व्यंग्य की धार पर चलता समकालीन यथार्थ: नित्शे की कुटाई

पुस्तक समीक्षा

व्यंग्य की धार पर चलता समकालीन यथार्थ: नित्शे की कुटाई

अंकित कात्यायन

कहानी-संग्रहों की अपनी एक विशिष्ट व्यंजना होती है। हर कहानी अपने भीतर एक अलग संसार रचती है, जीवन की किसी अनकही परत को उजागर करती है और पाठक के मन पर अपनी अलग रेखा खींचती है।’नित्शे की कुटाई’, युवान प्रकाशन से प्रकाशित आठ कहानियों का एक सशक्त संग्रह है, जिसकी कथावस्तु सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक यथार्थ के विविध आयामों को स्पर्श करती है। विषय भले परिचित प्रतीत हों, किंतु उनका शिल्प, कथ्य और प्रस्तुतिकरण उन्हें एक नया रंग और ताज़गी प्रदान करते हैं।

इस संग्रह के लेखकमयंक जैन परिच्छाअपने समय और समाज के प्रति सजग दृष्टि रखने वाले कथाकार प्रतीत होते हैं। उनकी कहानियाँ स्थापित धारणाओं और रूढ़ि छवियों को चुनौती देती हैं। उदाहरण के लिए, ‘एजेंट संतोष’में ज़िलाधिकारी (कलेक्टर) का एक महिला होना या ‘नित्शे की कुटाई’ में डाकू का नामराम बाबू होना। ये केवल पात्र-निर्माण नहीं, बल्कि पाठक की पूर्वधारणाओं पर एक सूक्ष्म और प्रभावी प्रहार हैं। ऐसे अनेक प्रसंग संग्रह में बिखरे पड़े हैं, जो कहानी को सिर्फ़ मनोरंजक ही नहीं, बल्कि सोचने पर भी मजबूर बनाते हैं।

संग्रह की पहली कहानी’एजेंट संतोष’एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जो स्वयं को एक गुप्त एजेंट मानता है और समाज की हर गतिविधि पर पैनी नज़र रखता है। उसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने ही सच गढ़ता है और उन्हीं को अंतिम सत्य मान बैठता है। कहानी की शुरुआत में संतोष का चरित्र थोड़ा हास्यपूर्ण, मसखरा और कुछ हद तक मूर्खतापूर्ण प्रतीत होता है, लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, उसके व्यक्तित्व की गहराई सामने आने लगती है। व्यंग्य के माध्यम से लेखक यह दिखाते हैं कि किसी भी विचार या भावना की अति समाज के लिए कितनी घातक हो सकती है। अंततः कहानी यह संकेत भी देती है कि राष्ट्रवाद यदि विवेक और संतुलन से दूर हो जाए, तो वह समाज के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।”

‘नित्शे की कुटाई’संग्रह की सबसे रोचक और प्रतीकात्मक कहानियों में से एक है। यह एक पंडित के बेटे की कहानी है, जो शरारती है, चोरी करके बीड़ी पीता है। किंतु उसके भीतर एक सहज नैतिकता और निष्कपट ईमानदारी भी विद्यमान है। वह रूढ़ियों, आडंबरों और धार्मिक पाखंड से अनभिज्ञ एक ऐसा बालक है, जिसकी मासूम दृष्टि कई बार तथाकथित बुद्धिमानों से अधिक प्रखर सिद्ध होती है। जब गाँव एक गंभीर संकट से जूझता है, तब प्रश्न केवल समाधान का नहीं, बल्कि दृष्टिकोण का भी होता है। क्या संकट का हल परंपरागत कर्मकांडों से निकलेगा या उस बालक की सहज बुद्धि और व्यावहारिक समझ कोई नई राह दिखाएगी?

‘फूफा ने औकात दिखाई’भारतीय ग्रामीण समाज और विवाह-संस्कृति का अत्यंत जीवंत और मनोरंजक आख्यान है। कहानी का नायक कमलेश है, जिसकी शादी का उल्लासपूर्ण वातावरण धीरे-धीरे सामाजिक विडंबनाओं का रंगमंच बन जाता है। लेखक ने बेरोज़गार दूल्हे, गोरी दुल्हन, उत्साही मित्र, बनिया-बुद्धि वाले रिश्तेदार, दबंग मामा, रूठे हुए फूफा और शादियों में अनिवार्य रूप से उपस्थित रहने वाले लठ जैसे पात्रों के माध्यम से ग्रामीण जीवन का सजीव चित्र खींचा है।पाठक स्वयं को किसी गाँव की बारात का सहभागी महसूस करने लगता है।

‘बिगड़ी लड़की’और ‘पेस्सोआ की मम्मी’दो अलग-अलग स्त्री पात्रों के माध्यम से बदलते समाज की जटिलताओं को सामने लाती हैं।’बिगड़ी लड़की’में श्रेया विवाह, उम्र और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच खड़ी है, जहाँ एक निर्णय पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है। वहींपेस्सोआ की मम्मी’की शिखा एक रेल-यात्रा के दौरान मिले अजनबी के एक साधारण-से प्रश्न से ऐसी घटनाओं में उलझ जाती है, जो उसके साथ-साथ उस अजनबी के जीवन को भी अप्रत्याशित मोड़ दे देती हैं।

‘एक अधूरी कहानी’पत्रकारिता के पेशे से जुड़े संघर्षों और मानवीय द्वंद्वों को उभारती है, जबकि’लुटेरी तवायफें’समाज के हाशिए पर खड़ी नाचने वाली स्त्रियों के आत्मसम्मान और अस्तित्व की मार्मिक कथा है। संग्रह की अंतिम कहानी’मर्दानगी’सोशल मीडिया पर उभरते एक’वाइफ बीटर एसोसिएशन’के ऑनलाइन संवाद के माध्यम से पुरुषत्व, हिंसा और सामाजिक मानसिकता पर तीखा व्यंग्य करती है।

कहानियों में बिखरे साहित्यिक संकेत इस संग्रह को एक अतिरिक्त वैचारिक गहराई प्रदान करते हैं।नित्शे और पेस्सोआजैसे विश्वविख्यात लेखकों के नामों का शीर्षकों में प्रयोग तथा मुक्तिबोध जैसे रचनाकारों के संदर्भ लेखक की व्यापक साहित्यिक चेतना और गंभीर अध्ययन का प्रमाण हैं। ये उल्लेख केवल विद्वत्ता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि कथा के अर्थ-लोक को और अधिक समृद्ध करने का कार्य करते हैं।

आज के समय में, जब पुस्तकों की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, ऐसे में ‘नित्शे की कुटाई’ का मूल्य संतुलित और पाठक-हितैषी प्रतीत होता है। लगभग 180 पृष्ठों का यह कहानी-संग्रह ₹250 में उपलब्ध है, जो इसकी साहित्यिक गुणवत्ता, मुद्रण और प्रस्तुति को देखते हुए पूरी तरह न्यायसंगत कहा जा सकता है।

अंततः, ‘नित्शे की कुटाई’उन कहानी-संग्रहों में है जो पढ़ने के बाद भी पाठक के भीतर लंबे समय तक जीवित रहते हैं। इसकी कहानियों में उपस्थितराजनीतिक व्यंग्यऔर समकालीन सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य की उपस्थिति इसे विशिष्ट बनाती है। यही वह पक्ष है जिसने इस संग्रह को मेरे लिए विशेष रूप से प्रभावशाली बनाया। कुछ पात्र स्मृति में बस जाते हैं, कुछ संवाद देर तक मन में गूंजते रहते हैं और कुछ प्रश्न अनुत्तरित होकर भी बेचैन करते हैं। यही किसी सार्थक कथा-साहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह संग्रह अपने समय से एक ईमानदार, निर्भीक और संवेदनशील संवाद स्थापित करता है.

किताब – नीत्शे की कुटाई
प्रकाशक – युवान प्रकाशन
लेखक – मयंक जैन परिच्छा
मूल्य – 250

 

समीक्षक – अंकित कात्यायन

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