ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – नफ़रत से ना देश चलै रे बंदे !

कविता

नफ़रत से ना देश चलै रे बंदे !

ओमसिंह अशफ़ाक

अब कैसे तू निकलेगा रे बंदे !
उसने चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

तेरा चुनने का अधिकार सही है !
पर हाथ में उसके ‘खाता-बही’ है !
जोड़-घटा उसने करना है !
दंड तुझे उसका भरना है !
तू कितना दंड भरेगा रे बंदे !
उसने चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

पहले उसने तुझको भरमाया !
फिर लट्टू की भांति तुझे नचाया !
तू तान पर उसकी खूब था नाचा !
क्यूं अपना भविष्य नहीं था बांचा?
अब नाच-नाच कर थक गया बंदे !
उसने चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

अब तेरी वो फरियाद सुणे क्यूं !
तेरा ‘वाद विवाद संवाद’ सुणे क्यूं !
पत्रकार भी उसकी सुणते हैं !
टेलीविजन ‘किस्से बुणते’ हैं !
तेरा किस्सा कौन सुणेगा रे बंदे !
उसने चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

वो जो पहले एक्का था तेरा !
मजदूर-किसान था साथ कमेरा !
उस गढ़ में उसने तेरे सेंध लगाई !
साधु-भेष में घुस आए कसाई !
अब कैसे तू पहचानेगा रे बंदे !
उसने चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

ये भरम का जाल़ काटना होगा !
अब ‘झूठ और सांच’ छांटणा होगा !
सबको प्यार मोहब्बत बांटणा होगा !
नफ़रत का भी ज़हर काटणा होगा !
नफ़रत से ना देश चलेगा रे बंदे !
उसने चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

उडै़ काले़ धन के अंबार रे बंदे !
तू होया घणा लाचार रे बंदे !
किस तरियां तेरी पार पड़ेगी,
या चौतरफा अब मार पड़ेगी !
हिंसा से ना देश चलै रे बंदे !
तेरे चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

‘न्याय की देवी’ की पट्टी हटगी !
एक आस बची थी,वो भी घटगी !
इब किसतै आस करेगा भोले़ !
भला कौण सुणै तेरे रुक्के रौले़ !
अरे गन्दे-सन्दे उनके गोरख-धंधे !
तेरे चक्रव्यूह के कस दिए फंदे !

अब चक्रव्यूह तुझे तोड़ना होगा !
रथ उनका वापस मोड़ना होगा !
तुझे काटने होंगे ये सारे फंदे !
कोई जुगत नयी तू सोच ले बंदे !
कर ‘एक्का’ फिर वही पुराना !
बदलेगा निश्चित ये भी जमाना !

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *