जंतर-मंतर पर आंदोलन अब व्यापक हो चला है। अब वह सारे बंधन तोड़कर आगे बढ़ निकल चुका है। लेकिन सरकारी चालें अभी भी चली जा रही हैं। कभी लगता है कि मामला सुलझ रहा है तो सरकार ऐसी चाल चलती है कि शंकाएं उभर आती हैं। जब यह पोस्ट प्रकाशित की जा रही है तब सूचना आ रही है कि शनिवार सुबह ही पुलिस ने सीजेपी के कनवीनर अभिजीत दीपके को पुलिस ले गई है, उसे में हिरासत में ले लिया है। आज दोपहर बाद सीजेपी के प्रतिनिधिमंडल से केंद्र के मंत्रियों की दूसरे चरण की बात भी होनी है। यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार की फेसबुक वॉल से आभार के साथ ली गई है। इसके अलावा हम दो और वरिष्ठ पत्रकारों की पोस्ट प्रतिबिम्ब मीडिया पर शेयर करेंगे ताकि आंदोलन और जंतर-मंतर पर आंदोलनकारियों तथा सरकार के ‘नुमाइंदों’ द्वारा कही जा रही बातों को समझ सकें। जंतर-मंतर पर जेन-जी के धमाल पर यह तीसरी कड़ी वरिष्ठ पत्रकार रमेश सिद्धू जी की है, उनके फेसबुक वॉल से साभार ली गई है। संपादक
कमाल जेन जी, धमाल जेन जी
रील्स और मीम्स वाला “नो कैप” इंकलाब…
रमेश सिद्धू
जेन जी…गजब की जेनरेशन है भई। मैं तो इनका बड़े वाला फैन हो गया। बड़े-बड़े नेताओं के नेतृत्व में लड़े गए आंदोलन जो नहीं कर सके, वो इस इंस्टा पीढ़ी ने कर दिखाया। आजादी के बाद शायद सबसे बेहतरीन आंदोलन। सत्ता की आंखों में पहली बार एक डर नजर आया। डर बदलाव का। डर देश की दिशा बदलने का। डर पुरानी घिसी-पिटी सियासी चालों के अप्रासंगिक हो जाने का और सबसे बड़ा डर सिंहासन के नीचे से जमीन खिसक जाने का।
इससे पहले के आंदोलनों का एक आभामंडल होता था। वहां भाषण होते थे। चेहरे पर गंभीरता और तनाव नजर आता था। लेकिन इन्होंने आंदोलन की परिभाषा ही बदल दी। आंदोलन स्थल को “रील व मीम्स कल्चर” और “वाइब” से जोड़कर पिकनिक स्पॉट बना दिया। मस्ती-मस्ती में गहरी चोट भी कर जाते हैं। मोदी जी खुद को प्रधान सेवक कहते थे तो जेन जी पोस्टर पर लिखती है– “मोदी तो ‘प्रधान’ का सेवक निकला।” “मन की बात” को ये “मंकी बात” बना देते हैं।
“बीजेपी का नारा अच्छे दिन आने वाले हैं”, को ये पेपर लीक से जोड़कर “अच्छे दिन कब लीक होंगे?” बना देते हैं।
एक और बानगी देखिए– मार खाने के बाद भागने के बजाय पुलिस को चिढ़ाने लगते हैं– “अंकल आज मत मारना, आज मैं चप्पल पहनकर आया हूं। भाग नहीं पाऊंगा” पुलिस पीछे डंडा लेकर दौड़ रही है, ये आगे-आगे भागते हुए रील बना रहे हैं। बैरिकेडिंग करके रोकने की कोशिश करो तो बैरीकेड लेकर भाग जाते हैं, पानी की बौछारों ने बड़े-बड़े आंदोलनकारियों को खदेड़ा है, लेकिन ये उसमें रेन डांस का मजा लेते हैं। जैसे इतना ही काफी नहीं था– पुलिस इन्हें पीटने को आती है तो ये खड़े होकर राष्ट्रगान शुरू कर देते हैं… अब मारो!
सरकार और उनका आईटी सेल अपना सिर पीट रहा है कि भाई, “ये आंदोलन कर रहे हैं या स्टैंड-अप कॉमेडी!” सबसे बड़ा कन्फ्यूजन पैदा किया है इनकी भाषा ने। इनकी अपनी अलग शब्दावली है, जिसे समझने में सरकारी अमले के साथ-साथ आईटी सेल भी चूक गया। ऐसी कोड लैंग्वेज कि उनके लिए डिकोड करना मुश्किल हो गया।
इनके एक स्लैंग FOMO ने इस आंदोलन में इतनी भीड़ जुटा ली जितना किसी में बड़ी-बड़ी अपीलें करके नहीं जुटी। FOMO यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट यानी कुछ छूट न जाए या हम कहीं पीछे न रह जाएं। एक संदेश एक-दूसरे को प्रसारित करते हैं और “छूट न जाए” के चक्कर में लाखों जेन जी जुट जाते हैं।
इसी तरह कुछ और शब्द भी हैं जिनके मतलब सिर्फ इन्हीं की बिरादरी की समझ में आते हैं जैसे– शेक योर लेग। अब आपसे या हमसे कोई ये कहे तो जाहिर है हम सोचेंगे नाचने को कहा जा रहा है। लेकिन जेन जी की शब्दावली में शेक योर लेग मतलब जल्दी करो। Cap का अर्थ हम सब टोपी ही जानते हैं। लेकिन जेन जी की भाषा में Cap का मतलब झूठ और No Cap यानी 100% सच। अब कोई Salty बोले तो स्वाद वाला नमकीन मत समझिएगा। Salty का मतलब अब छोटी सी बात पर या बेवजह चिढ़ जाना होता है।
आप समझ नहीं पाते आपकी किस बात के जवाब में ये Anime कैरेक्टर की तरह अजीब तरीके से चींईंईंईंईंई करेंगे और आपकी किस मजाकिया बात पर आपको पूरा संविधान भी समझा देंगे।
बस इनका यही “आउट ऑफ सिलेबस” व्यवहार सरकार के दिमाग की बत्ती गुल किए हुए है। कब अचानक गंभीर होकर आपके खिलाफ माहौल बना देंगे और जब लगेगा सरकार का कोई एक्शन इनको कुचल देगा, ये दमन का आनंद लेने लगते हैं। अब ऐसे लोगों का कोई क्या ही उखाड़ ले!
टेक्निकली इतने समर्थ हैं कि आप पूरा इंटरनेट बंद कर दो, ये अपनी नेटवर्किंग का जुगाड़ ढूंढ लेंगे। इससे पहले वाले आंदोलनकारी कामकाजी और गृहस्थ रहे हैं, जिनको आखिरकार आजीविका कमाने के लिए काम पर लौटना होता था। इनके पास समय की कोई कमी नहीं है। काम सरकार ने दिया नहीं तो वक्त बिताने के लिए कहीं और जाने के बजाय आंदोलन स्थल पर जुट जाएंगे। वहां रील बनाकर मस्ती करेंगे, हंसी-ठठा करेंगे, लेकिन मकसद साफ है– अपना भविष्य तो अब बचाना ही है।
ऐसा भी नहीं है कि जेन जी सिर्फ मसखरी करती है। ये बेहद संवेदनशील भी है। सबसे बड़ी बात इनमें किसी के लिए कड़वाहट बहुत कम है। हम बचपन में कविता पढ़ा करते थे शायद “मोटू हलवाई” और उसका आनंद भी लेते थे। आज इनके सामने किसी को मोटा कहकर देखिए। उसी वक्त टोक देंगे– प्लीज डोंट बॉडी शेम। मिची आंखों वालों को हम चीनी या ऐसा ही कोई शब्द बोल देते थे। ये ऐसा सुनते ही झट से कहते हैं– प्लीज़ नो रेसिज्म।
ऐसे बच्चों पर क्यों नहीं प्यार आएगा। किसका मन इनके आंदोलन में इनका साथ देने को नहीं करेगा। और जब इन बच्चों पर निर्ममता से लाठियां बरसाई गईं, कौन ऐसा पत्थरदिल होगा जिसका दिल नहीं पसीजा होगा।
अब आप लगा लीजिए इन पर झूठे इल्ज़ाम, चल लीजिए अपनी घिसी-पिटी चालें। दे दीजिए इन्हें “देशद्रोही” , “भटके हुए” या “दुश्मन के एजेंट” होने के तमगे। पर सच आप भी जानते हैं और आपका जमीर भी कि ये बच्चे गलत नहीं हैं। ये मासूम हैं।
आपकी राजनीतिक भक्ति आज भले ही आपसे इनका विरोध करवा ले, लेकिन याद रखिए समय का पहिया घूम चुका है और आने वाला कल पूरी तरह इन्हीं का है। जब इस देश की बागडोर इनके हाथों में होगी, तब भारत धर्म, जाति या पाकिस्तान जैसे नफरती मुद्दों में नहीं उलझेगा। तब देश चलेगा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से, आधुनिक तकनीक से, संवेदनशीलता से और अटूट ईमानदारी से। तब भारत वास्तव में कहलाएगा विश्वगुरु।
Love you Zen Z…
