ओमसिहं अशफ़ाक की कविता – बादल़ हैं मरज़ी के मालक

कविता

बादल़ हैं मरज़ी के मालक

ओमसिहं अशफ़ाक

 

इब उमड़-घुमड़ कै बरसे बादळ !

कदे बिन पाणी थे तरसे बादळ !

 

भई बादळ हैं मरज़ी के मालक !

ना बणे किसी के कभी गुलाम !

मरज़ी हो तो अड़ै बरस ज्यां

नहीं डिगर ज्यां अगले गाम !

 

एक बै हवा अर बादळ की ठणगी !

बात जमीं रस्सी-सी तणगी !

जिब हवा धकेलै पाच्छै उसनै,

बादळ के जमा जी नै बणगी…

 

बादल नै हवा तै दिया उलाहणा

इब छोड़ परै नाहक धिंगताणा ।

कदि तनै मेरी बात ना मानी ।

तू करती रही अपणी नादानी ।

 

इब तन्नै मैं समझाणा चाहूं,

प्यार तै गले़ लगाणा चाहूं…

 

इब हवा न्यूं बोल्ली..

मैं जाणूं सारी तेरी हुशयारी ।

तेरे सिर पै पौठ पाणी की भारी ।

इस पौठ नै तेरी कमर झुकाई ।

ज्यांह तै आज याद मेरी आई ।

 

तू करता रहा सदा मनमानी ।

तनै बात कदे मेरी भी ना मानी ।

 

फेर बदल बोल्या…

म्हारी गलती दोनों की थी,स्याणी ।

आ मिलकै गेरैं इस राड़ पै पाणी ।

जद बढ़िया फसल आग्गै होवेगी ।

सबके दलिदर वा धोवेगी ।

 

सदा टोट्टे के म्हं हुई लड़ाई ।

स्याणे-पुरखों नै ये बात बताई ।

न्यूं हवा-बादल का हटकै प्यार हुआ था,

बस खत्म वहीं तकरार हुआ था..

 

जिब पाच्छे तै एक रेल्ळा आया !

तब बादळ नै बी जोर लगाया!

न्यू हवा का रुख जद उल्टा फिरग्या,

फेर बादळ भोत घणा इतराया !

 

फेर बादळ बरसण लग्या खेत में !

या हवा उड़ाकै ल्याई रेत नै !

दोनों नै ई मिलकै खेल्ली होली़ !

न्यूं पूरा उधम मचाया खेत में !

 

जद बादळ नै आया गुस्सा !

भट में तै काढ्या गिण-गिण* मुस्सा!

उप्पर तै बाज नै मारया झपट्टा,

पंज्या में ले उड़ग्या मुस्सा !

 

फेर गाम-शहर में मची तबाही !

सड़क-गली बी नज़र ना आई !

सड़कॉं की तो नहर बणा दी !

खाट-खटौल्ली कोठ्ठै चढ़वा दी !

 

बादळ का जद बढ़जा बी.पी. !

फेर यो ना देख्खै एसपी.डीसी. !

जिब बंगले के म्हं पाणी बड़जा !

भाज कै अफसर छत पैई चढ़जा!

 

कदे पाणी तै भी डरना होज्या !

कदि बिन पाणी बी मरना होज्या !

ऐसी जान फंसै सांसत में,

कदि डूबणा,कदि तिरना होज्या !

 

बादळ की हो महिमा न्यारी !

राज्जी हो तो भरदे क्यारी !

जै बादळ का मूड बिगड़ ज्या,

बिन बरसे ही भरै उडारी !

 

एक हाळी़ ठाड्डा छौ में आग्या !

बिन बरसात घणाए दुख पाग्या !

न्यू बादऴ तै दिया फेर उलाह्णा,

दशरथ-पूत घणाए मस्ताग्या ?

 

फेर बादळ मंद-मंद मुस्काया !

पाणी ले कै नै तले़ नै आया !

फेर खेत्तां में छाई हरियाली,

खूब किसान का मन हर्षाया !

 

पाणी-बादल़ का रिश्ता गहरा !

इस पै ना लाग सक्या कोई पहरा !

एक बै बादल पै सपड़्या पाणी,

ठा जमना तै रोहतक ल्या गेरया !

फेर सुनपत नै पाट्या बेरा !

 

सुनपत आले़ टापते रहगे !

बादल़ का रुख भांपते रहगे !

बादळ के थारै ब्याह राख्या सै-

न्यू बात कसूत्ती रोहतकी कहगे !

 

इब बादळ नै बी शरम-सी आई !

नई उसने कोए जुगत लगाई !

एक दोंगड़ा ठाड्डा करग्या,

न्यू सुनपत पै ताली़ बजवाई !

 

अगले दिन जा बरस्या सिरसा !

लम्बा-चौड़ा था उठै बिरसा !

वठै एक दौंगड़े में के होवै था?

थक बादल चाल्या घिरसा-घिरसा!

 

जिब नारनौल का नंबर आया !

बादळ की दुख्खै थी काया !

साथ में राजस्थान लगै था,

न्यू सोच कै बादळ बी घबराया !

 

इब रोहतक आळे लठ्ठ ठारे थे !

उड़ै औरे-धौरे मठ सारे थे !

“बादळ नै इब जाण ना देंगे !

सुनपत कान्हीं आण ना देंगे” !

न्यू सारा ए शहर डुबाया !..

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*1 2 3 4 नंबरवार

2 thoughts on “ओमसिहं अशफ़ाक की कविता – बादल़ हैं मरज़ी के मालक

  1. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    प्रतिबिंब मीडिया के नियमित और संजीदा पाठक श्री सुरेंद्र पाल तोमर जी की यह टिप्पणी कवि के व्हाट्सएप पर प्राप्त हुई है। हम उनका हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।
    “बादल के साथ साथ आपकी कल्पना की उड़ान भी ऊँची है. कवि ही है जो प्रकृति के साथ भी खेलता है. इसमें हास्य भी व मस्ती भी है. अच्छी कविता है”✌
    सुरेंद्र पाल तोमर, भारतीय सेना का पूर्व सैनिक, बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।

  2. ओमसिंह अशफ़ाक, कुरुक्षेत्र (हरियाणा) says:

    कवि के व्हाट्सएप पर अंबाला के आर्य कॉलेज की हिंदी की प्रोफेसर डॉक्टर संध्या गौतम की निम्नलिखित टिप्पणी प्राप्त हुई है। हम मैडम संध्या गौतम जी का हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।
    “आ० अशफ़क साहब हरियाणवी भाषा में आपकी कविता पढ़कर अच्छा लगा, आपने हरियाणवी में बादल और हवा के माध्यम से मानव मनोवृत्ति को बड़े सुन्दर ढ़ग से चित्रित किया है।”
    डॉ संध्या गौतम, सेवानिवृत प्रोफेसर, आर्य पीजी कॉलेज, अंबाला कैंट (हरियाणा) भारत।

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