कविता
जाति, धर्म और प्यार-2
ओमसिंह अशफ़ाक
कैसा तो ये राज है, कैसा है कानून ।
प्रेम तो मंहगा हुआ, जल से मंदा खून ।।
प्रेमी कहें पुकार के, सुनो देश के लोग ।
मानवता को खा लेगा, जात-खाप का रोग ॥
हम दुनिया तै मिट चले, अब रोवेंगे माँ-बाप ।
याद करेंगे पछतावेंगे, ना काम आवेंगी खाप ॥
पाले पोसे बड़े करे, हुया के हमसे खोट ।
भरी जवानी क़त्ल करे, मारी कसूती चोट ॥
जीते-जी ना भूल सकें, हमनै तो माँ-बाप ।
होश आवेगी जब सोचेंगे, किसने कराया पाप ।।
घर-घर रावण घूमते, भर कै पंचाती भेष।
सब छोरी-छोरे मर जांगे, फेर के रह जागा शेष ॥
ज्ञान के दुश्मन ना सुणें, प्रेमी जोड़े की फ़रयाद।
राखी बांधो पति कै, नहीं कर देंगें बरबाद ॥
माँ-बाप पराये रिश्ते झूठे, जीणा हुया दुश्वार ।
माँ का जाया क़त्ल करै, चली ये कैसी बयार ॥
जन्मे थे अरमान से, ले मुट्ठी में घर-देश ।
ज़हर रेल फांसी का फंदा, रहे तीन ठिकाणे शेष ॥
प्रेम कभी भी मरा नहीं, चाहे कर लो जतन हज़ार ।
दो को फांसी तोड़ोगे, तो चार मिलेंगे त्यार ॥
