दुनिया को इंटरनेट ने जोड़ा है
लेकिन इंसान को आज भी केवल इंसान ही जोड़ सकता है
“बेटा, ज़रा पाँच मिनट बैठ जाओ… कुछ बात करनी थी।”
पिता ने धीरे से कहा।
“बस पापा… यह मीटिंग खत्म होने दीजिए।”
बेटे ने लैपटॉप की स्क्रीन से नज़र हटाए बिना जवाब दिया।
मीटिंग खत्म हुई, तो एक ज़रूरी ई-मेल आ गया। फिर किसी मित्र का वीडियो कॉल। उसके बाद सोशल मीडिया पर कुछ संदेश। देखते-देखते रात हो गई। पिता अपने कमरे में जा चुके थे।
अगली सुबह बेटा जल्दी निकल गया। शाम को लौटा, तो पता चला कि पिता अस्पताल में भर्ती हैं। डॉक्टर ने कहा, “घबराने की बात नहीं है। बस उम्र ज़्यादा है, कमजोरी महसूस हुई थी।”
बेटे को सबसे अधिक तकलीफ़ बीमारी की नहीं हुई।
उसे उस अधूरे वाक्य की हुई…
“बेटा, ज़रा पाँच मिनट बैठ जाओ…”
वह पाँच मिनट नहीं दे सका। लेकिन वही पाँच मिनट शायद उसके पिता पूरी रात याद करते रहे होंगे।
यही हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
इतिहास में पहली बार पूरी दुनिया इतनी जुड़ी हुई है। पृथ्वी के किसी भी कोने में बैठा व्यक्ति कुछ ही सेकंड में दूसरे महाद्वीप के किसी इंसान से बात कर सकता है। वीडियो कॉल, ई-मेल, सोशल मीडिया, ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल बैंकिंग, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अनगिनत तकनीकी साधनों ने दुनिया को सचमुच एक वैश्विक गाँव बना दिया है।
आज हम घर बैठे डॉक्टर से सलाह ले सकते हैं। विदेश में पढ़ रहे बच्चे से हर शाम बात कर सकते हैं। गाँव का किसान भी मोबाइल पर मौसम की जानकारी देख सकता है। छोटे व्यापारी अपना सामान दुनिया के दूसरे देशों तक बेच सकते हैं। इंटरनेट ने ज्ञान को लोकतांत्रिक बनाया है। अवसरों का विस्तार किया है। महामारी के कठिन दिनों में यही इंटरनेट लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा बना।
इसलिए इंटरनेट को दोष देना न तो उचित है और न ही न्यायसंगत।
समस्या इंटरनेट नहीं है।
समस्या यह है कि हमने सुविधा को संबंध समझ लिया है।
आज हमारे मोबाइल में हजारों संपर्क हैं, लेकिन जीवन में कितने संपर्क जीवित हैं?
हम प्रतिदिन सैकड़ों संदेश पढ़ते हैं, लेकिन अपने घर में बैठे व्यक्ति की ख़ामोशी नहीं पढ़ पाते। हम किसी अनजान व्यक्ति की पोस्ट पर तुरंत प्रतिक्रिया दे देते हैं, लेकिन अपने माता-पिता की आँखों में उतर आई उदासी को कई दिनों तक नहीं देख पाते।
सवाल यह नहीं कि हम ऑनलाइन कितने घंटे रहते हैं।
सवाल यह है कि ऑफलाइन हम किसके साथ रहते हैं।
एक समय था जब घर लौटते ही लोग पूछते थे, “आज दिन कैसा रहा?”
आज घर लौटते ही पहला प्रश्न होता है-“वाई-फाई चल रहा है?”
पहले लोग शाम को छत पर बैठकर पड़ोसियों से बातें करते थे। बच्चों की हँसी गलियों में सुनाई देती थी। त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते थे, पूरे मोहल्ले का उत्सव होते थे। किसी के घर दुख आता, तो लोग बिना बुलाए पहुँच जाते थे। किसी की खुशी होती, तो पूरा समाज उसका हिस्सा बनता था।
आज जन्मदिन की शुभकामनियाँ एक क्लिक में भेज दी जाती हैं।
शोक-संदेश भी कॉपी-पेस्ट हो जाते हैं।
त्योहारों की बधाई एक ही संदेश से सैकड़ों लोगों तक पहुँच जाती है।
सुविधा बढ़ी है, लेकिन क्या आत्मीयता भी उतनी ही बढ़ी है?
किसी की तस्वीर पर “Take Care” लिख देना आसान है।
उसके दरवाज़े पर जाकर कहना- “मैं तुम्हारे साथ हूँ”- कहीं अधिक कठिन है।
किसी पोस्ट पर लाल दिल वाला इमोजी भेजना सरल है।
लेकिन किसी टूटे हुए दिल को सचमुच संभालना केवल इंसान ही जानता है।
इसीलिए तकनीक चाहे जितनी विकसित हो जाए, कुछ काम आज भी केवल मनुष्य ही कर सकता है।
माँ की हथेली का स्पर्श कोई स्क्रीन नहीं दे सकती।
पिता की पीठ पर रखा भरोसे का हाथ कोई ऐप नहीं रख सकता।
मित्र के कंधे पर सिर रखकर रोने का अनुभव किसी वीडियो कॉल से नहीं मिल सकता।
दादा-दादी की कहानी, बच्चे की खिलखिलाहट और परिवार की सामूहिक हँसी का कोई डिजिटल विकल्प आज तक नहीं बना।
कहा जाता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता इंसानों जैसी सोचने लगी है।
संभव है, कल वह और भी सक्षम हो जाए।
लेकिन क्या कोई मशीन किसी की चुप्पी में छिपा दर्द महसूस कर सकती है?
क्या कोई एल्गोरिद्म यह समझ सकता है कि सामने वाला व्यक्ति “मैं ठीक हूँ” कहकर भी भीतर से बिखरा हुआ है?
यहीं इंसान और मशीन का अंतर शुरू होता है।
इंटरनेट सूचना देता है।
इंसान सहारा देता है।
इंटरनेट रास्ता दिखाता है।
इंसान साथ चलता है।
इंटरनेट संपर्क बनाता है।
इंसान संबंध बनाता है।
इसीलिए आज मानसिक तनाव, अकेलापन और अवसाद के बढ़ते मामलों को केवल तकनीक की समस्या कहकर नहीं टाला जा सकता। यह कहीं न कहीं मानवीय संवाद की कमी का भी परिणाम है। बहुत से लोग भीड़ में रहते हुए भी अकेले हैं। उनके पास बातचीत के लिए प्लेटफ़ॉर्म हैं, लेकिन सुनने वाला कोई अपना नहीं है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इंटरनेट ने अनेक रिश्तों को बचाया भी है। विदेश में रहने वाले बेटे को माँ से रोज़ जोड़ने का काम उसी ने किया है। दूर-दराज़ के मित्रों को वर्षों बाद मिलाने का काम भी उसी ने किया है। किसी ज़रूरतमंद के लिए कुछ ही घंटों में लाखों रुपये जुटाने की ताकत भी उसी ने दी है।
अर्थात प्रश्न तकनीक का नहीं, प्राथमिकताओं का है।
यदि इंटरनेट हमें किसी पुराने मित्र तक पहुँचा दे और हम उसे केवल “हाय” लिखने के बजाय मिलने चले जाएँ, तो तकनीक सफल है।
यदि वीडियो कॉल हमें माता-पिता का चेहरा दिखाए और हम अगली छुट्टी में उनके साथ समय बिताने का निर्णय लें, तो इंटरनेट ने अपना उद्देश्य पूरा कर दिया।
यदि सोशल मीडिया हमें किसी पीड़ित की सहायता के लिए प्रेरित करे और हम वास्तव में उसके दरवाज़े तक पहुँच जाएँ, तो यही तकनीक मानवता की सबसे बड़ी सहयोगी बन जाती है।
लेकिन यदि इंटरनेट हमारे घर की डाइनिंग टेबल पर बैठे चार लोगों के बीच भी दीवार खड़ी कर दे, तो हमें स्वयं से प्रश्न पूछना होगा।
हमने दुनिया को जोड़ने की दौड़ में कहीं अपने ही घर के लोगों को तो नहीं खो दिया?
शायद समय आ गया है कि हम अपने बच्चों को केवल तेज़ इंटरनेट ही नहीं, गहरे रिश्ते भी दें। अपने माता-पिता को केवल महँगा स्मार्टफ़ोन ही नहीं, थोड़ा-सा अपना समय भी दें। अपने मित्रों को केवल लाइक और इमोजी ही नहीं, ज़रूरत पड़ने पर अपना कंधा भी दें।
क्योंकि अंततः मनुष्य को याद उसके संदेशों की संख्या से नहीं, उसके साथ बिताए गए समय से किया जाता है।
दुनिया को इंटरनेट ने जोड़ दिया है। यह उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
लेकिन जब कोई मन टूटता है, कोई रिश्ता बिखर जाता है, कोई आँख किसी अपने को खोजती है, या किसी को सिर्फ़ पाँच मिनट का साथ चाहिए होता है…
तब कोई ऐप डाउनलोड नहीं होता।
कोई नोटिफिकेशन उस खालीपन को नहीं भरता।
कोई इमोजी आँसू नहीं पोंछता।
उस समय एक इंसान ही दूसरे इंसान तक पहुँचता है- अपने समय के साथ, अपने स्पर्श के साथ और अपनी संवेदना के साथ।
शायद यही मनुष्य होने की सबसे बड़ी पहचान है।
दुनिया को इंटरनेट ने जोड़ दिया है…
लेकिन दिलों को जोड़ने का काम आज भी केवल इंसान ही कर सकता है।
~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
