डिजिशाला : वंचित बच्चों के लिए डिजिटल खाई को पाटने की एक प्रेरक पहल

डिजिशाला : वंचित बच्चों के लिए डिजिटल खाई को पाटने की एक प्रेरक पहल

डॉ. मनजीत राठी

आज के दौर में शिक्षा और डिजिटल साक्षरता बच्चों की शैक्षणिक प्रगति तथा उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक साधन बन चुके हैं। दुर्भाग्यवश, घरेलू सहायकों (हाउस हेल्प) का एक बड़ा वर्ग गरीबी और आर्थिक अभावों के कारण अपने बच्चों को कंप्यूटर तथा डिजिटल शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध नहीं करा पाता। इसी कमी को महसूस करते हुए पंचकूला की शिक्षाविद् एवं सेवानिवृत्त प्राचार्या श्रीमती गीता पाल, जो लंबे समय से विभिन्न सामाजिक संगठनों तथा साक्षरता एवं उत्तर-साक्षरता कार्यक्रमों से सक्रिय रूप से जुड़ी रही हैं, ने एक अनूठी पहल का विचार किया। उनका उद्देश्य अपनी कॉलोनी– डीएलएफ वैली (अमरावती एन्क्लेव, पंचकूला के निकट) में कार्यरत घरेलू सहायिकाओं के बच्चों को निःशुल्क डिजिटल शिक्षा उपलब्ध कराना था, ताकि ये वंचित बच्चे भी आधुनिक तकनीकी सुविधाओं से लाभान्वित होकर अपने उन समवयस्क बच्चों के साथ कुछ हद तक बराबरी से खड़े हो सकें, जिन्हें ये सुविधाएँ सहज रूप से उपलब्ध हैं। उनकी सामाजिक सक्रियता और दूरदृष्टि को बढ़ावा देने में उनके जीवनसाथी, दिवंगत सुरेंदार पाल की भी अहम भूमिका रही है, जो स्वयं एक प्रसिद्ध समाज सुधारक थे,  जिन्हे केंसर की घातक बीमारी ने हमसे असमय छीन लिया।

गीता जी के अनुसार समाज के मध्यवर्ग का यह नैतिक दायित्व है कि वह प्रत्येक बच्चे के लिए एक शिक्षित, समतामूलक और अवसर-संपन्न वातावरण के निर्माण में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए। इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी कॉलोनी के निवासियों के समक्ष अपनी योजना रखी और उनसे इस नेक प्रयास में सहयोग की अपील की। उनकी इस पहल को उत्साहजनक समर्थन मिला। कई निवासियों ने अपने पुराने कंप्यूटर उदारतापूर्वक दान कर दिए, जबकि अन्य लोगों ने आर्थिक एवं नैतिक सहयोग का आश्वासन दिया।

इन्हीं सहयोगों के बल पर उन्होंने डीएसएस-12, बेसमेंट, द बाज़ार, डीएलएफ वैली, अमरावती एन्क्लेव के निकट, पंचकूला (पिन-134107) में मात्र ₹10,000 प्रतिमाह की रियायती दर पर एक बेसमेंट कमरा किराए पर लिया और “डिजिशाला : कंप्यूटर लर्निंग एंड डॉक्यूमेंट सेंटर” की स्थापना की, जहाँ आर्थिक रूप से कमजोर एवं वंचित बच्चों को निःशुल्क बुनियादी कंप्यूटर शिक्षा प्रदान की जा रही है। इस निःशुल्क कंप्यूटर केंद्र का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण कंप्यूटर शिक्षा उपलब्ध कराकर डिजिटल असमानता की खाई को पाटना है। यह केंद्र बच्चों को आवश्यक डिजिटल कौशल से सशक्त बनाकर उनके लिए शिक्षा, रोजगार तथा व्यक्तिगत विकास के नए अवसरों के द्वार खोलने का प्रयास कर रहा है।

केंद्र के प्रमुख उद्देश्य हैं—

घरेलू सहायकों/कामगारों के बच्चों को निःशुल्क कंप्यूटर शिक्षा उपलब्ध कराना।

डिजिटल असमानता के कारण उत्पन्न शैक्षिक विषमता को कम करना।

डिजिटल शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों की शैक्षणिक उपलब्धियों के साथ-साथ उनके समग्र व्यक्तित्व का विकास करना।

व्यावहारिक कंप्यूटर कौशल प्रदान कर विद्यार्थियों की रोजगार-योग्यता बढ़ाना।

बच्चों को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर तथा उत्तरदायी नागरिक बनने के लिए सशक्त बनाना।

प्रारंभ में डिजिशाला के पास केवल चार कंप्यूटर ही उपलब्ध थे। किंतु जैसे-जैसे इस पहल की जानकारी लोगों तक पहुँची, वैसे-वैसे सहयोग का दायरा भी बढ़ता गया। कुछ ही महीनों में केंद्र ने उल्लेखनीय विस्तार किया और आज यहाँ बारह कंप्यूटरों की सहायता से बारह-बारह विद्यार्थियों के दो बैच सफलतापूर्वक संचालित किए जा रहे हैं। आठवीं कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक के चौबीस विद्यार्थी इन दोनों सायंकालीन बैचों में अध्ययन करते हैं। डिजिशाला की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक इसका सहयोगात्मक शिक्षण वातावरण है। वरिष्ठ विद्यार्थी स्वयं आगे बढ़कर कनिष्ठ विद्यार्थियों तथा नए आने वाले बच्चों को कंप्यूटर के विभिन्न कौशल सीखने में सहायता करते हैं। इससे परस्पर सहयोग, आत्मविश्वास, जिम्मेदारी और सामूहिक सीखने की एक स्वस्थ संस्कृति विकसित हुई है।

इन बैचों का मार्गदर्शन अनुभवी प्रशिक्षकों एवं शिक्षकों द्वारा पूर्णतः निःशुल्क किया जाता है। विद्यार्थियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए कक्षाएँ प्रतिदिन सायं 4 बजे से रात 8 बजे तक संचालित की जाती हैं। इन समर्पित शिक्षकों में चंदा भारती और उनके पति चंदरदीप का विशेष उल्लेख आवश्यक है। दोनों ही स्नातकोत्तर शिक्षित हैं तथा बी.एड. की उपाधि प्राप्त हैं। विद्यार्थियों के प्रति उनका समर्पण, ईमानदारी और शिक्षण के प्रति उनका जुनून वास्तव में प्रेरणादायक है। अनेक दृष्टियों से उनकी निष्ठा और प्रतिबद्धता उन गुणों से भी आगे दिखाई देती है, जिनकी अपेक्षा सामान्यतः नियमित शैक्षणिक संस्थानों के शिक्षकों से की जाती है।

डिजिशाला अपनी अब तक की सफलता को आगे बढ़ाते हुए शीघ्र ही बुनियादी कंप्यूटर शिक्षा के प्रमाण-पत्र (सर्टिफिकेट) पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने की योजना बना रहा है, ताकि विद्यार्थी अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए अंशकालिक (पार्ट-टाइम) रोजगार भी प्राप्त कर सकें। प्रस्तावित पाठ्यक्रमों में बेसिक कंप्यूटर, डीसीए, एडीसीए, टैली प्राइम, एडवांस्ड एक्सेल, सीसीसी/एमएस-सीआईटी, वेब डिज़ाइनिंग, डीटीपी तथा ग्राफिक डिज़ाइनिंग शामिल हैं।

केंद्र पर सीएससी (कॉमन सर्विस सेंटर) तथा अन्य ऑनलाइन सेवाएँ भी उपलब्ध कराई जाती हैं। इनमें सरकारी एवं निजी ऑनलाइन सेवाएँ, दस्तावेज़ संबंधी कार्य जैसे प्रिंटिंग, स्कैनिंग, फोटोकॉपी, ऑनलाइन फ़ॉर्म भरना, पैन कार्ड, मतदाता पहचान-पत्र (वोटर आईडी), पासपोर्ट के लिए आवेदन तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन प्रवेश संबंधी सेवाएँ शामिल हैं।

वर्तमान में प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत बुनियादी कंप्यूटर संचालन, टाइपिंग कौशल, एमएस ऑफिस, इंटरनेट का प्रभावी उपयोग, ई-मेल संचार, ऑनलाइन शिक्षण प्लेटफ़ॉर्म तथा डिजिटल सुरक्षा का प्रशिक्षण दिया जाता है। विद्यार्थियों की रुचि और आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए ग्राफिक डिज़ाइनिंग, कोडिंग तथा स्पोकन इंग्लिश जैसे उन्नत पाठ्यक्रम भी प्रारम्भ किए गए हैं।

16 जून 2026 को डिजिशाला का मेरा दौरा तथा वहाँ के उत्साही विद्यार्थियों के साथ मेरा आत्मीय संवाद मेरे जीवन के अत्यंत अविस्मरणीय अनुभवों में से एक रहा। इस यात्रा ने न केवल गीता दीदी— (जिन्हें मैं स्नेहपूर्वक इसी सम्बोधन से पुकारती हूँ) की सेवाभावना, दूरदृष्टि और अथक समर्पण को एक बार फिर मेरे सामने सजीव कर दिया, बल्कि मुझे उन वंचित बच्चों की अद्भुत दुनिया की भी झलक दिखलाई, जिनकी आँखों में सीखने की तीव्र ललक, आत्मविश्वास और भविष्य के सुनहरे सपने सितारों की तरह चमक रहे थे। इन बच्चों के चेहरों पर आगे बढ़ने की राह का नक्शा साफ पढ़ा जा सकता था। सबसे सुखद दृश्य यह था कि लड़के और लड़कियाँ बिना किसी लैंगिक भेदभाव के साथ बैठकर पढ़ रहे थे तथा एक-दूसरे की पूरे मनोयोग से सहायता कर रहे थे। उनके व्यवहार में सहयोग, आत्मीयता, जिम्मेदारी और सामूहिकता की एक अद्भुत भावना दिखाई देती थी। कमाल की बात यह थी कि उनमें से कई बच्चों ने अपने भविष्य के स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित कर लिए हैं। वे अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए अपने परिवार की आर्थिक सहायता करना चाहते हैं और साथ ही जीवन में बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करने का सपना भी संजोए हुए हैं।

एक छात्रा दीपांशी ने अत्यंत उत्साह के साथ एयर होस्टेस बनने का अपना सपना साझा किया और उससे संबंधित तैयारियों के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करने की उत्सुकता दिखाई। वहीं एक अन्य छात्र ने बताया कि वह किसी प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी करना चाहता है, ताकि अपने माता-पिता को बेहतर जीवन दे सके। इन बच्चों की आकांक्षाएँ हमें यह याद दिलाती हैं कि सपनों पर न तो किसी जाति का कोई विशेष अधिकार होता है और न ही विशेष वर्ग का। इतिहास ऐसे असंख्य प्रेरणादायक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ साधारण और अभावग्रस्त परिवारों के बच्चों ने कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए असाधारण उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। डिजिशाला उसी दिशा में बढ़ाया गया एक सार्थक और आशाजनक कदम है।

तकनीकी शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ यह केंद्र बच्चों में आत्मविश्वास का विकास, प्रभावी संवाद-कौशल, समस्या-समाधान की क्षमता तथा डिजिटल साक्षरता को भी समान महत्त्व देता है। विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा और भविष्य के रोजगार के लिए तैयार करने हेतु नियमित रूप से कैरियर मार्गदर्शन, व्यक्तित्व विकास तथा शैक्षणिक सहयोग संबंधी सत्र भी आयोजित किए जाते हैं। इस प्रकार डिजिशाला केवल एक कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र भर नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण का एक प्रभावशाली माध्यम बनकर उभर रहा है। वंचित बच्चों की डिजिटल शिक्षा में निवेश करके यह न केवल गरीबी के दुष्चक्र को तोड़ने का प्रयास कर रहा है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए अधिक उज्ज्वल, समानतामूलक और आशापूर्ण भविष्य की मजबूत नींव भी रख रहा है।

गीता दीदी को हार्दिक बधाई, जिन्होंने अपनी संवेदनशील सोच को एक प्रेरणादायी वास्तविकता का रूप दिया। हमारी हार्दिक कामना है कि डिजिशाला अपने इस महान उद्देश्य की सफलतापूर्वक पूर्ति कर सके तथा आसपास की अन्य कॉलोनियों के निवासियों को भी ऐसे अनेक केंद्र स्थापित करने के लिए प्रेरित करे। यदि इस प्रकार की पहल व्यापक स्तर पर दोहराई जाए, तो निश्चित ही गरीबी और अवसरों की असमानता की दीवारें धीरे-धीरे समाप्त होंगी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बच्चों को भी वे समान अवसर प्राप्त हो सकेंगे, जिनके वे वास्तविक हकदार हैं।

लेखिका सेवानिवृत्त वरिष्ठ प्रोफेसर, एम.डी.यू., रोहतक हैं।

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