ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

ओमसिंह अशफ़ाक की दो कविताएं

 

कर्ज़े नीच्चै सांस फूलगी !

 

म्हारी कर्ज़े नीच्चै सांस फूलगी,

तू करता फिरै किल्लौ़ल रै बाबा !

 

म्हारे लित्तर गेल्यांई तल़वे घिसगे,

तू उड़न खटोल्ले में डौल रै बाबा !

 

दिके लाल रेत में छाल्ले पड़गे,

ना असर करै “बरनोल” रै बाबा !

 

हम एमएसपी की रहे बाट देखते,

तू करता रह्या टाल़-मटौल़ रै बाबा !

 

हम झूठ्ठे वादे कद चाहवां थे,

देत्ता नापतौल कै बोल रै बाबा !

 

सात सौ माणस नै जान खपादी,

ये वेल्लड़ करैं मखौल रै बाबा !

 

ये हरे जख़म पै नूंण छिड़क दें,

म्हारे दिल में उठ्ठैं हौल रै बाबा !

 

हम अमन के रस्ते चाल्लण आल़े,

नातै कर देन्दे छितरौल़ रै बाबा !

 

सब कुछ सहकै भी बाट देखरे,

कद बजै जीत का ढो़ल रे बाबा !

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नहीं मिलता कोई काम रे बंदे!

 

एक की करनी सब नै भरनी, देश होया बिरान रे बंदे !

हठधर्मी या पड़ै छोड़णी, न्यूं बणै नहीं कुछ काम रे बंदे !

 

फौज़ फिरै बे-रुजगारां की, नहीं मिलता कोई काम रे बंदे !

बागडोर तो तेरे हाथ में, ये झूठा नहीं इल्जाम रे बंदे !

 

बड़े चाव तै सौंपी थी गद्दी, सब बिखर गए अरमान रे बंदे !

एक दिन तो सच आवै सामणै, फिर टूटेगा अभिमान रे बंदे !

 

महंगाई ने कमर तोड़ दी, हुए घणे परेशान रे बंदे !

जीतेजी न्यूं मरणा होग्या, फंसी आफ़त में जान रे बंदे !

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