जयपाल की छोटी-मोटी कविताएं

जयपाल की छोटी-मोटी कविताएं

चिंता

 

दफ्तर के बाहर

एक चपड़ासी बैठता है

बड़े ज़ोर-ज़ोर से हँसता है ठहाके लगाकर

मुझे तो बस यही चिंता खाए जा रही है

 

और उसे देखिये…

उसे कोई चिंता ही नहीं !

 

 ड्राईंग रूम

 

मैंने अपने घर के दरवाज़े के पास

एक ड्राईंग रूम सजा लिया है

और इस तरह

खुद को खुद से छिपा लिया है

 

आधुनिक नगर

 

गली सुनसान

मकान बेजान

दरवाज़े बंद

खिड़की परेशान

एक आधुनिक नगर में

कितने श्मशान

 

पिता

 

पिताजी अपने बेटों के पास

गाँव से शहर आते हैं

दो-चार दिन बाद

फिर शहर से गाँव लौट जाते हैं

कुछ खो गया हैं शायद

ढूंढते से आते हैं

ढूंढते से जाते हैं

 

मां

 

मां कुछ खोई-खोई सी रहती हैं

कोई नहीं जानता किस लिए

वह खुद भी नहीं जानती

 

दादा

 

दादा जी कहते हैं

पहले तो दूर से ही दिख जाता था घर

अब तो घर के अंदर आकर भी

नज़र नहीं आता है घर

 

दादी

 

दादी पहले जिस घर में रहती थीं

वहां बोलती रहती थीं कुछ न कुछ

अब दादी नई कोठी में आ गई हैं

यहां कोठी बोल रही है दादी चुप हैं

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