रखने का।

कविता

मनुष्य होना

सुरेंद्र कल्याण

मनुष्य होना
केवल दो पैरों पर
चलना नहीं है,
न ही
ऊँची इमारतें बनाना,
समुद्रों को मापना
या आकाश को छू लेना।

मनुष्य होना
एक भावना है,
एक उत्तरदायित्व है,
एक सतत संघर्ष है
अपने भीतर की रोशनी को
बचाए रखने का।

जब पृथ्वी पर
पहला मनुष्य आया होगा,
तब उसके पास
न धन था,
न सत्ता,
न विज्ञान।

उसके पास केवल
जीवन था
और जीवन के प्रति
एक आश्चर्य था।
वह नदी को देखकर
मुग्ध होता था,
पेड़ों को देखकर
प्रसन्न होता था,
और आकाश को देखकर
अपने छोटे होने का
एहसास करता था।

समय बीतता गया
सभ्यताएँ बनीं,
नगर बने,
राज्य बने,
और फिर
महत्त्वाकांक्षाएँ भी।

मनुष्य ने
ज्ञान अर्जित किया,
नई खोजें कीं,
असंभव को संभव किया।

उसने
पर्वतों को काटकर रास्ते बनाए,
नदियों पर पुल बनाए,
और अंतरिक्ष तक पहुँच गया।

पर इसी यात्रा में
कुछ प्रश्न पीछे छूट गए।

क्या वह
पहले से अधिक प्रसन्न हुआ?
क्या वह
पहले से अधिक संवेदनशील हुआ?
क्या उसने
अपनी करुणा को भी
उतना ही विकसित किया,
जितना अपने विज्ञान को?

आज
मनुष्य के पास
बहुत कुछ है।
सुविधाएँ हैं,
संसाधन हैं,
ज्ञान है,
सूचनाओं का
अथाह संसार है।

पर फिर भी
उसके भीतर
एक रिक्तता बढ़ रही है।
वह भीड़ में है,
फिर भी अकेला है।

उसके पास
सैकड़ों संपर्क हैं,
पर कुछ ही संबंध।

वह संसार से जुड़ा है,
पर स्वयं से दूर
होता जा रहा है।

शायद इसलिए
आज सबसे अधिक
आवश्यकता
नई मशीनों की नहीं,
नए हथियारों की नहीं,
बल्कि
नई संवेदनाओं की है।

हमें फिर से सीखना होगा
किसी रोते हुए
व्यक्ति के पास बैठना,
किसी थके हुए मन को सुनना,
किसी भूखे को रोटी देना,
और किसी निराश व्यक्ति को
आशा देना।

क्योंकि
सभ्यता की सबसे
बड़ी उपलब्धि
शक्ति नहीं,
करुणा है।

ज्ञान नहीं,
मानवता है।

विकास नहीं,
विवेक है।

एक दिन
यह युग भी
बीत जाएगा।

हमारे नगर,
हमारी उपलब्धियाँ,
हमारे विवाद,
सब इतिहास
बन जाएँगे।

पर आने वाली पीढ़ियाँ
यह अवश्य पूछेंगी

क्या हमने
उन्हें एक बेहतर पृथ्वी दी?

क्या हमने
नदियों को बचाया?

क्या हमने
जंगलों को बचाया?

क्या हमने
मनुष्यता को बचाया?

और उस समय
हमारे उत्तर
हमारे शब्दों से नहीं,
हमारे कर्मों से दिए जाएँगे।

इसलिए
यदि जीवन में
कुछ महान करना हो,
तो पहले
एक अच्छा मनुष्य बनो।

क्योंकि
अंततः
मनुष्य की पहचान
उसकी प्रसिद्धि से नहीं,
उसकी संवेदना से होती है।

और जीवन का
सबसे बड़ा सम्मान
यही है
कि हमारे कारण
यह संसार
थोड़ा अधिक सुंदर,
थोड़ा अधिक करुणामय,
और थोड़ा अधिक
मानवीय बन सके।

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना  हरियाणा के करनाल जिले के बुटाना गांव निवासी हैं।
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